उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सवाल सिर्फ चुनाव जीतने का नहीं, बल्कि सत्ता में वापसी की उस लंबी दूरी को खत्म करने का है, जो करीब साढ़े तीन दशक से बनी हुई है। उत्तर प्रदेश विधान परिषद की आधिकारिक सूची के मुताबिक कांग्रेस के अंतिम मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी का कार्यकाल 25 जून 1988 से 4 दिसंबर 1989 तक रहा। इसके बाद 5 दिसंबर 1989 को मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने और तब से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का कोई मुख्यमंत्री नहीं बना। यानी 2026 में देखें तो कांग्रेस का यह सत्ता-विहीन दौर करीब 37 साल का हो चुका है। 2027 में विधाानसभा के चुनाव हैं, लेकिन जिस तरह से सपा और कांग्रेस में सीट शेयरिंग को लेकर मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं, उससे लगता है अभी Uttar Pradesh Assembly Elections 2027 में बीजेपी को टक्कर देने की स्थिति में न कांग्रेस है और न सपा।
36 साल से सत्ता का इंतजार
कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश कभी सिर्फ एक राज्य नहीं था। यह उसकी राष्ट्रीय राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण आधार रहा। लेकिन 1989 के बाद राज्य की राजनीति का समीकरण तेजी से बदला। मंडल-कमंडल की राजनीति, क्षेत्रीय दलों का उभार और जातीय-सामाजिक समीकरणों ने कांग्रेस के पारंपरिक राजनीतिक आधार को कमजोर किया। इसके बाद समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे दलों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी मजबूत जगह बनाई, जबकि भाजपा भी राज्य में प्रमुख शक्ति बनकर उभरी। नतीजा यह रहा कि कांग्रेस धीरे-धीरे सत्ता की मुख्य दौड़ से बाहर होती चली गई।
‘वनवास’ सिर्फ सत्ता का नहीं
कांग्रेस का संकट केवल मुख्यमंत्री की कुर्सी तक सीमित नहीं है। असली चुनौती संगठन, जमीनी नेटवर्क और सामाजिक गठजोड़ को दोबारा मजबूत करने की है। उत्तर प्रदेश में लगातार कई चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन कमजोर रहा है। ऐसे में 2027 का विधानसभा चुनाव उसके लिए एक और बड़ा राजनीतिक परीक्षण होगा। पार्टी के सामने सवाल है कि क्या वह अपने पुराने मतदाता आधार के साथ नए सामाजिक समूहों तक पहुंच बना सकती है।
2027 में वापसी की चुनौती
2027 का चुनाव कांग्रेस के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मुकाबला केवल भाजपा से नहीं होगा। समाजवादी पार्टी पहले से राज्य की प्रमुख विपक्षी ताकत है और कांग्रेस के लिए गठबंधन की राजनीति तथा अपनी स्वतंत्र संगठनात्मक पहचान—दोनों के बीच संतुलन एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहेगा। इसलिए कांग्रेस के 36-37 साल के ‘राजनीतिक वनवास’ की चर्चा को केवल एक नारे के तौर पर नहीं, बल्कि उसके सामने मौजूद संगठनात्मक और चुनावी चुनौती के संदर्भ में देखना होगा। सवाल यही है—क्या 2027 में कांग्रेस अपने पुराने गढ़ उत्तर प्रदेश में सत्ता की दौड़ में फिर से प्रासंगिक भूमिका हासिल कर पाएगी, या उसका लंबा इंतजार आगे भी जारी रहेगा?