भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में कल्याणकारी योजनाएं चुनावी रणनीति का सबसे बड़ा हथियार बनकर उभरी हैं। केंद्र और राज्य सरकारों ने सीधे नकद हस्तांतरण, मुफ्त राशन, छात्रवृत्ति, गैस, बिजली और सामाजिक सुरक्षा जैसी योजनाओं के जरिए मतदाताओं तक सीधा पहुंच बनाने की कोशिश की है। इन योजनाओं में महिलाओं को केंद्र में रखकर बनाई गई योजनाएं सबसे ज्यादा चर्चा में रही हैं। राजनीतिक दलों का मानना रहा कि महिलाओं को सीधे आर्थिक सहायता देकर एक स्थायी और भरोसेमंद वोट बैंक तैयार किया जा सकता है। हिन्दी भाषी राज्य ही नहीं पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सिर्फ योजनाओं का लाभ देना चुनावी जीत की गारंटी बन सकता है?
- क्या महिला कल्याण योजनाएं वोट में बदल पाईं? चुनाव नतीजों ने दिया बड़ा जवाब
- महिलाओं को मुफ्त योजनाएं मिलीं, लेकिन वोट क्यों खिसक गए?
- बंगाल से तमिलनाडु तक… महिला वोटरों ने क्यों बदला सियासी मूड?
- सिर्फ योजनाएं नहीं, सुरक्षा और नेतृत्व भी बना महिला वोट का मुद्दा
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- कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद क्यों हारीं सत्ताधारी पार्टियां?
- महिला मतदाताओं ने दिखाया नया ट्रेंड, मुफ्त योजनाओं से आगे की सोच
- क्या ‘लाभार्थी राजनीति’ की सीमाएं सामने आ गई हैं?
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महिलाओं ने योजनाओं का लाभ लिया, लेकिन वोट अलग तरीके से किया
चुनावी डेटा और पोस्ट पोल सर्वे बताते हैं कि जिन राज्यों में महिलाओं के लिए बड़ी योजनाएं चलाई गईं, वहां भी सत्ताधारी दलों को हार का सामना करना पड़ा। तृणमूल कांग्रेस, डीएमके और केरल के वामपंथी गठबंधन ने महिलाओं के लिए कई योजनाएं शुरू की थीं, लेकिन चुनाव परिणामों में इसका पूरा फायदा नहीं मिल पाया। विश्लेषकों का मानना है कि महिला मतदाता अब केवल योजनाओं के आधार पर वोट नहीं कर रही हैं। सुरक्षा, नेतृत्व, राजनीतिक माहौल, भ्रष्टाचार, स्थानीय मुद्दे और भविष्य की उम्मीदें भी उनके मतदान निर्णय को प्रभावित कर रही हैं।
पश्चिम बंगाल: योजनाओं के बावजूद टीएमसी को झटका
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार की सबसे चर्चित योजना ‘लक्ष्मीर भंडार’ रही, जिसके तहत महिलाओं को सीधे आर्थिक सहायता दी जाती थी। सर्वे के अनुसार लगभग 70 प्रतिशत महिलाओं ने माना कि उन्हें या उनके परिवार को इस योजना का लाभ मिला। वहीं ‘कन्याश्री प्रकल्प’ जैसी योजना, जिसका उद्देश्य लड़कियों की शिक्षा और बाल विवाह रोकना था, उसकी पहुंच भी बड़ी संख्या में महिलाओं तक रही। लेकिन दिलचस्प बात यह रही कि लाभार्थियों में भी बड़ी संख्या ने विपक्ष को वोट दिया।
‘लक्ष्मीर भंडार’ की लाभार्थी महिलाओं में लगभग 60 प्रतिशत ने टीएमसी का समर्थन किया, लेकिन 32 प्रतिशत महिलाएं बीजेपी के साथ चली गईं। वहीं जिन्हें योजना का लाभ नहीं मिला, उनमें भारी संख्या में महिलाओं ने बीजेपी को वोट दिया। यह साफ संकेत था कि योजना का लाभ मिलने के बावजूद महिला वोट पूरी तरह स्थिर नहीं रहा।
महिला सुरक्षा बना बड़ा चुनावी मुद्दा
पश्चिम बंगाल में महिला सुरक्षा चुनाव का बड़ा मुद्दा बनकर उभरी। आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना और कानून व्यवस्था को लेकर विपक्ष ने सरकार को लगातार घेरा। सर्वे के मुताबिक करीब 36 प्रतिशत महिलाओं ने माना कि टीएमसी सरकार में उनकी सुरक्षा स्थिति खराब हुई है। इनमें से अधिकांश महिलाओं ने बीजेपी को वोट दिया। यानी महिलाओं के मतदान व्यवहार में आर्थिक सहायता के साथ सुरक्षा और शासन की धारणा भी निर्णायक बनी।
केरल: योजनाओं की सीमित पहुंच का असर
केरल में वामपंथी सरकार ने महिला एवं बाल विकास और श्रमिक कल्याण से जुड़ी कई योजनाएं चलाई थीं। लेकिन इन योजनाओं की पहुंच सीमित रही। सिर्फ 18 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि उन्हें महिला एवं बाल विकास योजनाओं का लाभ मिला, जबकि श्रम कल्याण योजनाओं का फायदा केवल 11 प्रतिशत तक ही पहुंच पाया। लाभार्थियों में वामपंथी गठबंधन को अच्छा समर्थन मिला, लेकिन कुल संख्या कम होने के कारण इसका चुनावी असर सीमित रह गया। दूसरी ओर गैर-लाभार्थी महिलाओं का बड़ा वर्ग विपक्षी गठबंधन की ओर झुक गया, जिसने सत्ता परिवर्तन में अहम भूमिका निभाई।
तमिलनाडु में 8 ग्राम सोना देने का वादा कर गया काम
तमिलनाडु में महिलाओं का मतदान पैटर्न सबसे दिलचस्प रहा। यहां थलपति विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम महिलाओं और युवाओं के बीच बड़ी ताकत बनकर उभरी। विजय ने चुनावी रैलियों में गरीब महिलाओं को 8 ग्राम सोना देने का ऐलान किया था। राज्य में डीएमके सरकार की ‘मगलीर उरिमाई थोगई’ योजना के तहत महिलाओं को हर महीने आर्थिक सहायता दी जा रही थी और इसकी पहुंच करीब 71 प्रतिशत महिलाओं तक थी। इसके बावजूद महिला मतदाताओं में टीवीके सबसे बड़ी पसंद बनकर सामने आई। यानी बड़ी संख्या में महिलाओं ने सरकारी लाभ लेने के बावजूद बदलाव के पक्ष में मतदान किया। हालांकि ‘पुधुमई पेन्न’ और विधवा पुनर्विवाह सहायता जैसी सीमित लाभार्थी योजनाओं में डीएमके को अपेक्षाकृत बेहतर समर्थन मिला। इससे यह संकेत मिला कि जहां योजनाएं सीधे और प्रभावी तरीके से पहुंचीं, वहां कुछ हद तक राजनीतिक लाभ भी मिला।
महिला वोटर अब ज्यादा स्वतंत्र और जागरूक
इन तीनों राज्यों के चुनावी नतीजों ने एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है—महिला मतदाता अब केवल कल्याणकारी योजनाओं के आधार पर मतदान नहीं कर रही हैं। महिलाएं अब राजनीतिक नेतृत्व, सुरक्षा, भ्रष्टाचार, रोजगार, सामाजिक माहौल और भविष्य की संभावनाओं को भी उतनी ही गंभीरता से देख रही हैं। राजनीतिक दलों के लिए यह संकेत है कि सिर्फ नकद सहायता या योजनाएं चुनावी जीत सुनिश्चित नहीं कर सकतीं। योजनाओं के साथ भरोसेमंद शासन, मजबूत नेतृत्व और सकारात्मक राजनीतिक वातावरण भी जरूरी होता जा रहा है।
बदल रही है भारतीय चुनावी राजनीति
महिलाओं की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी भारतीय लोकतंत्र में बड़ा बदलाव मानी जा रही है। कई राज्यों में महिला मतदान प्रतिशत पुरुषों से बराबर या अधिक हो चुका है। यही वजह है कि सभी दल महिलाओं को केंद्र में रखकर राजनीति कर रहे हैं। लेकिन अब यह साफ होता जा रहा है कि महिला वोट बैंक कोई स्थायी या एकतरफा वोट बैंक नहीं है। महिला मतदाता भी अब बाकी मतदाताओं की तरह बहुआयामी सोच के साथ वोट कर रही हैं और यही भारतीय राजनीति के बदलते स्वरूप का सबसे बड़ा संकेत माना जा रहा है।





