Drone attack in Hormuz: होर्मुज में ड्रोन अटैक के बाद समुद्र में ‘संकट’! 11 हजार नाविक बीच मझधार में फंसे, UN ने क्यों रोका रेस्क्यू ऑपरेशन?

Crisis at sea following the drone attack in Hormuz sailors stranded mid-ocean

नई दिल्ली। दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापारिक मार्ग होर्मुज स्ट्रेट में एक ड्रोन हमले ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। ओमान के तट के पास एक कार्गो जहाज पर हुए हमले के बाद संयुक्त राष्ट्र की समुद्री एजेंसी इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गेनाइजेशन (IMO) ने हजारों नाविकों को सुरक्षित निकालने का रेस्क्यू अभियान फिलहाल रोक दिया है।

ईरान-ओमान के समुद्री रूट विवाद ने बढ़ाई दुनिया की चिंता

तेल सप्लाई से लेकर वैश्विक व्यापार तक पर मंडरा रहा खतरा

इस फैसले के बाद करीब 11 हजार नाविक ऐसे जहाजों पर फंस गए हैं, जो कई दिनों से फारस की खाड़ी में सुरक्षा कारणों से रुके हुए हैं। यदि जल्द समाधान नहीं निकला, तो इसका असर सिर्फ समुद्री व्यापार पर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की तेल और गैस सप्लाई पर भी पड़ सकता है।

क्या हुआ था होर्मुज स्ट्रेट में?

पिछले कुछ दिनों से संयुक्त राष्ट्र, ओमान और कई सहयोगी देशों की मदद से फारस की खाड़ी में फंसे जहाजों को सुरक्षित बाहर निकालने का अभियान चलाया जा रहा था। इस मिशन का उद्देश्य युद्ध और सुरक्षा प्रतिबंधों के कारण रुके जहाजों को सुरक्षित तरीके से होर्मुज स्ट्रेट पार कराना था।

इसी दौरान ओमान के तट के पास सिंगापुर के झंडे वाले कार्गो जहाज ‘एवर लवली’ पर ड्रोन हमला हुआ। हमले में जहाज के ब्रिज को नुकसान पहुंचा, हालांकि किसी नाविक के हताहत होने की सूचना नहीं मिली।

घटना के तुरंत बाद IMO ने पूरे रेस्क्यू ऑपरेशन को अस्थायी रूप से रोक दिया।


UN ने रेस्क्यू अभियान क्यों रोक दिया?

IMO के महासचिव आर्सेनियो डोमिंगेज के अनुसार, जब तक रेस्क्यू सूची में शामिल जहाजों की सुरक्षा की पूरी गारंटी नहीं मिल जाती, तब तक अभियान आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।

हालांकि जिस जहाज पर हमला हुआ वह संयुक्त राष्ट्र के रेस्क्यू मिशन का हिस्सा नहीं था, लेकिन इस घटना ने साफ कर दिया कि समुद्री मार्ग अभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।


20 हजार नाविक संकट में, 11 हजार की निकासी अटकी

IMO के अनुसार इस समय पूरे क्षेत्र में करीब 20 हजार नाविक विभिन्न जहाजों पर मौजूद हैं। इनमें से लगभग 11 हजार नाविकों को सुरक्षित निकालने के लिए विशेष इवैक्युएशन प्लान तैयार किया गया था।

रेस्क्यू अभियान रुकने के बाद हजारों नाविक फिर समुद्र में फंस गए हैं और उन्हें नहीं पता कि वे कब सुरक्षित रूप से होर्मुज स्ट्रेट पार कर पाएंगे।


ईरान आखिर क्यों नाराज है?

तनाव की जड़ समुद्री मार्ग को लेकर विवाद है।

ईरान ने पहले ही चेतावनी दी थी कि उसकी अनुमति के बिना कोई भी जहाज संयुक्त राष्ट्र और ओमान द्वारा तैयार किए गए वैकल्पिक समुद्री कॉरिडोर का इस्तेमाल न करे।

ड्रोन हमले के बाद ईरान की पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी (PGSA) ने साफ कहा कि जो जहाज ईरान द्वारा तय आधिकारिक मार्ग छोड़कर दूसरे रास्ते का उपयोग करेंगे, उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी ईरान नहीं लेगा।


दो समुद्री रास्तों पर टकराव

पहला रास्ता: ईरान का आधिकारिक कॉरिडोर

दूसरा रास्ता: ओमान का समुद्री मार्ग

यही विवाद अब पूरे संकट की सबसे बड़ी वजह बन गया है।


क्यों महत्वपूर्ण है होर्मुज स्ट्रेट?

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा कॉरिडोर माना जाता है।

यदि यह रास्ता लंबे समय तक प्रभावित रहता है तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल और गैस की कीमतों में फिर तेजी आ सकती है।


सुरक्षा प्रोटोकॉल क्यों बना मुद्दा?

संयुक्त राष्ट्र ने पहले ही सभी जहाजों को निर्देश दिया था कि बिना अनुमति कोई भी जहाज आवाजाही न करे।

IMO, UKMTO और MICA के संयुक्त समन्वय के बाद ही जहाजों को आगे बढ़ने की अनुमति दी जानी थी, लेकिन ड्रोन हमले ने पूरे सुरक्षा तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं।


अब आगे क्या होगा?

फिलहाल IMO, ओमान, ईरान और अन्य सदस्य देशों के साथ लगातार बातचीत कर रहा है ताकि सुरक्षित समुद्री आवाजाही दोबारा शुरू की जा सके।

जब तक सभी पक्ष सुरक्षा की गारंटी नहीं देते, तब तक हजारों नाविक समुद्र में फंसे रह सकते हैं और वैश्विक शिपिंग नेटवर्क पर अनिश्चितता बनी रहेगी।


भारत पर कितना असर पड़ सकता है?

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आयात करता है। यदि होर्मुज स्ट्रेट में तनाव लंबा खिंचता है, तो इसका सीधा असर भारत के तेल आयात, शिपिंग लागत और ईंधन की कीमतों पर पड़ सकता है। साथ ही वैश्विक सप्लाई चेन भी प्रभावित हो सकती है।

होर्मुज स्ट्रेट में हुआ ड्रोन हमला सिर्फ एक जहाज पर हमला नहीं, बल्कि वैश्विक समुद्री सुरक्षा के सामने खड़ी नई चुनौती है। 11 हजार नाविकों का भविष्य फिलहाल अनिश्चित है, जबकि दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। अब सबकी निगाहें ईरान, ओमान और संयुक्त राष्ट्र के बीच होने वाली बातचीत पर टिकी हैं, क्योंकि इसी से तय होगा कि दुनिया का सबसे अहम समुद्री व्यापारिक मार्ग कब फिर सामान्य हो पाएगा।

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