भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यान: महिला पत्रकारिता में चुनौतियों का सामना करें: जयंती रंगनाथन

Bhuvan Bhushan Devalia Journalism Award

महिला पत्रकारिता में चुनौतियों का सामना करें: जयंती रंगनाथन

पत्रकारिता को अक्सर बाहर से देखने पर एक आकर्षक और ग्लैमरस पेशे के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक कठिन और चुनौतीपूर्ण है। भारत में महिला पत्रकारों को पत्रकारिता के क्षेत्र में आने वाली चुनौतियों का सामना कड़ी मेहनत, साहस और दृढ़ता के साथ करना चाहिए। यह बात जानी-मानी पत्रकार जयंती रंगनाथन ने कही।  वे माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान में आयोजित 15वीं वार्षिक ‘भुवन भूषण देवलिया व्याख्यानमाला’ में मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रही थीं। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि पत्रकारिता को कभी भी केवल ग्लैमर के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि यह पेशा जिम्मेदारी, संघर्ष और समाज के प्रति प्रतिबद्धता से जुड़ा हुआ है। इस दौरान वरिष्ठ पत्रकार दीप्ति चौरसिया को राज्य स्तरीय ‘भुवनभूषण देवलिया पत्रकारिता सम्मान 2026’ से अलंकृत किया गया।

सुरक्षित नौकरी छोड़कर चुना पत्रकारिता का रास्ता

जयंती रंगनाथन ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि करीब 40 वर्ष पहले उन्होंने बैंक की एक सुरक्षित नौकरी छोड़कर पत्रकारिता के क्षेत्र में आने का निर्णय लिया था। उस समय यह फैसला जोखिम भरा माना जाता था, क्योंकि पत्रकारिता में न तो आज जैसी पहचान थी और न ही कोई विशेष ग्लैमर। उन्होंने कहा कि उस दौर में पत्रकारिता पूरी तरह पुरुष प्रधान क्षेत्र था और महिलाओं की संख्या बेहद कम थी। बावजूद इसके उन्होंने अपने निर्णय पर विश्वास रखा और परिवार का भी पूरा समर्थन मिला। उन्होंने कहा कि जीवन में कई बार ऐसे निर्णय लेने पड़ते हैं जो चुनौतीपूर्ण होते हैं, लेकिन अगर दृढ़ निश्चय और मेहनत हो तो रास्ते अपने आप बनते जाते हैं।

चुनौतियों से मिला सम्मान और पहचान

जयंती रंगनाथन को अपने पत्रकारिता जीवन में टाइम्स समूह और धर्मयुग जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। उन्होंने बताया कि अपने कार्यकाल के दौरान उन्हें कई प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हर परिस्थिति का डटकर सामना किया। उनका मानना है कि कठिनाइयों से घबराने के बजाय उनका सामना करना ही व्यक्ति को मजबूत बनाता है। उन्होंने कहा कि चुनौतियों का सामना करने की इसी भावना ने उन्हें पेशेवर जीवन में सम्मान और पहचान दिलाई।

महिला पत्रकारों को दी महत्वपूर्ण सलाह

कार्यक्रम के दौरान जयंती रंगनाथन ने महिला पत्रकारों को कई महत्वपूर्ण सलाह भी दीं। उन्होंने कहा कि कार्यस्थल पर आत्मविश्वास बनाए रखना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा, “अगर आप अपनी कमजोरी के संकेत देती हैं या अपने निजी घरेलू समस्याओं को कार्यस्थल पर ज्यादा साझा करती हैं, तो संभव है कि आपके सहकर्मी आपको उतना सहयोग न दें।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि चुनौतियां केवल पत्रकारिता में ही नहीं, बल्कि हर पेशे में होती हैं। यह चुनौतियां केवल महिलाओं के सामने ही नहीं बल्कि पुरुषों के सामने भी आती हैं। इसलिए जरूरी है कि इनका सामना दृढ़ता और सकारात्मक सोच के साथ किया जाए।

भारत में महिला पत्रकारिता का इतिहास

कार्यक्रम में ‘महिला पत्रकारिता की चुनौतियां’ विषय पर बोलते हुए डॉ. मंगला अनुजा ने कहा कि भारत में महिला पत्रकारिता का इतिहास काफी पुराना है। उन्होंने बताया कि भारत में महिला पत्रकारिता का पहला उदाहरण वर्ष 1835 में देखने को मिलता है। उनके अनुसार यह तथ्य इस बात को दर्शाता है कि भारतीय महिलाएं पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने वैश्विक समकक्षों से बहुत पीछे नहीं रही हैं। हालांकि समय के साथ परिस्थितियां बदलती रही हैं, लेकिन महिलाओं ने हर दौर में अपनी प्रतिभा और मेहनत से पहचान बनाई है।

दोहरी पहचान की चुनौती

कार्यक्रम में भुवन भूषण देवरिया पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार दीप्ति चौरसिया ने भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि जब किसी समस्या को दूर से देखा जाता है तो वह बहुत बड़ी लगती है, लेकिन जब व्यक्ति उस चुनौती का सामना करता है तो वही समस्या धीरे-धीरे छोटी होती चली जाती है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के क्षेत्र में महिलाओं को अक्सर दोहरी पहचान की चुनौती से गुजरना पड़ता है—एक महिला होने की और दूसरी पत्रकार होने की। इसके बावजूद महिलाएं लगातार अपनी राह बना रही हैं और इस क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दे रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि समय के साथ कई पुरानी धारणाएं टूट रही हैं और अब समाज धीरे-धीरे महिलाओं को केवल उनके काम और योग्यता के आधार पर देखने लगा है।

मिशन से जुड़ी रहे पत्रकारिता

कार्यक्रम में निराला सृजन पीठ की निदेशक डॉ. साधना बलवाटे ने कहा कि पत्रकारिता के क्षेत्र में बढ़ते ग्लैमर के कारण मिशन की भावना कहीं न कहीं कमजोर हुई है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य समाज को सही और सार्थक जानकारी देना है, लेकिन आज कई बार यह उद्देश्य पीछे छूटता दिखाई देता है। उन्होंने यह भी कहा कि भले ही आज पत्रकारिता में आने वाली कुछ पारंपरिक चुनौतियां कम हुई हों, लेकिन महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी अपेक्षाकृत कम है। इसलिए इस दिशा में और प्रयास किए जाने की जरूरत है।

पत्रकारिता और साहित्य का संबंध

डॉ. साधना बलवाटे ने यह भी कहा कि पत्रकारिता और साहित्य एक-दूसरे के पूरक विषय हैं। पहले पत्रकारिता की भाषा में साहित्यिक सौंदर्य और संवेदनशीलता अधिक दिखाई देती थी, लेकिन समय के साथ यह तत्व कम होता गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि पत्रकारिता की भाषा में स्पष्टता, सादगी और सौंदर्य बनाए रखना बहुत जरूरी है, ताकि पाठकों तक विचार प्रभावी ढंग से पहुंच सकें। इस अवसर पर भुवन भूषण देवरिया व्याख्यानमाला समिति के सदस्यों सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक, पत्रकार, शोधार्थी और छात्र उपस्थित रहे। कार्यक्रम में वक्ताओं ने महिला पत्रकारिता के अतीत, वर्तमान और भविष्य पर गंभीर चर्चा करते हुए इस क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता पर भी बल दिया

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