नई दिल्ली। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया और विज्ञान-तकनीक मंत्री जितेंद्र सिंह ने गुरुवार यानी 26 जनवरी को दुनिया की पहली इंट्रानेजल कोविड-19 वैक्सीन इनकोवैक (iNCOVACC) को लॉन्च किया। कोवैक्सिन बनाने वाली हैदराबाद की भारत बायोटेक ने इसे वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन (WUSM) के साथ मिलकर बनाया है। नाक से ली जाने वाली इस वैक्सीन को बूस्टर डोज के तौर पर लगाया जा सकेगा।
- इस समय भारत में लग रही वैक्सीन के दो डोज दिए जा रहे हैं और दूसरे डोज के 14 दिन बाद वैक्सीनेट व्यक्ति सेफ माना जाता है
- नेजल वैक्सीन 14 दिन में ही असर दिखाने लगती है
- इफेक्टिव नेजल डोज न केवल कोरोना वायरस से बचाएगा, बल्कि बीमारी फैलने से भी रोकेगा
- मरीज में माइल्ड लक्षण भी नजर नहीं आएंगे और वायरस भी शरीर के अन्य अंगों को नुकसान नहीं पहुंचा सकेगा।
- यह सिंगल डोज वैक्सीन है, इस वजह से ट्रैकिंग आसान है
- इसके साइड इफेक्ट्स भी इंट्रामस्कुलर वैक्सीन के मुकाबले कम है और इससे सुई-सीरिंज का कचरा भी कम होगा
कैसे काम करेगी यह वैक्सीन
कोरोनावायरस समेत कई माइक्रोब्स (सूक्ष्म वायरस) म्युकोसा (गीला, चिपचिपा पदार्थ जो नाक, मुंह, फेफड़ों और पाचन तंत्र में होता है) के जरिए शरीर में जाते हैं। यह वैक्सीन सीधे म्युकोसा में ही इम्यून रिस्पॉन्स पैदा करती है। ये इन्फेक्शन रोकने के साथ-साथ ट्रांसमिशन को भी रोकता है।
भारत सरकार ने 23 दिसंबर को इस वैक्सीन की मंजूरी दी थी। सबसे पहले नेजल वैक्सीन को प्राइवेट अस्पतालों में उपलब्ध कराया जाएगा, जिसके लिए लोगों को पैसे देने होंगे। दिसंबर में भारत बायोटेक ने घोषणा की थी कि यह वैक्सीन सरकारी अस्पतालों में 325 रुपए में लगवाई जा सकेगी।
इसको सामान्य स्प्रे की तरह ले सकेंगे
फिलहाल हमें मांसपेशियों में इंजेक्शन के जरिए वैक्सीन लगाई जा रही है जिसे इंट्रामस्कुलर वैक्सीन कहते हैं। नेजल वैक्सीन वो होती है जिसे नाक के जरिए दिया जाता है। यह एक तरह से नेजल स्प्रे जैसी है।
इस वैक्सीन को कोवैक्सिन और कोवीशील्ड जैसी वैक्सीन्स लेने वालों को बूस्टर डोज के तौर पर दिया जाएगा। हालांकि इसे प्राइमरी वैक्सीन के तौर पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है।