भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यान: दीप्ति चौरसिया हुईं राज्यस्तरीय ‘भुवनभूषण देवलिया पत्रकारिता सम्मान 2026’ से अलंकृत
भोपाल। राजधानी भोपाल स्थित सप्रे संग्रहालय में आयोजित भुवनभूषण देवलिया स्मृति व्याख्यानमाला समिति के विशेष कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार दीप्ति चौरसिया को वर्ष 2026 का राज्यस्तरीय ‘भुवनभूषण देवलिया पत्रकारिता सम्मान’ प्रदान किया गया है। यह सम्मान उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके दीर्घकालिक, प्रभावशाली और सार्थक योगदान के लिए दिया गया।
भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यान का मुख्य विषय “पत्रकारिता में महिलाओं की चुनौतियाँ” रहा। जिस पर देश-प्रदेश के पत्रकारों, मीडिया विशेषज्ञों और बुद्धिजीवियों ने गंभीर विमर्श किया। इस अवसर पर दीप्ति चौरसिया की पत्रकारिता यात्रा, उनकी संपादकीय दृष्टि और सार्वजनिक सरोकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को विशेष रूप से रेखांकित किया गया। बता दें दीप्ति चौरसिया का नाम देश की प्रमुख प्रसारण पत्रकारों और संपादकीय नेतृत्वकर्ताओं में शामिल किया जाता है। उन्हें राजनीतिक पत्रकारिता, न्यूज़रूम प्रबंधन और रणनीतिक कंटेंट निर्माण में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव प्राप्त है। अपनी तेज़ संपादकीय दृष्टि और प्रभावशाली प्रस्तुति शैली के लिए जानी जाने वाली दीप्ति ने विभिन्न राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मंचों पर कई महत्वपूर्ण राजनीतिक बहसों और चुनावी कवरेज का सफल संचालन किया है।
वर्तमान में वे LiveIndia.news में संपादक के रूप में कार्यरत हैं। इसके साथ ही दूरदर्शन मध्यप्रदेश के लिए “इनसाइट विद दीप्ति चौरसिया” नामक विश्लेषणात्मक कार्यक्रम का निर्माण कर रही हैं। टेलीविजन, डिजिटल और यूट्यूब जैसे विभिन्न मंचों पर वे जनसरोकारों से जुड़े विषयों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती रही हैं। दीप्ति चौरसिया ने अपने लंबे पत्रकारिता करियर में देश के कई शीर्ष राजनीतिक नेताओं के विशेष साक्षात्कार लिए हैं, महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सम्मेलनों का संचालन किया है और व्यापम तथा आसाराम प्रकरण जैसी चर्चित खबरों को उजागर करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
IIMC से हिंदी पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा
शैक्षणिक रूप से भी उनका आधार मजबूत रहा है। उन्होंने वर्ष 1998 में भारतीय जनसंचार संस्थान IIMC नई दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त किया। जहां उन्होंने रिपोर्टिंग, संपादन और न्यूज़रूम संचालन की पेशेवर बारीकियों में विशेषज्ञता हासिल की। अपने करियर में वे इंडिया न्यूज एमपी-सीजी में कार्यकारी संपादक, न्यूज स्टेट एमपी-सीजी में उपसंपादक, टीवी 27 में परामर्श संपादक के साथ आजतक, हेडलाइंस टुडे और ईटीवी न्यूज में संवाददाता और रिपोर्टर के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभा चुकी हैं।
सम्मान प्राप्त करने के बाद दीप्ति चौरसिया ने कहा कि पत्रकारिता समाज के प्रति जिम्मेदारी का माध्यम है और इसमें महिलाओं की भागीदारी जितनी मजबूत होगी। मीडिया उतना ही संवेदनशील और संतुलित बनेगा। कार्यक्रम में उपस्थित पत्रकारों, शिक्षाविदों और मीडिया से जुड़े अनेक लोगों ने उन्हें इस सम्मान के लिए बधाई देते हुए इसे प्रदेश की पत्रकारिता के लिए गर्व का क्षण बताया।
अपने संबोधन में वरिष्ठ पत्रकार दीप्ति चौरसिया ने कहा जब किसी समस्या को दूर से देखा जाता है, तो वह पहाड़ की तरह विशाल दिखाई देती है। लेकिन, जब हम उससे गुज़र जाते हैं, तो वह बस ओझल हो जाती है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के क्षेत्र में महिलाओं को और भी बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। चुनौती दोहरी पहचान को संभालने में है।
एक महिला होना और एक पत्रकार होना… कोई आगे कैसे बढ़े?
दीप्ती चौरसिया ने कहा “न्यूज़रूम में अक्सर महत्वपूर्ण बीट्स विषय क्षेत्र पुरुष पत्रकारों को सौंपे जाते हैं। इसके अलावा, फील्ड कवरेज के दौरान भी महिला रिपोर्ट के साथ जाने में कैमरामैन अक्सर हिचकिचाते हैं। उन्होंने कहा कि आज भी लैंगिक भेदभाव महिला पत्रकारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। उदाहरण के लिए, उन्होंने कहा, छोटे शहरों में जब कोई बड़े नेता आते हैं, तो अक्सर महिला रिपोर्टरों को उस कार्यक्रम को कवर करने का काम नहीं सौंपा जाता है क्योंकि उन्हें अक्सर कमतर आंका जाता है। “घर पर, एक युवती को पत्रकारिता में करियर बनाने का चुनाव करते समय काफी बाधाओं का सामना करना पड़ता है। तीन मोर्चों पर संघर्ष—परिवार, फील्डवर्क और लैंगिक असमानता—के चलते, कई महिलाएं अंततः इस पेशे को छोड़ने पर मजबूर हो जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप, इस क्षेत्र में महिला रिपोर्टरों की संख्या कम है। वे अपेक्षाकृत जल्दी ही इस पेशे से बाहर हो जाती हैं। उन्होंने पूछा कि ऐसा क्यों है कि किसी बलात्कार पीड़िता की तस्वीर में उसे हमेशा शर्म से सिर झुकाए हुए ही दिखाया जाता है? उसे पलटकर लड़ते हुए क्यों नहीं दिखाया जाता?
पत्रकारिता में ग्लैमर को प्राथमिकता मिली तो सच ज़रूर दब जाएगा: जयंती रंगनाथन
भारत में महिला पत्रकारों से पत्रकारिता के क्षेत्र में आने वाली चुनौतियों का सामना कड़ी मेहनत और लगन से करने का आह्वान करते हुए, जानी-मानी राष्ट्रीय पत्रकार जयंती रंगनाथन ने इस मौके पर कहा कि पत्रकारिता को कभी भी ग्लैमर के नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए। क्योंकि, अगर पत्रकारिता में ग्लैमर को ज़्यादा अहमियत दी गई, तो इस बात की पूरी संभावना है कि सच कहीं दब जाएगा। जयंती रंगनाथन, जो राष्ट्रीय हिंदी दैनिक ‘हिंदुस्तान’ की एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं। यहां माधवराव सप्रे संग्रहालय एवं शोध संस्थान में आयोजित 15वीं वार्षिक ‘भुवन भूषण देवलिया व्याख्यानमाला’ में मुख्य वक्ता के तौर पर बोल रही थीं।
जयंती रंगनाथन ने कहा कि उन्होंने अपनी बैंकिंग की नौकरी छोड़कर रचनात्मक अभिव्यक्ति के रास्ते को चुना और ‘टाइम्स स्कूल’ के ज़रिए पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा। उन्होंने कहा कि उस समय जब पत्रकारिता एक पुरुषों का वर्चस्व वाला पेशा था। उन्हें अपने परिवार से पूरा सहयोग मिला। उन्होंने कहा कि वह पत्रकारिता के क्षेत्र में ग्लैमर के लिए नहीं, बल्कि एक मिशन की भावना के साथ आई थीं। उन्होंने ‘धर्मयुग’ जॉइन किया। उन्होंने बताया कि जब कुख्यात अपराधी चार्ल्स शोभराज जेल से भागा, तो भारती जी (पत्रिका के तत्कालीन प्रधान संपादक धर्मवीर भारती) ने उन्हें जाकर उसका इंटरव्यू लेने का काम सौंपा। उन्होंने कहा कि उस कहानी को कवर करने के लिए वह कुख्यात ‘कबाड़ गली’ में भी गईं। उनके इस काम से उन्हें सम्मान और पहचान मिली।
माधवराव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय और शोध संस्थान में शोध निदेशक की जिम्मेदारी संभाल रहीं डॉ.मंगला अनुजा ने कहा कि हमारे देश में महिला पत्रकारिता का पहला उदाहरण साल 1835 में देखने को मिला था। अब पत्रकारिता के क्षेत्र में भी भारतीय महिलाएं अपने वैश्विक समकक्षों से बहुत पीछे नहीं हैं। डॉ.अनुजा ने कहा महिलाओं को न केवल संघर्षों का सामना करना पड़ा। बल्कि उन्होंने संघर्ष के बीच सफलता भी हासिल की। कार्यस्थल पर उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ा। इतना ही नहीं उन्हें कमतर भी समझा गया साथ ही पदोन्नति से भी वंचित रखा गया। अक्सर उन्हें पुरुष पत्रकारों से कभी कोई सहयोग नहीं मिला।





