बिहार की राजनीति में विधानसभा चुनाव के बाद विपक्षी महागठबंधन के भीतर मतभेद अब विधान परिषद चुनाव के मैदान तक पहुंचते दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस ने बिहार विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक सीटों के लिए पांच उम्मीदवार घोषित किए हैं। इनमें तीन ऐसी सीटें हैं, जहां आरजेडी पहले ही अपने उम्मीदवार उतार चुकी है। ऐसे में गठबंधन के दो प्रमुख दल एक ही चुनाव में एक-दूसरे के सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं।
सीट बंटवारे पर भरोसा टूटा?
विवाद की जड़ सिर्फ उम्मीदवारों की घोषणा नहीं है, बल्कि समन्वय की प्रक्रिया है। आरजेडी ने सितंबर में आठ में से छह सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित किए थे। कांग्रेस ने तब आरोप लगाया था कि प्रत्याशियों की घोषणा से पहले उससे पर्याप्त बातचीत नहीं की गई। कांग्रेस नेता असित नाथ तिवारी ने इसे गठबंधन धर्म से जुड़ा मुद्दा बताया था।
आरजेडी की घोषित सूची में पटना शिक्षक से संजीव कुमार सिंह, पटना स्नातक से दिलीप कुमार, कोसी स्नातक से नितेश कुमार, दरभंगा स्नातक से अनिल कुमार झा, सारण शिक्षक से जयराम यादव और तिरहुत स्नातक से रश्मि विनायक गौतम शामिल हैं।
इसके बाद कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार उतारकर साफ कर दिया कि वह इन परिषद चुनावों में सीटों पर अपने दावे को केवल बातचीत तक सीमित नहीं रखना चाहती।
कांग्रेस ने कहां उतारे उम्मीदवार?
कांग्रेस ने पांच उम्मीदवार घोषित किए हैं—दरभंगा शिक्षक से मदन मोहन झा, कोसी स्नातक से मनोज कुमार जायसवाल, दरभंगा स्नातक से रजनीकांत पाठक, पटना शिक्षक से संजय यादव और पटना स्नातक से असदुल्लाह खान। इनमें आरजेडी के साथ सीधा मुकाबला तीन सीटों पर बनता है। दूसरी तरफ दरभंगा शिक्षक सीट पर कांग्रेस का उम्मीदवार ऐसे क्षेत्र में है, जिसे कांग्रेस लंबे समय से अपने प्रभाव वाले क्षेत्र के रूप में देखती रही है। यही वजह है कि परिषद चुनाव महज आठ सीटों का चुनाव न रहकर विपक्षी गठबंधन के भीतर सीट-दावे और संगठनात्मक स्वायत्तता की परीक्षा भी बन गया है।
विधानसभा से पहले संकेत क्यों अहम?
बिहार विधानसभा चुनाव के बाद महागठबंधन की एकजुटता पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। अब विधान परिषद चुनाव में कांग्रेस और आरजेडी का आमने-सामने आना उस रिश्ते की मौजूदा स्थिति को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत जरूर है। हालांकि इससे यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि महागठबंधन औपचारिक रूप से टूट गया है। विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक सीटों के चुनाव में स्थानीय समीकरण, उम्मीदवारों की व्यक्तिगत पकड़ और मतदाता समूहों की संरचना विधानसभा चुनाव से अलग होती है। इसलिए इस चुनाव में अलग-अलग उम्मीदवार उतारना अपने आप में गठबंधन के औपचारिक अंत का प्रमाण नहीं है।
NDA के सामने विपक्ष का बिखराव?
इस पूरे घटनाक्रम का एक दूसरा पहलू भी है। बिहार विधान परिषद की आठ सीटों पर चुनाव होने हैं और बीजेपी-जेडीयू ने भी अपने उम्मीदवार घोषित किए हैं। इसके अलावा जन सुराज समेत दूसरे दल और उम्मीदवार भी मैदान में हैं। यानी मुकाबला सिर्फ कांग्रेस बनाम आरजेडी नहीं है, बल्कि कई सीटों पर बहुकोणीय चुनाव बन रहा है। ऐसे में कांग्रेस और आरजेडी दोनों के लिए यह चुनाव सिर्फ एक परिषद सीट जीतने का सवाल नहीं रहेगा। दोनों दल यह भी दिखाना चाहेंगे कि अपने संगठन और अपने सामाजिक आधार को वे कितनी मजबूती से अलग खड़ा कर सकते हैं।
सबसे बड़ा सवाल
क्या कांग्रेस और आरजेडी का यह टकराव सिर्फ एमएलसी सीटों के बंटवारे का विवाद है, या आने वाले दिनों में बिहार की विपक्षी राजनीति में बड़े पुनर्संयोजन की शुरुआत? फिलहाल उपलब्ध संकेतों से इतना जरूर स्पष्ट है कि महागठबंधन के भीतर सीट-समझौते और समन्वय को लेकर गंभीर मतभेद सार्वजनिक हो चुके हैं। लेकिन गठबंधन के औपचारिक टूटने का निष्कर्ष इस चरण पर निकालना उचित नहीं होगा।





