ऑपरेशन लोटस के बीच विश्वास प्रस्ताव, केजरीवाल ने दिखाई हिम्मत
विश्वास प्रस्ताव पेश कर दिल्ली के सीएम केजरीवाल ने हिम्मत दिखाई है। वह भी ऐसे समय में जब उनकी आम आदमी पार्टी के विधायकों के टूटने का खतरा बना हों आपरेशन लोटस की आशंका जताई जा रही हो। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल स्वयं बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाते हुए कह चुक हैं कि बीजेपी ने उनकी पार्टी के विधायकों को खरीदने की कोशिश की थी। जिससे दिल्ली सरकार को गिराया जा सके। ऐसे समय दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने विधानसभा में विश्वासमत प्रस्ताव पेश किया। प्रस्ताव से पहले बीजेपी विधायकों ने सीवर पानी के साथ भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर उस पर चर्चा की मांग सदन में की। हंगामे के दौरान विधायकों को पूरे दिन के लिए सदन से बाहर कर दिया गया। तो वहीं आम आदमी पार्टी के विधायक एसजी विनय कुमार सक्सेना से इस्तीफे की मांग पर अड़ गए। उन्होंने पूरी रात दिल्ली विधानसभा के भीतर धरना दिया।
क्यों लाए केजरीवाल विश्वासमत प्रस्ताव
बता दें दिल्ली विधानसभा में कुल 70 सीटें हैं। जिसमें से सत्तारुढ़ आम आदमी पार्टी के पास 62 और बीजेपी 8 सीटों पर काबिज है। आम आदमी पार्टी के पास दो तिहाई से ज्यादा बहुमत है। इसके बाद भी सीएम केजरीवाल ने विश्वासमत प्रस्ताव पेश किया। इसके पीछे दो बड़ी वजह मानी जा रही हैं। पहली वजह है एकजुटता का संदेश देने की कोशिश। बता दें आम आदमी पार्टी के चार विधायकों ने पिछले दिनों प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा था कि बीजेपी के लोग उन्हें खरीदने की कोशिश कर रहे हैं। विधायकों ने दावा किया कि इसके लिए 20ण्20 करोड़ रुपए देने की पेशकश की जा रही है। वहीं इसके बाद सीएम अरविंद केजरीवाल ने पिछले गुरुवार अपने आवास पर बैठक बुलाई थी। जिसमें 9 विधायक नहीं पहुंचे थे। 9 विधायकों के नहीं पहुंचने के बाद कई तरह की अटकलें लगाई जाने लगी ऐसे में केजरीवाल ने विश्वासमत प्रस्ताव लाकर सदन में आप के भीतर एकजुटता का संदेश देना चाहते हैं। दूसरी बड़ी गुजरात मे होने वाले विधानसभा चुनाव हैं। जहां आम आदमी पार्टी अस बार पूरी सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है। ऐसे में मजबूती से एंट्री के लिए केजरीवाल चाहते हैं कि उन्हें दिल्ली की ओर से कोई परेशानी न हो हो। विश्वासमत हासिल करने के बाद 6 महीने तक सरकार को कोई खतरा नहीं रहेगा। लिहाजा केजरीवाल विश्वासमत हासिल कर दिल्ली की सरकार को मजबूत दिखाना चाहते हैं। जिससे गुजरात चुनाव में उनकी पार्टी मजबूती से लड़ सके।
क्या है अविश्वास प्रस्ताव
सदन में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को लाने का काम विपक्ष करता है। जो मौजूद सरकार के विरोध में होता है। ऐसे में सत्तापक्ष अपनी सरकार बनी रहे इस के लिए अविश्वास प्रस्ताव नामंजूर करने कीपूरी कोशिश करता है। स्पीकर अगर अविश्वास प्रस्ताव मंजूर कर लेता और सत्तापक्ष सदन में बहुमत साबित करने में सफल नहीं रहता है तो सरकार गिर जाती है। ऐसे ही किसी विधेयक के मामले में भी होता है।
जाने विश्वास प्रस्ताव
विश्वास प्रस्ताव सत्ता पक्ष सदन में पेश करता है। केंद्र में प्रधानमंत्री और राज्य में मुख्यमंत्री विश्वास प्रस्ताव सदन में पेश करते हैं। सरकार के बने रहने के लिए विश्वास प्रस्ताव का पारित होना जरूरी है। प्रस्ताव पारित नहीं हुआ तो सरकार गिर जाएगी। विश्वास प्रस्ताव दो स्थितियों में सरकार द्वारा लाया जाता है। पहली स्थिति में सरकार के गठन के वक्त सरकार बहुमत परीक्षण करने के लिए करती है। जबकि दूसरी स्थिति में केंद्र में राष्ट्रपति या फिर राज्य में राज्यपाल के कहने पर। इसका मतलब सरकार को समर्थन देने वाले घटक समर्थन वापसी का ऐलान कर दें। ऐसे में राष्ट्रपति या राज्यपाल प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को सदन का भरोसा हासिल करने को कह सकते हैं।
क्या अंतर है विश्वास प्रस्ताव और अविश्वास प्रस्ताव में
भारतीय लोकतंत्र में विश्वास प्रस्ताव और अविश्वास प्रस्ताव संसदीय प्रकिया के अंग हैं। जिसके तहत सदन में सरकार के बहुमत को परखा जाता है। सदन में अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष की ओर से लाया जाता है। वहीं विश्वास प्रस्ताव अपना बहुमत दिखाने के लिये हमेशा सत्तापक्ष पदन में पेश करता है।
राष्ट्रपति या राज्यपाल भी दे सकते हैं आदेश विशेष परिस्थितियों में राष्ट्रपति या राज्यपाल भी सरकार से सदन में विश्वास मत अर्जित करने के लिए कह सकते हैं। ऐसे में सरकार विश्वास मत हासिल कर लेती है तो 15 दिन बाद विपक्ष फिर से सरकार के खिलाफ सदन में अविश्वास प्रस्ताव ला सकता है। वैसे संसदीय प्रावधान है कि एक बार अविश्वास प्रस्ताव लाने के छह महीने बाद ही फिर से अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष ला सकता है। चूंकि विश्वास मत सरकार की तरफ से लाया जाता है इसलिये यह कानून इस पर लागू नहीं होता। विश्वास प्रस्ताव पारित न होने की स्थिति में सरकार को या तो इस्तीफा देना होता है या लोकसभा या फिर विधानसभा भंग करके आम चुनाव की सिफारिश राष्ट्रपति या राज्यपाल से की जा सकती है।




