दलाई लामा का 90वां जन्मदिन, आज घोषित कर सकते अपना उत्तराधिकारी…आखिर दलाई लामा से क्यों डरता है चीन…क्या तिब्बत के बाहर से होंगे अगले दलाई लामा?
तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा का आज रविवार 6 जुलाई 90वां जन्मदिन मनाया जा रहा है। हिमाचल प्रदेश स्थित धर्मशाला में विशेष आयोजन किए जा रहे हैं। बता दें धर्मशाला में तिब्बती मठ बना है। जिसमें आयोजित इस समारोह में हजारों भक्तों के साथ उनके अनुयायी एकत्रित हुए हैं। इस मौके पर यह भी कहा जा रहा है कि आज अपने जन्मदिन पर दलाई लामा अपना उत्तराधिकारी भी घोषित कर सकते हैं। आइये जानते हैं कैसे होता है दलाई लामा का चयन…और चीन को क्या रहता है दलाई नामा से डर…
कैसे होता है दलाई लामा का चयन
दलाई लामा यह शब्द दलाई और लामा से बनकर बना है दलाई एक मंगोल शब्द है। जिसका अर्थ होता है समंदर लामा तिब्बती भाषा से निकला हुआ शब्द है। जिसका अर्थ होता है गुरु यानी कि मास्टर दलाई लामा। मतलब ऐसा व्यक्ति जिसके अंदर ज्ञान का समंदर हो। दलाई लामा एक पद है जैसे भारत में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री का पद होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इन्हें जनता द्वारा चुना जाता है लेकिन दलाई लामा को जनता नहीं चुनती। अगला दलाई लामा कौन होगा। यह तय करने की प्रक्रिया काफी दिलचस्प होती है। इसे समझने के लिए हमें 900 साल पीछे जाना होगा सन 1357 से लेकर 1419 तक तिब्बत में एक धर्मगुरु हुए जिनका नाम था जे सिखंपा सिखंपा ने 1409 ईस्वी में एक स्कूल की नींव रखी जिसका नाम रखा गया जेगल स्कूल इसी स्कूल में एक होनहार छात्र पढ़ता था नाम था गेंदु ध्रुप आगे चलकर इन्हें बौद्ध धर्म में करुणा के देवता अवलोकतेश्वर का अवतार माना गया। गेंदु ध्रुप ही पहले दलाई लामा बने। ऐसी मान्यता है कि दलाई लामा कभी मरते नहीं है। वे अपना शरीर छोड़कर दूसरे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं साथ ही वह कुछ ऐसे संकेत छोड़ जाते हैं। जिससे पता चल सके कि अगला दलाई लामा कौन होगा। दलाई लामा की मृत्यु के 9 महीने के भीतर जिन बच्चों का जन्म होता है। उनके ऊपर बारीकी से नजर रखी जाती है। दलाई लामा ने जिन संकेतों की तरफ इशारा किया होता है। उस दिशा में बौद्ध भिक्षु रिसर्च करते हैं। एक लंबी प्रक्रिया के बाद हजारों लाखों बच्चों में से एक बच्चे की पहचान की जाती है। फिर उसे कठिन परीक्षाओं का सामना करना पड़ता है। तब जाकर वह बच्चा अगला दलाई लामा बनता है।
तिब्बत पहाड़ और पठारों से घिरा एक इलाका जिसे आज चीन अपना हिस्सा मानता है। इसी तिब्बत के एक छोटे से गांव तक्षशीर में किसान परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ नाम रखा गया लहामो थंडोब नन्हे थंडोब की एक आदत बहुत निराली थी। उसे जहां कहीं टेबल या उसके आकार की बनी कोई चीज दिखती वो उसके सिराहाने पर बैठने की जिद करने लगता और अगर कोई उसे वहां से हटाने की कोशिश करता तो वह नाराज हो जाता एक और दिलचस्प किस्सा है। थुडुप के पास एक छोटी सी पोटली थी। उस पोटली को वो दिन भर अपने पास रखता। उसमें कुछ सामान भरकर घर की चार दीवारी में घूमता रहता। एक बार की बात है। थुंड ने पोटली में सामान भर लिया और मां से तोतली जुबान में कहने लगा मां मां मैं लहा सा जा रहा हूं। मां ने मुस्कुराते हुए कहा ठीक है। बेटा जवाब सुनकर थुणुक दोबारा खेल में उलझ गया, लेकिन यह महज एक खेल नहीं था। उस बच्चे की तकदीर थी जो बार-बार उसे उसकी मंजिल की ओर ले जाने के लिए हिलरे मार रही थी। यह थे 14वें दलाई लामा।
कैसे शुरु हुई 14वं दलाई लामा की कहानी
कहानी 14वें दलाई लामा तीन जिन ज्ञात्स की कैसे एक सपने से शुरू हुई 14वें दलाई लामा की खोज एक बच्चे पर आकर ठहर गई। उस बच्चे के सामने जब 13वें दलाई लामा की छड़ी रखी गई तो उसने क्या किया और कैसे तनजिन ज्ञात्स 14वें दलाई लामा बने बात होगी तिब्बत और चीन के सदियों पुराने चले आ रहे विवाद की और साथ ही उन घटनाओं पर भी नजर मारेंगे जब दलाई लामा ने चीन के आगे घुटने टेकने की बजाय पूरी कौम की उम्मीद बनकर निर्वासन का रास्ता चुना इस एपिसोड में जानेंगे दलाई लामा के ग्रेट एस्केप की पूरी कहानी और साथ ही उस सवाल को भी टटोलने की कोशिश करेंगे कि निर्वासन के बाद दलाई लामा ने अपने स्थाई ठिकाने के तौर पर आखिर भारत को ही क्यों चुना दलाई लामा के जीवन के उन पहलुओं पर भी नजर मारेंगे जिसके चलते एक तरफ टाइम मैगजीन उन्हें दुनिया के 25 सबसे बड़े नेताओं की फहरिस्त में शामिल करती है तो दूसरी तरफ उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ विवाद भी हैं जो उनके इर्द-गिर्द कंट्रोवर्सी क्रिएट करते हैं।
5 साल की उम्र ही बन गए थे थोंडुप अब दलाई लामा
तिब्बती बौद्ध परंपरा के जानकार बताते हैं कि नन्हे थोंडुप की यह आदतें इस ओर इशारा कर रही थी कि वह कोई साधारण बच्चा नहीं है। यह बात सच साबित हुई और महज 5 साल की उम्र में वह बच्चा 14वां दलाई लामा बना और उसका नाम लहामो थोंडुप से बदलकर तंजन ज्ञातसो रख दिया गया ।वही तनजिन ज्ञात सो जिन्हें एक दिन चीनी सेना के खौफ से वेश बदलकर अपना वतन अपना घर और अपनी जमीन छोड़नी पड़ी। 15 दिनों तक पैदल चले दुनिया को लगा कि उनकी मौत हो गई लेकिन यह महज एक अफवाह थी हिमालय के रास्ते होते हुए दलाई लामा तजिन ज्ञात्सो भारत पहुंचे भारत में पनाह मांगी और पंडित नेहरू ने अपनी बाहें खोल दीं।
थुपिन ज्ञात्सो थे 13वें दलाई लामा
अब कौन सा बच्चा अगला दलाई लामा बनेगा इसकी प्रक्रिया को समझने के लिए कहानी को थोड़ा फास्ट फॉरवर्ड करते हैं मौजूदा दलाई लामा 14वें नंबर के दलाई लामा है उनसे पहले जो 13वें दलाई लामा थे उनका नाम था थुपिन ज्ञात्सो साल 1933 में 57 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई मौत के बाद 13वें दलाई लामा ने कुछ संकेत दिए जिनके आधार पर 14वें दलाई लामा की खोज शुरू हुई दरअसल मृत्यु के बाद 13वें दलाई लामा की डेड बॉडी दक्षिण दिशा से घूमकर उत्तर पूर्वी दिशा की तरफ मुड़ जा रही थी इसके कुछ ही दिनों बाद पंचे लामा को एक सपना आया पंचे लामा यानी दलाई लामा के सबोर्डिनेट मतलब दलाई लामा के बाद की पोजीशन आगे आप पंचम लामा का जिक्र कई बार सुनेंगे तो इसे थोड़ा ध्यान में रखिएगा खैर वापस आते हैं पंचम लामा के सपने पर उनको सपने में दिखी तिब्बत के दक्षिण में स्थित एक पवित्र झील लहामो लहत्सो झील में उन्हें दिखा कि तीन तिब्बती अक्षर पानी के ऊपर तैर रहे हैं यह अक्षर थे आ का और मा।
सपने में उन्हें एक तीन मंजिला मठ भी दिखा जिसकी छत फिरोजी और सुनहरी रंग की थी वहां एक रास्ता था जो एक पहाड़ी इलाके की तरफ जा रहा था आखिर में उन्हें एक घर की छत दिखी जिसके ऊपर टेढ़े-मेढ़े आकार का एक पेड़ था इस सपने के आधार पर 14वें दलाई लामा की खोज शुरू हुई पंचेन लामा ने सोचा कि उन तीन अक्षरों में से आ का मतलब अमद दो हो सकता है जो तिब्बत का उत्तर पूर्वी इलाका है याद रहे 13वें दलाई लामा की डेड बॉडी भी घूम कर उत्तरपूर्वी दिशा में ही जा रही थी जिसके बारे में हमने आपको पहले ही बताया अब बौद्ध साधु संतों की जिम्मेदारी थी अमदो इलाके से उस बच्चे की तलाश करना जो तिब्बत का अगला दलाई लामा बनने वाला था एक सर्च टीम बनाई गई और उसे उत्तरपूर्वी दिशा में भेज दिया गया इधर साल 1935 में लामो थोंडुप नाम के एक बच्चे का जन्म हो चुका था जिसके बचपन के किस्सों के बारे में हम पहले ही जिक्र कर चुके हैं सर्च पार्टी अपने मकसद की तरफ रवाना हो चुकी थी जब सर्च पार्टी के सदस्य कुंभुम मठ पहुंचे तो उन्हें लगने लगा कि शायद वे सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं क्योंकि उन्हें आह यानी अमदो के बारे में पहले से ही पता चल चुका था अब उन्हें लगने लगा कि शायद का का मतलब कुंभुम मठ हो सकता है। जिसकी छत पर टेढ़े-मेढ़े आकार का पेड़ हो काफी जद्दोजहद के बाद उन्हें एक गांव दिखा जो पहाड़ी से घिरा हुआ था गांव में एक घर था जिसकी छत पर देवदार की टेढ़ी-मेढ़ी लकड़ियां लगी थी वह घर किसी और का नहीं बल्कि लहामो थोंडुब का था सर्च पार्टी को अब यकीन हो चुका था कि अगला दलाई लामा उन्हें यहीं मिलेगा फिर भी उन्होंने अपने मकसद को छुपाए रखा लहामो थोंडुब के पिता से सर्च पार्टी के सदस्यों ने कहा कि हम काफी लंबे सफर से थक कर आए हैं क्या आप हमें अपने घर पर एक रात ठहरने की इजाजत दे सकते हैं। लहामो थोंडुप के पिता राजी हो गए सर्च पार्टी के लीडर केत्सुंग रिन पोछे ने अपना ज्यादातर वक्त लहामो थोंडुप के साथ खेलते हुए बिताया वह बच्चे की हर छोटी बड़ी गतिविधियों पर नजर बनाए हुए थे। थोड़ा वक्त गुजरा ही था कि लहामोडुप ने सर्च पार्टी के लीडर क्यूसंग रिन पोछे को पहचान लिया बच्चे ने तेज आवाज में कहा सेरा लामा सेरा लामा असल में सेरा लामा के उत्सुंग ऋण पोछे का मठ था अगले दिन सर्च पार्टी के लोग वहां से चले गए कुछ ही दिनों बाद वह एक बार फिर लौटे इस बार वह कुछ सामान लेकर आए थे चश्मा डमरू और कुछ छड़ियां इनमें से कुछ सामान 13वें दलाई लामा का था बच्चे को एक आसन पर बैठाया गया और उनसे सामान की पहचान करने को कहा गया बच्चे ने 13वें दलाई लामा के सारे सामान को पहचान लिया और कहा कि यह मेरा है आखिर में उसने एक छड़ी उठाई और उसे अपने सीने से लगा लिया। वह छड़ी 13वें दलाई लामा थुपतिन ज्ञातसो की थी फिर क्या था सर्च पार्टी के सभी सदस्य उस बच्चे के सामने नतमस्तक हो गए तिब्बत को अब अगला दलाई लामा मिल चुका था साल 1939 की गर्मियों में लहामो थोंडुप ने राजधानी लहासा के लिए यात्रा शुरू की इस यात्रा में उनके माता-पिता उनके भाई लोपसांग समतेन खोज दल के सदस्य और अन्य यात्री शामिल थे। लहासा पहुंचने के बाद उनका खूब सम्मान हुआ फिर उन्हें पोताला पैलेस ले जाया गया। पोताला पैलेस वह इमारत है। जहां दलाई लामा रहते थे एक रस्म है कि दलाई लामा बनने के बाद पहले के नाम को छोड़ना होता है। जिसके चलते थुडुप का नाम बदलकर जंपेल नगवांग लोबसांग यशे तनजिन ज्ञात रख दिया गया। फिर शुरू हुई शिक्षा दीक्षा शिक्षा नालंदा परंपरा पर आधारित थी। जिसमें पांच मुख्य और पांच सहायक विषय पढ़ाए जाते थे। मुख्य विषय थे तर्कशास्त्र ललित कला संस्कृत व्याकरण चिकित्सा और सबसे अहम बौद्ध दर्शन।
1950 वो साल था जब तिब्बत को चीन के कब्जे का डर सताने लगा था ऐसे में दलाई लामा को महज 15 साल की उम्र में ही तिब्बत की सरकार का पूर्ण राजनीतिक नियंत्रण सौंपा गया लेकिन इसके महज 9 साल बाद कुछ ऐसा होने वाला था कि दलाई लामा को ना चाहते हुए भी तिब्बत से निर्वासन का रास्ता चुनना पड़ा जिसे इतिहास में कहा जाता है द ग्रेट एस्केप [संगीत] दलाई लामा के तिब्बत से निर्वासन की कहानी जानने से पहले हमें चीन और तिब्बत के 250 साल पहले के इतिहास को जानना जरूरी है सन 1720 में चिंग साम्राज्य ने तिब्बत पर आक्रमण कर दिया उन्होंने खाम और आमदो नाम के दो प्रांतों पर कब्जा कर लिया साल 1724 आते-आते इन दो इलाकों का नाम बदलकर चिंगघाई कर दिया गया बाकी जो भी हिस्से बचे उन्हें चिंग साम्राज्य की ट्रिब्यूटरी घोषित कर दिया गया मतलब यह इलाके कुछ हद तक आजाद तो थे लेकिन कुछ हद तक इन पर चिंग साम्राज्य का दबदबा था कहानी में थोड़ा आगे बढ़ते हैं साल 1911 की बात है चीन में शिन्हाई नाम से एक क्रांति हुई इस क्रांति से एक दल वजूद में आया रिपब्लिक ऑफ चाइना शॉर्ट में कहें तो आरओसी।
आरओसी ने चिंग साम्राज्य को हराकर चीन पर अपना कब्जा जमा लिया। चिंग साम्राज्य को तिब्बत छोड़कर भागना पड़ा उस वक्त तिब्बत के दलाई लामा थे। थुपतिनसो। उन्होंने तिब्बत को एक आजाद मुल्क घोषित कर दिया। उधर चीन में नई सरकार आ चुकी थी। रिपब्लिक ऑफ चाइना आरओसी भी तिब्बत को चीन का हिस्सा मानती थी। यानी उसे भी तिब्बत की आजादी से चिढ़ थी मामला काफी पेचीदा था। इसे निपटाने के लिए ब्रिटेन को मध्यस्थता करनी पड़ी। 1914 में शिमला में एक समझौते की बात चली। ब्रिटेन चीन और तिब्बत के प्रतिनिधि एक टेबल पर बैठे। जिसे शिमला कन्वेंशन के नाम से जाना जाता है शिमला कन्वेंशन पर तिब्बत और ब्रिटेन ने तो हस्ताक्षर कर दिए लेकिन चीन ने खुद को अलग कर लिया। तिब्बत और ब्रिटेन के बीच रिश्ते बेहतर होते चले गए आने वाले 40 सालों तक तिब्बत एक स्वतंत्र देश बना रहा। साल 1912 से लेकर 1950 तक तिब्बत पर किसी बाहरी ताकत का प्रभाव नहीं था। लेकिन धीरे-धीरे तिब्बत के हाथों से यह आजादी निकलने वाली थी। साल 1949 की बात है चीन में एक कम्युनिस्ट क्रांति हुई उस वक्त चीन में आरओसी की सरकार थी। आरओसी के सामने खड़ी थी। पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना जिसे शॉर्ट में पीआरसी कहा गया। इसका नेतृत्व कर रहे थे माओजेडोंग माओजेडोंग की आर्मी का नाम था पीपल्स लिबरेशन आर्मी यानी पीएलए पीएलए ने चीन में पहले से मौजूद आरओसी सरकार को शिकस्त दे दी। चीन में अब माओ जेडोंग की सरकार थी जो तिब्बत पर गिद्ध की तरह घात लगाए बैठी थी साल 1950 चल रहा था रेडियो बीजिंग पर एक घोषणा हुई जेडोंग सरकार की तरफ से कहा गया कि पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने साल 1950 के लिए एक टारगेट सेट किया है यह टारगेट था तिब्बत की तथाकथित आजादी और इस मुहिम में पीएलए के साथ खड़े थे तिब्बत के 10वें पंचिलम लामा चौके गलसे पंचिम लामा यानी दलाई लामा के बाद की सबसे बड़ी धार्मिक पोजीशन लेकिन तिब्बत के 10वें पंचन लामा ने माउज़डोंग की कम्युनिस्ट पार्टी के फैसले का समर्थन क्यों किया इसके पीछे भी एक कहानी है माओ जेडोंग से पहले की सरकार ने तिब्बत में एक बच्चे को पंचन लामा घोषित कर दिया था ताकि वह जेडोंग के खिलाफ विपक्ष बनकर खड़ा हो सके लेकिन जैसे ही पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ने आरओसी को शिकस्त दी 12 साल के पंचे लामा ने पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को सपोर्ट करना शुरू कर दिया पंचे लामा ने कहा तिब्बत की आजादी अब ज्यादा दूर नहीं है मैं सभी तिब्बत वासियों की तरफ से अपना पूरा सम्मान और समर्थन देना चाहता हूं कुल जमा बात यह थी कि 12 साल का पंचेनामा एक कठपुतली की तरह काम कर रहा था।
देखते ही देखते 1 जनवरी 1950 को पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ने तिब्बत को अपने कब्जे में ले लिया। सबूत में पेश किया गया पंचे लामा का वो स्टेटमेंट जिसमें वह कह रहे थे कि पूरा तिब्बत चीन सरकार को अपना समर्थन देना चाहता है। इस सबके बीच तिब्बत सरकार से यह कहा गया था कि 16 सितंबर 1950 से पहले वो अपना प्रतिनिधिमंडल चीन भेज दें। लेकिन तिब्बत की ओर से चीन के इस फरमान का बहिष्कार किया। जिसके बाद तिब्बत के भीतर माउज़डोंग की सरकार ने सेना को उतार दिया। धीरे-धीरे चीनी सेना की तादाद लगभग 80 तक पहुंच गई जैसे-जैसे वक्त बीतता गया तिब्बत के हालात और ज्यादा नाजुक होते चले गए। लोगों ने सलाह दी कि वक्त आ गया है कि दलाई लामा को अब पूरे तिब्बत का पॉलिटिकल लीडर घोषित कर दिया जाए।
इसे लेकर एक सर्वसमति से फैसला लिया गया। जिसमें 17 नवंबर 1950 को महज 15 साल की उम्र में दलाई लामा को पूरे तिब्बत का पॉलिटिकल लीडर घोषित कर दिया गया था।
15 साल के दलाई लामा चीन के इन्वजन के खिलाफ खुलकर बोलने लगे। उन्होंने यूनाइटेड नेशन से भी मदद मांगी। यूएन से अपील की गई कि वह चीन पर दबाव बनाए यूएन जनरल असेंबली में चाइना के इन्वज़न के खिलाफ चर्चा भी हुई 18 नवंबर 1950 को यूनाइटेड नेशंस ने चीन की खुले तौर पर आलोचना की लेकिन चीन पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। हालांकि दबाव बढ़ता देख चीन ने एक समझौते का प्रस्ताव रखा। जिसे 17 पॉइंट्स एग्रीमेंट कहा जाता है इस एग्रीमेंट के पहले पॉइंट में लिखा था कि तिब्बत के लोग एकजुट होंगे। उन्हें उनकी मातृभूमि यानी पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना में शामिल होना होगा। पहले पॉइंट को पढ़कर तिब्बती प्रतिनिधियों का खून खौलने लगा। लेकिन चीन ने यहां भी गेम खेला था। आगे के पॉइंट्स के जरिए वो तिब्बती प्रतिनिधियों को लुभाने में कामयाब हो गए लेकिन वो पॉइंट्स क्या थे यह पॉइंट थे तिब्बत को स्वायत्तता दी जाएगी। बौद्ध धर्म का सम्मान किया जाएगा। दलाई लामा के पोस्ट के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। उनकी प्रतिष्ठा का पूरा सम्मान किया जाएगा।
पहली शर्त को छोड़कर बाकी जितने भी वादे किए गए थे। वे तिब्बत को रिझाने के लिए ही किए गए थे। इसका असर यह हुआ कि एग्रीमेंट पास हो गया। तिब्बत की आम जनता ने भी इसका विरोध नहीं किया यहां तक कि दलाई लामा ने भी समझौते के लिए हामी भर दी लेकिन जेडोंग सरकार जुबान पर कुछ और दिल में कुछ और लेकर बैठी थी। 17 बिंदुओं के समझौते में जो भी वादे किए गए थे उनका जमीन पर कोई पालन नहीं हुआ माओ एडोंग ऐसे नेता थे जो कट्टर कम्युनिस्ट विचारधारा के समर्थक थे। उन्हें किसी धर्म से कोई लगाव नहीं था। वो एक देश एक संस्कृति एक राष्ट्र के सिद्धांत में विश्वास रखते थे। धीरे-धीरे तिब्बत की स्थिति तेजी से बदलने लगी। तिब्बती संस्कृति पर हमले शुरू हो गए। तिब्बत में कभी 6000 से ज्यादा बौद्ध मठ हुआ करते थे लेकिन धीरे-धीरे इनकी संख्या घटती चली गई चीनी सरकार द्वारा बर्बरता का दौर शुरू हो चुका था।
नवंबर 1956 की बात है भगवान बुद्ध की सालगिरह थी। इस मौके पर दलाई लामा भारत आए लोगों ने खूब स्नेह दिया। इसी समारोह में हिस्सा लेने के लिए चीनी प्रीमियर चाऊंड लाई भी भारत आए थे। ब्रिटिश लेखक अलेक्जेंडर नॉर्मन दलाई लामा की इस यात्रा के दौरान घटित एक दिलचस्प घटना का जिक्र करते हुए लिखते हैं “दलाई लामा ट्रेन से नई दिल्ली पहुंचे। उन्हें अपने साथियों के साथ हैदराबाद हाउस में ठहरना था। जब वह ट्रेन से उतरे भारत में चीन का राजदूत उनसे मिलने पहुंचा। चीनी राजदूत अपनी कार से दलाई लामा को चीनी दूतावास लेगया। जबकि भारत सरकार की ओर से दलाई लामा और उनके साथियों को लाने के लिए सरकारी गाड़ियां भेजी थी। सारी कारें हैदराबाद हाउस में इकट्ठी हुईं। जब दलाई लामा वहां नहीं दिखे तो हंगामा मच गया फिर देश विदेश के कई खास दफ्तरों के फोन बजने लगे। तब जाकर पता चला कि दलाई लामा को चीन के दूतावास में रखा गया है। वहां चीनी प्रीमियर चाऊ इन लाई ने धमकी तक दे दी थी कि वो भारत से संबंध रखेंगे तो कुछ भी हासिल नहीं होगा। भारत सरकार के दबाव के बाद दलाई लामा को दूतावास से छोड़ा गया। इस दौरे पर दलाई लामा की मुलाकात तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से हुई नेहरू ने तिब्बत के मसले पर कोई भी मदद करने से इंकार कर दिया। वजह थी भारत और चीन के बीच का पंचशील समझौता। इसमें एक शर्त यह भी थी कि भारत और चीन एक दूसरे के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देंगे। इस समझौते के बाद नेहरू सरकार ने तिब्बत से भारतीय सेना को भी वापस बुला लिया था। जिसकी आज भी आलोचना होती है। 11 हफ्ते भारत में रहने के बाद दलाई लामा वापस तिब्बत चले गए अब तक तिब्बत की स्थिति और भी ज्यादा खराब हो चुकी थी चीनी सेना का दमन काफी बढ़ चुका था मई 1958 से फरवरी 1959 के दौरान दलाई लामा की परीक्षा हुई 45 विद्वानों की टीम से उनका शास्त्रार्थ हुआ दलाई लामा ने अच्छे ग्रेड से इन परीक्षाओं को पास कर लिया जिसके बाद उन्हें गेशे लहरप्पा सम्मान से नवाजा गया इस तरह दलाई लामा की अब औपचारिक शिक्षा पूरी हो चुकी थी।
तब चीन के सामने दीवार बनकर खड़े थे बौद्ध भिक्षु
तिब्बत पर चीनी कब्जे के बीच अगर कोई दीवार बनकर खड़ा था तो वह थे बौद्ध भिक्षु जिनके लीडर थे दलाई लामा मार्च 1959 में लहासा में अफवाह फैलने लगी कि दलाई लामा को चीन जान से मारना चाहता है इस अफवाह को और हवा मिल गई जब चीनियों ने दलाई लामा को एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए निमंत्रण भेजा दलाई लामा से कहा गया कि वह सिक्योरिटी गार्ड को साथ लेकर ना आए इस खबर को सुनने के बाद दलाई लामा के महल नर बुलिंका के चारों तरफ हजारों की संख्या में भीड़ इकट्ठा होने लगी।
दरअसल भीड़ को यह अंदेशा था कि चीन की मंशा दलाई लामा को बुलाकर उन्हें गिरफ्तार करने की है। अपने महल के चारों तरफ बढ़ती भीड़ को देखकर दलाई लामा ने फैसला किया कि चीनियों की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में हिस्सा लेने वे नहीं जाएंगे।
लेखिका निरुपमा राव अपनी पुस्तक द फ्रैक्चरर्ड हिमालय इंडिया तिब्बत चाइना 1959—1962 में यह लिखती हैं कि 16 मार्च तक यह खबर आने लगी कि चीनी फौज दलाई लामा के महल नॉर बुलिंका को नष्ट करने की तैयारी में जुट गई है । महल को चारों तरफ से तोपों से घेरना शुरू कर दिया इस बात की भी अफवाह थी कि चीनी सैनिक हवाई जहाजों से लहासा पहुंचना शुरू हो गए हैं देखते ही देखते महल के बाहर गोले बारूद फटने लगे दलाई लामा को उनके नजदीकी सलाहकारों ने सलाह दी कि वह जितनी जल्दी हो सके लहासा छोड़ दें दलाई लामा अपने सलाहकारों की बात मानने को तैयार हो गए लेकिन बड़ा सवाल यह था कि वह लहासा से बाहर जाएंगे कैसे बाहर भारी संख्या में चीनी सैनिकों का पहरा था तय हुआ कि दलाई लामा अपनी वेशभूषा बदलकर बाहर निकलेंगे उन्होंने साधारण तिब्बती सेना के अधिकारी की वेशभूषा अख्तियार की और फिर मां छोटे भाई-बहनों और अपने नजदीकियों के साथ महल छोड़ दिया दलाई लामा की मां और बहनों ने पुरुषों का वेश धारण किया हुआ था दलाई लामा अपनी आत्मकथा माय लैंड एंड माय पीपल मेमोयर ऑफ द लामा में लिखते हैं। रात 10 बजे अपना चश्मा उतार कर एक साधारण तिब्बती सैनिक के भेष में चूबा और पतलूून पहने हुए बाहर निकला। बाएं कंधे पर एक राइफल टंगी थी। उस मुश्किल सफर को याद करते हुए दलाई लामा ने लिखा है जब हम भीड़ को पार करते हुए बाहर की ओर निकले तो हमें किसी ने नहीं पहचाना। पहचाने जाने के डर से मैंने चश्मा तो उतार दिया था लेकिन उस समय मुझे सामने कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। जब हम निकले तो हमें अंदाजा नहीं था कि हम अगला दिन देख भी पाएंगे या नहीं। वो तारीख थी 17 मार्च 1959 की। इसके बाद शुरू हुआ एक लंबा और कठिन सफर तारीख थी 25 मार्च 1959 तज़न ठिठोंग अपनी किताब दलाई लामा एन इलस्ट्रेटेड बायोग्राफी में लिखते हैं कि इस दिन दलाई लामा ने एक विशेष कोड के जरिए अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए को संदेश भेजा कि वे सुरक्षित हैं। असल में अमेरिकी सरकार दलाई लामा की सुरक्षा को लेकर काफी चिंतित थी हर 24 घंटे बाद दलाई लामा के दल के सफर की रिपोर्ट अमेरिकी राष्ट्रपति आइजन हावर के टेबल पर होती थी दलाई लामा ने सीआईए के अधिकारियों को संदेश भेजा था कि वे भारत में शरण लेना चाहते हैं सीआईए के एक वरिष्ठ अधिकारी जॉन ग्रीनी को 28 मार्च के दिन जब यह खबर मिली तो उन्होंने तुरंत भारत सरकार को संदेश भेजा कि दलाई लामा तिब्बत छोड़ चुके हैं। भारत में पनाह लेना चाहते हैं। अब सवाल उठता है कि दलाई लामा ने भारत को ही क्यों चुना। इसके पीछे जानकार वजह बताते हैं जैसे भारत और तिब्बत का प्राचीन रिश्ता रहा है। तिब्बत में फैले बौद्ध धर्म की जड़े भारत से ही निकली हैं।
वहीं साल 1950 में जब चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया तब भारत ने तिब्बती शरणार्थियों को सीमित तौर पर शरण दी थी। दलाई लामा ने भारत में शरण इसलिए भी लेने की सोची क्योंकि भौगोलिक रूप से भारत आना उनके लिए आसान था क्योंकि अरुणाचल प्रदेश के त्वांग और हिमाचल की सीमा तिब्बत से जुड़ी हुई है। इधर 26 मार्च को दलाई लामा ने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से आग्रह करते हुए संदेश भेजा। पूरी दुनिया में भारत के लोग मानवीय मूल्यों के समर्थन के लिए जाने जाते हैं। हम सोना इलाके के रास्ते भारत में प्रवेश कर रहे हैं और पूरे आशा है कि आप भारत की पावन धरती पर हमारे रहने का प्रबंध करेंगे। हमें आपकी मेहरबानी पर पूरा विश्वास है। इसी बीच दार्जिलिंग में रह रहे दलाई लामा के भाई गैलो थोंडुप नेहरू से मिल चुके थे। अपनी किताब द नूडल ऑफ कालिंगपोंग में वे लिखते हैं वे जवाहरलाल नेहरू से उनके संसद भवन वाले दफ्तर में मिला। इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रमुख बीए एन मलिक की मदद से यह मुलाकात संभव हो सकी थी। नेहरू ने मुझे पहला सवाल पूछा दलाई लामा सुरक्षित तो हैं। मैंने दलाई लामा के भारत में शरण लेने के अनुरोध के बारे में उन्हें बताया तो पंडित जवाहरलाल नेहरू ने तत्काल ही इसके लिए हां कर दी थी। 15 दिन तक निरंतर यात्रा के बाद दलाई लामा अखिरकार भारत पहुंच गए थे। उन्हें और उनके साथ आए सभी लोगों को भारत सरकार की ओर से त्वांग में आलीशान घरों में ठहराया गया था। दलाई लामा ने जैसे ही भारत में अपने कदम रखे भारतीय वायुसेना के विमानों ने उनके दल के सदस्यों के लिए रसद गिरानी शुरू कर दी। कुछ ही दिनों बाद दलाई लामा को मसूरी ले जाया गया। जहां जवाहरलाल नेहरू से उनकी मुलाकात हुई। दलाई लामा और नेहरू के बीच 4 घंटों तक तनावपूर्ण बहस होती रही दलाई लामा अपनी आत्मकथा माय कंट्री माय पीपल में लिखते हैं मुझे लगा कि बातचीत के दौरान जब भी मैंने नेहरू के सामने लहासा के बाहर तिब्बत सरकार के गठन की इच्छा प्रकट की तो वह मुझसे कई बार खींचे जब मैंने बिना खून खराबे के तिब्बत की आजादी की कोशिश की बात की तो उन्होंने कई बार मेज पर अपना हाथ मारा उनका निचला होठ गुस्से से कांपने लगा नेहरू ने साफ शब्दों में कहा कि वर्तमान समय में तिब्बत के प्रति हमारी सहानुभूति का यह मतलब नहीं है कि हम चीन के खिलाफ गतिरोध में आपकी मदद करने जा रहे हैं भारत और चीन ने एक दूसरे के आंतरिक मसलों पर हस्तक्षेप ना करने को लेकर पंचशील समझौता कर रखा था जिसके बारे में हमने पहले ही जिक्र किया था।
उधर जैसे ही चीन को दलाई लामा के भाग निकलने की खबर मिली तो उसने तिब्बत के स्थानीय लोगों पर जुल्म बरपाना शुरू कर दिया आलम यह था कि जो कोई भी दलाई लामा की फोटो लेकर घूमता उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता। दलाई लामा के नाम से चीनी सरकार यहां तक बौखला गई कि उनकी फोटो तक रखने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। कई जगहों पर दलाई लामा का समर्थन कर रहे लोगों पर गोलियां चलाई गई। आखिरकार चीनी सैनिकों ने दलाई लामा के महल पोताला पैलेस पर हमला किया और वहां चीन का झंडा लहरा दिया 28 मार्च 1959 के दिन तिब्बत की स्थानीय सरकार को बर्खास्त कर दिया गया और चीन का विरोध करने वालों को देशद्रोही घोषित कर दिया। गया दलाई लामा और उनके साथ आए शरणार्थियों को हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में रहने के लिए जगह दी गई। इसे लिटिल लहासा भी कहा जाता है। क्योंकि यह जगह तिब्बती संस्कृति का केंद्र बन गई दलाई लामा ने तिब्बतियों को एकजुट करने और उनकी संस्कृति को बचाने के लिए निर्वासित सरकार की नींव रखी।29 अप्रैल 1959 को मसूरी में तिब्बतियन गवर्नमेंट इन एग्जाइल की स्थापना की गई। बाद में 1960 में धर्मशाला शिफ्ट हो गई। इस सरकार के तीन मुख्य उद्देश्य थे। पहला तिब्बती शरणार्थियों की मदद करना दूसरा तिब्बती संस्कृति धर्म और भाषा को संरक्षित करना और तीसरा तिब्बत की आजादी या स्वायता के लिए शांतिपूर्ण संघर्ष करना आगे चलकर दलाई लामा ने एक लोकतांत्रिक ढांचा तैयार किया तिब्बत का संविधान लिखा गया आज के समय में 45 सदस्यों की एक संसद है। जिसमें तिब्बती शरणार्थी वोट डालकर अपने प्रतिनिधि को चुनते हैं यह प्रतिनिधि तिब्बत के शरणार्थियों की आवाज दुनिया भर में उठाते हैं। साल 2011 में 75 साल की उम्र में दलाई लामा ने ऐलान किया कि वे अब निर्वासित सरकार के राजनीतिक और प्रशासनिक प्रमुख नहीं रहेंगे। संसद से चुना हुआ प्रतिनिधि अब तिब्बत के राजनीतिक मामलों को देखता है। तिब्बत छोड़ने के बाद दलाई लामा अंतरराष्ट्रीय पटल पर तिब्बत की स्वतंत्रता को लेकर सवाल खड़े करते रहे हैं साल 1959 61 और 1965 में तिब्बत के हालात पर संयुक्त राष्ट्र महासभा में तीन बार प्रस्ताव पास हुए जिनमें तिब्बतियों के मानवाधिकारों के उल्लंघन पर चिंता जताई गई।
लेकिन चीन के ऊपर इसका कोई असर नहीं हुआ। साल 1987 का सितंबर महीना चल रहा था अमेरिका के वाशिंगटन डीसी शहर में हल्की ठंड थी। 14वें दलाई लामा तनजिनत्सो साधारण भगवा वस्त्रों में एक छोटे से कमरे में बैठे थे। यह वो दिन था जब दुनिया के सामने तिब्बत के लिए वो शांति की पुकार रखने वाले थे। जिस कमरे में वो बैठे थे वो जगह थी अमेरिकी कांग्रेस का ह्यूमन राइट्स कॉकस दलाई लामा यहां से फाइव पॉइंट्स पीस प्लान पेश करने वाले थे। कुछ देर बाद दलाई लामा ने अपनी बात रखनी शुरू की कमरे में चारों तरफ सन्नाटा पसरा था। दलाई लामा ने पहला पॉइंट रखते हुए कहा कि तिब्बत को शांति का क्षेत्र बनाया जाए। जहां हथियार की जगह प्रेम हो फिर उन्होंने दूसरे पॉइंट पर अपनी बात रखी और कहा कि चीन तिब्बत में अपनी आबादी बसाना बंद करें ताकि तिब्बती संस्कृति जिंदा रहे तीसरा पॉइंट था तिब्बतियों को उनका अधिकार मिले। चौथे पॉइंट में तिब्बत के जंगल नदियां और पहाड़ बचाए जाएं और पांचवा और आखिरी पॉइंट में उन्होंने कहा कि चीन और तिब्बतियों के बीच बातचीत का रास्ता खुले ताकि लोगों का भविष्य सुंदर हो दलाई लामा के इस शांति प्रस्ताव के बावजूद चीन अडिग रहा। उसके
स्टैंड में कोई बदलाव नहीं दिखा। इसके बाद दलाई लामा ने साल 1988 में यूरोपीय संसद के माध्यम से एक प्रस्ताव रखा जिसका नाम था। मिडिल वे अप्रोच मिडिल वे अप्रोच तिब्बत चीन विवाद सुलझाने का एक शांतिपूर्ण तरीका था। जिसमें कहा गया कि तिब्बत को पूर्ण स्वतंत्रता ना दी। जाए उन्हें चीन सरकार में रहते हुए बस इतनी आजादी दे दी जाए कि वह अपनी संस्कृति धर्म और भाषा की रक्षा कर सकें यह रास्ता ना तो पूरी तरह आजादी का था ना ही चीन के आगे घुटने टेकने का चीन इस प्रस्ताव पर आज तक राजी नहीं हुआ।
1989 में दलाई लामा को दिया गया शांति का नोबेल पुरस्कार
साल 1989 में दलाई लामा को शांति के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार उन्हें तिब्बत की स्वतंत्रता के लिए अहिंसक संघर्ष मानवाधिकारों के प्रति समर्पण और वैश्विक शांति और सहिष्णता को बढ़ावा देने के प्रयासों के लिए दिया गया एक तरफ जहां दलाई लामा तिब्बत और बौद्ध धर्म के लिए चीन के खिलाफ संघर्ष करने के लिए जाने जाते हैं वहीं उनके व्यक्तित्व का दूसरा पहलू भी है जो उन्हें आधा मक और आधा साइंटिस्ट दर्शाता है दलाई लामा को बचपन से ही मशीनों में काफी रुचि थी बचपन में वह खिलौने को खोल कर देखते कि आखिर यह काम कैसे करता है। अपनी दूरबीन लेकर वह घंटों तक चांद को देखा करते थे। घड़ियों में काफी दिलचस्पी थी। वह घंटों घड़ी को खोलकर उसकी मरम्मत के लिए बैठे रहते थे। विज्ञान और इंजीनियरिंग से दलाई लामा को कितना प्यार है। इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक बार दलाई लामा ने खुद कहा था कि अगर वे दलाई लामा नहीं होते तो शायद एक मैकेनिकल इंजीनियर होते। दलाई लामा बचपन से ही साइंस को लेकर काफी पैशनेट थे। उन्होंने खुद अपने बारे में कहा था मेरा यह शरीर यह इंसान आधा बुद्धिस्ट भिक्षु है। आधा वैज्ञानिक इसी पर एक शानदार डॉक्यूमेंट्री बनी है। दलाई लामा साइंटिस्ट यह डॉक्यूमेंट्री दिखाती है कि कैसे दलाई लामा का विज्ञान के प्रति प्यार समय के साथ और गहरा होता गया।
अब आते हैं आखिरी सवाल पर जो है अगले दलाई लामा का चुनाव
दलाई लामा ने अपनी नई किताब वॉइस फॉर द वॉइसलेस में कहा है कि अगले दलाई लामा का जन्म स्वतंत्र देश में होगा यह बात इस तरफ इशारा करती है कि अगला दलाई लामा चीनी नियंत्रण क्षेत्र से बाहर ही जन्म लेगा हालांकि चीन चाहता है कि अगला दलाई लामा उसकी पसंद का हो ताकि वह तिब्बत पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर सके कई मौकों पर चीन ने दलाई लामा के बाद की पोजीशन जिसे पंचे लामा कहा जाता है उसे खुद से मान्यता दे दी ऐसा ही एक दिलचस्प किस्सा है साल 1955 की बात है दलाई लामा ने गेंदुचोई की नईमा नाम के एक छ साल के बालक को 11वें पंचन लामा के रूप में मान्यता दी इस घोषणा के कुछ ही दिनों बाद चीनी अधिकारियों ने उस बालक और उसके परिवार के सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया वो बच्चा तब से ही लापता है इसके बाद चीन ने अपनी मनपसंद के किसी बच्चे को 11वां पंचे लामा घोषित कर दिया हालांकि तिब्बत के लोग और निर्वासित सरकार ने इसे मान्यता नहीं दी चीन चाहता है कि तिब्बती बौद्ध धर्म के प्रमुख पदों पर उसका कोई समर्थक ही बैठे ताकि वह तिब्बत पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर सके लेकिन तिब्बत और चीन के बीच पिछले सात दशक से दलाई लामा दीवार बनकर खड़े हैं जिनकी उम्र 89 साल हो चुकी है जिनके कंधे अब झुकने लगे हैं लेकिन अपनी संस्कृति धर्म और अपनी विरासत के लिए वो आज भी लड़ रहे हैं वो हमें सिखाते हैं कि अहिंसा और सत्य के रास्ते पर चलकर भी बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है।





