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दिग्विजय का राम राग…उज्जैन से अयोध्या तक क्यों चला ‘सनातन स्वाभिमान’ का दांव…कहा राम मंदिर आंदोलन से जुड़ा रहा

DigitalDesk by DigitalDesk
September 10, 2026
in भोपाल, मध्य प्रदेश, मुख्य समाचार, स्पेशल
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Digvijaya Rama refrain Sanatan Swabhiman Sanatan
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दिग्विजय का राम राग…उज्जैन से अयोध्या तक क्यों चला ‘सनातन स्वाभिमान’ का दांव…कहा राम मंदिर आंदोलन से जुड़ा रहा

मध्य प्रदेश की सियासत में एक ऐसा सियासी दृश्य सामने आने वाला है, जिसकी कल्पना कुछ साल पहले शायद मुश्किल थी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अब उज्जैन से अयोध्या तक सनातन स्वाभिमान यात्रा निकालने जा रहे हैं।

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20 अक्टूबर 2026 यानी विजयादशमी के दिन उज्जैन से शुरू होने वाली यह यात्रा अयोध्या तक जाएगी। दिग्विजय सिंह इसे किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध की यात्रा नहीं बता रहे। उनका दावा है कि मकसद धर्म के नाम पर पारदर्शिता, सत्य, श्रद्धा और सामाजिक सद्भाव की रक्षा करना है।लेकिन सियासत में सिर्फ यात्रा का रास्ता महत्वपूर्ण नहीं होता। उस यात्रा के पीछे चुना गया राजनीतिक संदेश ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। और दिग्विजय के इस ऐलान में सबसे बड़ा संदेश है।
राम को लेकर अपनी राजनीतिक और वैचारिक स्थिति को खुद सामने रखना।

राम मंदिर से सनातन स्वाभिमान तक, दिग्विजय ने खोला पुराना अध्याय

दिग्विजय सिंह ने अपने इस अभियान को सिर्फ वर्तमान से नहीं जोड़ा। उन्होंने सीधे 1988-89 के राम जन्मभूमि आंदोलन के दौर का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि विश्व हिंदू परिषद के राम शिला पूजन अभियान में वैचारिक मतभेदों के बावजूद उन्होंने हिस्सा लिया था और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान भी दिया था। यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा राजनीतिक बिंदु है। दिग्विजय सिंह सिर्फ यह नहीं कह रहे कि राम सबकी आस्था हैं। वह यह भी बता रहे हैं कि राम के मुद्दे से उनका रिश्ता आज का बनाया हुआ नहीं है। यानी अपनी वर्तमान यात्रा की वैचारिक विश्वसनीयता के लिए वह अपने अतीत को सामने ला रहे हैं।

सवाल यात्रा का नहीं, नैरेटिव बदलने का है

दिग्विजय सिंह की राजनीति लंबे समय से हिंदुत्व, बीजेपी और संघ परिवार के खिलाफ मुखर राजनीतिक बयानों के लिए पहचानी जाती रही है। ऐसे में अब वही दिग्विजय सिंह राम मंदिर आंदोलन के अपने पुराने जुड़ाव का जिक्र करते हैं और “सनातन स्वाभिमान” की बात करते हैं।यहीं से बड़ा सवाल पैदा होता है।

क्या कांग्रेस के भीतर धर्म और सनातन को लेकर राजनीतिक भाषा बदल रही है? या दिग्विजय सिंह यह संदेश देना चाहते हैं कि राम और सनातन किसी एक राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं हैं। अगर यही संदेश है तो यात्रा का राजनीतिक महत्व काफी बढ़ जाता है।

बीजेपी के राम बनाम दिग्विजय का राम

भारतीय राजनीति में राम लंबे समय से बीजेपी के सबसे मजबूत सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रतीकों में से एक रहे हैं। राम मंदिर आंदोलन से लेकर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण तक बीजेपी ने इस मुद्दे को अपनी राजनीतिक यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। अब दिग्विजय सिंह का उज्जैन से अयोध्या तक यात्रा निकालना इसी नैरेटिव के सामने एक अलग दावा खड़ा कर सकता है।

संदेश यह हो सकता है।

राम सिर्फ बीजेपी के नहीं हैं। सनातन सिर्फ बीजेपी का मुद्दा नहीं है।
आस्था पर किसी एक दल का अधिकार नहीं है। यानी मुकाबला सिर्फ मंदिर का नहीं। मंदिर से जुड़े राजनीतिक नैरेटिव का भी है।

उज्जैन से शुरुआत, अयोध्या पर अंत क्यों?

यात्रा का मार्ग भी अपने आप में प्रतीकात्मक है। उज्जैन। महाकाल की नगरी। अयोध्या। राम की जन्मभूमि से जुड़ी आस्था का सबसे बड़ा केंद्र।
एक तरफ महाकाल। दूसरी तरफ राम। यानी यात्रा को सिर्फ राजनीतिक पदयात्रा या जनसंपर्क अभियान के रूप में नहीं, बल्कि दो बड़े धार्मिक केंद्रों को जोड़ने वाले सांस्कृतिक संदेश के रूप में पेश किया जा सकता है। दिग्विजय का दावा है कि यात्रा का उद्देश्य धर्म के नाम पर पारदर्शिता और श्रद्धा की रक्षा है। लेकिन राजनीतिक रूप से इसका एक दूसरा अर्थ भी निकलेगा। मध्य प्रदेश से अयोध्या तक कांग्रेस का अपना सनातन नैरेटिव।

‘धर्म के नाम पर लूट’ का मुद्दा, असली राजनीतिक हथियार

दिग्विजय सिंह ने यात्रा की जमीन धर्म के नाम पर कथित लूट और श्रद्धालुओं की आस्था से खिलवाड़ के खिलाफ तैयार की है। यहां भी एक दिलचस्प रणनीति दिखाई देती है। अगर वह सीधे बीजेपी या किसी राजनीतिक दल के खिलाफ यात्रा निकालते तो इसे आसानी से राजनीतिक विरोध यात्रा कहा जा सकता था। लेकिन उन्होंने मुद्दा बनाया है धर्म में पारदर्शिता और आस्था की रक्षा का। इससे यात्रा को राजनीतिक विरोध से ज्यादा सामाजिक और धार्मिक अभियान के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश दिखाई देती है।

हालांकि सियासत में इसका राजनीतिक असर होना तय है। कांग्रेस के लिए चुनौती और मौका दोनों दिग्विजय सिंह की यह यात्रा कांग्रेस के लिए भी दोधारी तलवार हो सकती है। एक तरफ इससे पार्टी को यह संदेश देने का मौका मिलेगा कि कांग्रेस सनातन और हिंदू आस्था से दूरी बनाने वाली पार्टी नहीं है।

दूसरी तरफ दिग्विजय की पुरानी राजनीतिक छवि और उनके तीखे बीजेपी-विरोधी बयानों के कारण विरोधी दल इसे राजनीतिक मजबूरी या चुनावी रणनीति बता सकते हैं। यानी दिग्विजय के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी कि यात्रा को सिर्फ बयानबाजी न बनने दिया जाए। उन्हें यह साबित करना होगा कि “सनातन स्वाभिमान” सिर्फ चुनावी शब्द नहीं बल्कि उनके अभियान का वास्तविक उद्देश्य है।

2026 की सियासत में राम का नया संस्करण

इस यात्रा की घोषणा को व्यापक राजनीतिक परिदृश्य में देखें तो एक बड़ा बदलाव नजर आता है। अब राम के नाम पर राजनीति सिर्फ यह नहीं पूछ रही कि कौन राम के साथ है और कौन विरोध में।

नया सवाल है।
राम की आस्था पर अधिकार किसका है? सनातन की परिभाषा कौन तय करेगा?धर्म और राजनीति के बीच सीमा कौन खींचेगा? दिग्विजय सिंह की यात्रा इन्हीं सवालों के बीच अपनी जगह बनाने की कोशिश है। और सबसे दिलचस्प बात यह है कि दिग्विजय ने अपने राम राग की शुरुआत अपने अतीत की याद से की है। 1988-89 का राम शिला पूजन अभियान। आज की सनातन स्वाभिमान यात्रा। इन दोनों के बीच करीब चार दशक का अंतर है। लेकिन राजनीतिक संदेश एक ही धुरी पर घूमता दिखाई देता है।

राम आस्था के हैं, किसी दल के नहीं।

अब देखना यही होगा कि उज्जैन से अयोध्या तक दिग्विजय सिंह की यह यात्रा सिर्फ धार्मिक-सामाजिक अभियान बनती है या मध्य प्रदेश से निकलकर 2027 की चुनावी राजनीति में कांग्रेस के लिए एक नया सनातन नैरेटिव तैयार करती है।

Tags: #Digvijaya Rama refrain Sanatan Swabhiman Sanatan
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