4 मई की चुनावी हार के बाद बढ़ी नाराजगी, बैठकों, विवादों और बगावत ने तोड़ दिया ममता का किला
पश्चिम बंगाल की राजनीति में पिछले एक महीने के घटनाक्रम ने राज्य की सियासत की दिशा बदल दी। करीब तीन दशक पुरानी All India Trinamool Congress, जिसे कभी राज्य की सबसे मजबूत राजनीतिक ताकत माना जाता था, चुनावी हार के बाद ऐसे संकट में घिर गई कि पार्टी के भीतर बगावत, गुटबाजी और टूट की स्थिति पैदा हो गई। 4 मई को विधानसभा चुनाव में मिली हार से शुरू हुआ असंतोष 3 जून तक खुली फूट में बदल गया।
चुनावी हार ने हिलाई नींव
4 मई को घोषित विधानसभा चुनाव परिणामों में All India Trinamool Congress को करारी हार का सामना करना पड़ा। पार्टी को केवल 80 सीटें मिलीं, जबकि Bharatiya Janata Party ने 207 सीटों पर जीत दर्ज की। बाद में फाल्टा उपचुनाव जीतकर भाजपा का आंकड़ा 208 तक पहुंच गया। यह परिणाम टीएमसी के लिए बड़ा झटका था, क्योंकि पार्टी लगभग 15 वर्षों तक राज्य की सत्ता में रही थी।
हार के तुरंत बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व और रणनीति को लेकर सवाल उठने लगे। वरिष्ठ नेताओं और विधायकों के बीच असंतोष धीरे-धीरे खुलकर सामने आने लगा।
6 मई की बैठक बनी असंतोष की शुरुआत
चुनावी नतीजों के दो दिन बाद Mamata Banerjee ने कालिघाट स्थित अपने कार्यालय में नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक बुलाई। सूत्रों के अनुसार इस बैठक में उन्होंने नेताओं से Abhishek Banerjee की भूमिका की सराहना करते हुए तालियां बजाने को कहा।
यहीं से पार्टी के भीतर असंतोष का माहौल बनने लगा। कई नेताओं को लगा कि हार की समीक्षा करने के बजाय नेतृत्व कुछ खास चेहरों को आगे बढ़ाने में ज्यादा रुचि दिखा रहा है। इसके बाद विधायक दल के भीतर एकता कमजोर पड़ने लगी।
वरिष्ठ नेताओं ने उठाए सवाल
पार्टी की वरिष्ठ नेता Kakoli Ghosh Dastidar उन शुरुआती नेताओं में शामिल रहीं जिन्होंने पार्टी लाइन से अलग राय रखी। इसके बाद राज्यसभा सांसद Sukhendu Sekhar Roy समेत कई नेताओं ने संगठन और नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। इन घटनाओं ने यह संकेत दे दिया कि असंतोष केवल जमीनी स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच चुका है।
19 मई: दूसरी बैठक और खुला विरोध
19 मई को कालिघाट में आयोजित एक अन्य बैठक में विवाद और बढ़ गया। विधायक ऋतब्रत और एंटाली के विधायक संदीपन साहा ने खुलकर सवाल उठाए कि फाल्टा के नेता जहांगीर खान के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है, जबकि उन पर चुनाव के दौरान पार्टी से दूरी बनाने के आरोप लगे थे।
यह पहली बार था जब पार्टी मंच पर नेतृत्व के फैसलों को खुले तौर पर चुनौती दी गई। इससे संगठन के भीतर मौजूद गुटबाजी और स्पष्ट हो गई।
फर्जी हस्ताक्षर विवाद ने बढ़ाया संकट
25 मई को पार्टी के भीतर नया विवाद सामने आया। आरोप लगे कि विधानसभा अध्यक्ष को भेजे गए कुछ दस्तावेजों में फर्जी हस्ताक्षरों का इस्तेमाल किया गया। मामला विपक्ष के नेता से जुड़े प्रस्तावों का था।
दो दिन बाद 27 मई को ऋतब्रत और संदीपन साहा ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर इस मामले की शिकायत की। इसके बाद विधानसभा सचिवालय ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और जांच की जिम्मेदारी सीआईडी को सौंप दी गई।
यह विवाद पार्टी के भीतर विश्वास के संकट का प्रतीक बन गया और नेताओं के बीच दूरी और बढ़ गई।
गुप्त बैठकों से बगावत तक
सीआईडी जांच शुरू होते ही पार्टी के भीतर समान विचारधारा वाले विधायकों और नेताओं की गुप्त बैठकों का दौर शुरू हो गया। लगातार फोन कॉल, रणनीतिक बैठकों और अलग गुट बनाने की चर्चाओं ने संगठन को और कमजोर कर दिया।
सूत्रों के अनुसार कई विधायक नेतृत्व से नाराज थे और उन्हें लग रहा था कि चुनावी हार की जिम्मेदारी तय करने के बजाय असली मुद्दों को नजरअंदाज किया जा रहा है। धीरे-धीरे यह नाराजगी संगठित बगावत में बदलने लगी।
एक महीने में बदल गया राजनीतिक परिदृश्य
1 जनवरी 1998 को Mamata Banerjee द्वारा स्थापित टीएमसी ने बंगाल की राजनीति में लंबा सफर तय किया था। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद पार्टी जिस तेजी से संकट में घिरी, उसने राजनीतिक पर्यवेक्षकों को भी चौंका दिया।
4 मई को चुनावी हार, 6 मई से शुरू हुआ असंतोष, 19 मई की खुली नाराजगी, 25 और 27 मई का हस्ताक्षर विवाद और जून की शुरुआत तक गुटबाजी का खुलकर सामने आना—इन सभी घटनाओं ने मिलकर पार्टी की एकता को गंभीर रूप से प्रभावित किया।
पश्चिम बंगाल में टीएमसी की वर्तमान स्थिति केवल चुनावी हार का परिणाम नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे लंबे समय से पनप रहे अंदरूनी मतभेदों का विस्फोट भी माना जा रहा है। एक महीने के भीतर हुए घटनाक्रम ने यह दिखा दिया कि किसी भी राजनीतिक दल के लिए केवल जनाधार ही नहीं, बल्कि संगठनात्मक एकजुटता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि Mamata Banerjee इस संकट से पार्टी को कैसे बाहर निकालती हैं और क्या टीएमसी फिर से खुद को संगठित कर पाती है या नहीं।