मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा उपचुनाव में भाजपा ने पूर्व गृह मंत्री डॉ.नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आरएसएस के करीबी और हाउसिंग बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया। यह फैसला इसलिए भी चौंकाने वाला रहा क्योंकि पिछले कई महीनों से डॉ.नरोत्तम मिश्रा को बीजेपी का स्वाभाविक उम्मीदवार माना जा रहा था। हालांकि बीजेपी ने बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हो रहे उपचुनाव में अपना पहले से घोषित उम्मीदवार को बदल दिया है। ऐसे में मध्यप्रदेश में भी एक संभावना यह नजर आ रही है कि एन वक्त पर बीजेपी आशुतोष तिवारी का टिकट बदल सकती है।
- डॉ.नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने पर बवाल
- दतिया में समर्थकों ने मचाया बवाल
- क्यों कटा डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट?
- क्या बदली बीजेपी की रणनीति?
- आखिरी वक्त में क्यों बदला उम्मीदवार?
- नरोत्तम की जगह आशुतोष पर भरोसा क्यों?
- क्या नए पावर सेंटर से बचना चाहती थी बीजेपी?
- फीडबैक, फैक्टर या अंदरूनी सियासत?
- दतिया में बगावत, बीजेपी की बढ़ी चुनौती
- समर्थकों का हंगामा, संगठन की अग्निपरीक्षा
- जीत से पहले घर संभालने की चुनौती
मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर भी बाई इलेक्शन होना है. सबको उम्मीद थी कि इस सीट से मध्य प्रदेश के पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ही चुनाव लड़ेंगे। लेकिन बीजेपी ने इस बार नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं दिया। दतिया से आशुतोष तिवारी बीजेपी के उम्मीदवार होंगे। आशुतोष तिवारी RSS के संभागीय संगठन मंत्री रह चुके हैं. एमपी हाउसिंग बोर्ड के अध्यक्ष रह चुके हैं। डॉ.नरोत्तम मिश्रा दतिया से तीन बार चुनाव जीत चुके हैं लेकिन पिछले इलेक्शन में कांग्रेस के राजेन्द्र भारती से चुनाव हार गए थे।
पार्टी ने स्थानीय समीकरण, जीत की संभावना और संगठनात्मक रिपोर्ट के आधार पर अंतिम समय में उम्मीदवार बदलने का निर्णय लिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला केवल चुनावी गणित तक सीमित नहीं था। नरोत्तम मिश्रा शिवराज सिंह चौहान सरकार में सबसे प्रभावशाली नेताओं में रहे हैं। यदि वे उपचुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचते, तो उनके फिर से मंत्री बनने और महत्वपूर्ण विभाग मिलने की संभावना थी। इससे प्रदेश भाजपा में एक नया शक्ति केंद्र उभर सकता था। ऐसे समय में, जबकि मौजूदा सरकार में कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल और विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर जैसे प्रभावशाली नेता पहले से मौजूद हैं। वहीं शिवराज सिंह चौहान, ज्योतिरादित्य सिंधिया और वीडी शर्मा भी मध्य प्रदेश की राजनीति में अपना प्रभाव रखते हैं। ऐसे में पार्टी किसी नए शक्ति केंद्र के उभरने का जोखिम नहीं लेना चाहती थी। तो क्या इन महारथियों के इशारे पर नरोत्तम मिश्रा को दतिया उपचुनाव में टिकट देने से बीजेपी पीछे हट गई, क्योंकि आखरी वक्त तक नरोत्तम मिश्रा का सिंगल नाम दिल्ली पहुंचा था। क्या आलाकमान ने एमपी के बड़े नेताओं के बीच संतुलन को ध्यान में रखते हुए आशुतोष तिवारी को मौका दिया। बीजेपी डॉ.नरोत्तम की जगह भी ब्राह्मण चेहरे पर ही भरोसा जताया। दतिया में ब्राह्मण और जाटव मतदाताओं की संख्या प्रभावशाली मानी जाती है।
आशुतोष तिवारी संघ की पृष्ठभूमि से आते हैं और स्थानीय संगठन में उनकी मजबूत पकड़ बताई जाती है। पार्टी को उम्मीद है कि इससे सामाजिक समीकरण और संगठन दोनों को लाभ मिलेगा। टिकट बदलने के बाद भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती आंतरिक असंतोष है। नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने विरोध प्रदर्शन किया और कई स्थानीय पदाधिकारियों ने नाराजगी जताई। दतिया में बूथ स्तर तक उनका मजबूत नेटवर्क माना जाता है, इसलिए चुनाव जीतने के लिए भाजपा को पहले अपने संगठन को एकजुट करना होगा।
राजेंद्र भारती ने सजा पर रोक के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया, लेकिन राहत नहीं मिलने से उनके चुनाव लड़ने की संभावना भी समाप्त हो गई… इधरडॉ.नरोत्तम मिश्रा पिछले कई महीनों से उपचुनाव की तैयारी में जुटे थे। उन्होंने क्षेत्र में लगातार जनसंपर्क किया, बैठकें कीं और नामांकन पत्र भी खरीद लिया था। ऐसे में उनका टिकट कटना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया।
आशुतोष तिवारी की बात करें तो वे लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा संगठन से जुड़े रहे हैं। वे ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में संभागीय संगठन मंत्री रह चुके हैं और वर्तमान में पार्टी के विभिन्न प्रकोष्ठों के प्रभारी हैं। संगठनात्मक अनुभव और स्थानीय स्वीकार्यता को उनकी सबसे बड़ी ताकत माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने 2023 विधानसभा चुनाव में नरोत्तम मिश्रा की करीब 7 हजार वोटों से हुई हार से सबक लिया है।
दतिया में मुकाबला केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच ही नहीं होगा… बल्कि भाजपा के लिए संगठनात्मक एकजुटता की भी परीक्षा होगी..डॉ.नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों की नाराजगी को शांत करना और नए उम्मीदवार के पक्ष में माहौल बनाना पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती होगी…दतिया उपचुनाव के नतीजे प्रदेश की आगामी राजनीतिक दिशा के लिए भी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।