बिहार विधानसभा चुनाव में खूब चमके सीएम योगी के हनुमान रवि किशन: 19 सभा में 18 सीटें जीतीं एनडीए ने
बिहार विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और उसके सहयोगी दलों की ऐतिहासिक सफलता के बाद अब चुनावी विश्लेषण का दौर शुरू हो गया है। इस जीत में कई नेताओं और स्टार प्रचारकों की भूमिका अहम बताई जा रही है। उनमें से एक प्रमुख नाम गोरखपुर के सांसद और प्रसिद्ध भोजपुरी अभिनेता रवि किशन का है। खुद को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का “हनुमान” कहने वाले रवि किशन ने बिहार चुनाव में बीजेपी और एनडीए प्रत्याशियों के पक्ष में जबरदस्त जनसमर्थन जुटाया।
गोरखपुर से सांसद रवि किशन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को धन्यवाद देते हुए सोशल मीडिया पर एक वीडियो संदेश साझा किया। उन्होंने कहा कि बिहार की जनता ने विकास, स्थिरता और जनहित के मुद्दों पर वोट दिया है। उन्होंने इस जीत को “जनता की जीत” बताते हुए बिहार के लोगों का आभार व्यक्त किया।
चुनावी रणनीति के तहत बीजेपी ने रवि किशन को अपने स्टार प्रचारकों की सूची में शामिल किया था। उन्होंने पूरे प्रचार अभियान के दौरान 19 विधानसभा क्षेत्रों में सभाएं कीं, जिनमें 18 सीटें एनडीए गठबंधन को मिलीं। केवल एक सीट पर मामूली अंतर से हार का सामना करना पड़ा। यह प्रदर्शन स्टार प्रचारकों में से सबसे बेहतरीन माना जा रहा है। रवि किशन का जोश, बोलने का तरीका और भोजपुरी-हिंदी के मिश्रण से भरी हुई शैली ने भीड़ को आकर्षित किया। उनके मंचों पर युवाओं की भारी उपस्थिति ने बीजेपी को जमीनी स्तर पर मजबूती दी।
खेसारी लाल यादव से जुबानी जंग भी रही चर्चा का विषय
इस चुनाव में चर्चाओं का एक और केंद्र बन गया था भोजपुरी सिनेमा जगत का टकराव। गोरखपुर के सांसद रवि किशन और छपरा सीट से चुनाव लड़ रहे लोकप्रिय भोजपुरी अभिनेता खेसारी लाल यादव के बीच तीखी शब्दयुद्ध देखने को मिली। दोनों ने एक-दूसरे पर सार्वजनिक रूप से आरोप लगाए। रवि किशन ने खेसारी के विरोध में जोरदार प्रचार किया और इस प्रचार का असर मैदान में साफ दिखा — जहां खेसारी को पराजय झेलनी पड़ी। यह मुकाबला सोशल मीडिया और स्थानीय मीडिया में लगातार चर्चा में रहा। विश्लेषकों का मानना है कि भोजपुरी सिनेमा के बड़े चेहरे के रूप में रवि किशन की लोकप्रियता और राजनीतिक वक्तृत्व कौशल ने बीजेपी प्रत्याशी के पक्ष में माहौल बनाने में अहम भूमिका निभाई।
धमकी के बावजूद नहीं डगमगाए कदम
चुनाव प्रचार के बीच रवि किशन को जान से मारने की धमकी भी मिली थी। यह मामला पुलिस तक पहुंचा और आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। लेकिन इन घटनाओं से रवि किशन पीछे नहीं हटे। उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था के बीच लगातार जनसभाएं कीं और कार्यकर्ताओं में जोश भरा। लोगों से संवाद करने के उनके अंदाज ने ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में खास प्रभाव छोड़ा।
सीएम योगी के साथ बना ‘जोड़ेदार’ अभियान
बीजेपी ने इस बार प्रचार की कमान जिन नेताओं को दी, उनमें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और सांसद रवि किशन प्रमुख रहे। दोनों ने कई जगह साझा मंचों पर प्रचार किया। योगी की छवि एक सख्त प्रशासक और हिंदुत्वनिष्ठ नेता के रूप में रही, जबकि रवि किशन का फिल्मी करिश्मा और जनसंपर्क कौशल उससे मेल खाता नजर आया। दोनों की जोड़ी ने बिहार में बीजेपी का आधार विस्तार करने में मदद की। जहां योगी विकास और शासन की बात करते नजर आए, वहीं रवि किशन ने इसे जन भावना से जोड़ते हुए सांस्कृतिक और क्षेत्रीय जुड़ाव का संदेश दिया।
मैथिली ठाकुर के समर्थन में की थी वोट अपील
इस चुनाव में एक और दिलचस्प पहलू रहा — लोकगायिका मैथिली ठाकुर की उम्मीदवारी। जब बीजेपी ने उन्हें अलीनगर सीट से प्रत्याशी घोषित किया, तो शुरुआती दौर में स्थानीय राजनीति में कुछ विरोध के स्वर उठे। ऐसे समय में रवि किशन आगे आए और मैथिली ठाकुर के समर्थन में सोशल मीडिया पर वीडियो जारी किया। उन्होंने मैथिली की लोकप्रियता, सरलता और लोकसंस्कृति से जुड़ाव की सराहना करते हुए महिलाओं और युवाओं से अपील की कि वे उन्हें वोट देकर आगे बढ़ाएं। इस अपील का असर दिखाई दिया और मैथिली ठाकुर ने सीट जीतकर इतिहास रच दिया।
एनडीए की जीत में प्रचार का प्रभाव
विश्लेषकों का कहना है कि इस बार बिहार की जनता ने जातीय समीकरण से ऊपर उठकर विकास, स्थिरता और मजबूत केंद्र-राज्य तालमेल के मुद्दों को प्राथमिकता दी। बीजेपी और एनडीए के प्रचार अभियान में जहां प्रदेश और राष्ट्रीय नेतृत्व ने नीतिगत बातें रखीं, वहीं रवि किशन जैसे लोकप्रिय चेहरे ने जनता से सीधे जुड़ाव का कार्य किया। उन्होंने न सिर्फ पार्टी की नीतियों को सरल भाषा में समझाया, बल्कि सिनेमा और राजनीति के बीच सेतु का काम भी किया।
इस प्रकार, बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की ऐतिहासिक जीत के पीछे अनेक कारण रहे, लेकिन उनमें से एक अहम वजह थी रवि किशन की सक्रियता और प्रभावशाली अभियान। जनसभाओं में उमड़ी भीड़, युवाओं में जोश और जनता के साथ उनका भावनात्मक रिश्ता — यह सब मिलकर एक ऐसा माहौल बना गया जिसने एनडीए के जीत के अंतर को और मजबूत किया। बिहार की सियासत में यह चुनाव आने वाले वर्षों तक स्टार प्रचारकों की भूमिका का मानक तय करने वाला उदाहरण बन सकता है।