जंगलों से उठी आजादी की हुंकार, टंट्या मामा ने अंग्रेजों को कैसे छकाया?
15 अगस्त सिर्फ तिरंगा फहराने और आजादी का जश्न मनाने का दिन नहीं, बल्कि उन अनगिनत वीरों को याद करने का भी दिन है, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। इतिहास में गांधी, भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस जैसे नाम खूब चर्चित हैं, लेकिन मध्य प्रदेश की धरती ने भी ऐसे जननायकों को जन्म दिया, जिन्होंने जंगलों और पहाड़ों से अंग्रेजों को चुनौती दी। टंट्या मामा जैसे वीरों की कहानियां आज भी लोकगीतों में जिंदा हैं।
- जंगलों से उठी आजादी की आवाज
- अंग्रेजों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द
- टंट्या मामा बने गरीबों के मसीहा
- धोखे से पकड़ा गया जंगलों का योद्धा
- फांसी के बाद भी जिंदा रही कहानी
15 अगस्त यानी भारत का स्वतंत्रता दिवस, इस दिन लोग न केवल अपने राष्ट्रीय ध्वज को फहराते हैं बल्कि आज़ादी की जंग में दी गई शहादत को भी याद करते हैं। लेकिन जब भी भारत की आजादी की बात होती है हमारे मन में सबसे पहले महात्मा गांधी, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस और चंद्रशेखर आजाद जैसे महान क्रांतिकारियों के नाम आते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि मध्य प्रदेश की धरती पर भी ऐसे वीर हुए, जिन्होंने जंगलों, पहाड़ों और गांवों से अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती दी। ऐसे योद्धा, जिनकी बहादुरी लोकगीतों में आज भी जिंदा है, लेकिन इतिहास की किताबों और लोगों के जहन में उन्हें वह स्थान नहीं मिल पाया जिसके वे हकदार थे। हम बात कर रहे हैं टंट्या मामा की, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर आजादी की मशाल जलाए रखी।
टंट्या मामा केवल मध्यप्रदेश के नहीं, बल्कि पूरे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण अध्याय है। इनका संघर्ष यह बताता है कि आजादी की लड़ाई केवल बड़े शहरों या प्रसिद्ध नेताओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि जंगलों, गांवों और जनजातीय अंचलों में भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ सशक्त प्रतिरोध जारी था। आज आवश्यकता इस बात की है कि इन महान सेनानियों की गाथाएं नई पीढ़ी तक पहुंचें, ताकि भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अधिक व्यापक, संतुलित और समावेशी रूप में सामने आ सके।
कल्पना कीजिए। जंगलों में घोड़े की तेज़ टापें सुनाई देती हैं। अंग्रेजी फौज हथियार लेकर पीछा कर रही है। लेकिन जिस इंसान को पकड़ने निकली है। वो हर बार उनकी आंखों के सामने से गायब हो जाता है। सरकार उस पर इनाम घोषित करती है।
सैकड़ों सैनिक तैनात किए जाते हैं। फिर भी। वह कभी हाथ नहीं आता। और जब भी वह आता है। तो गरीबों के घरों में खुशियां छोड़ जाता है। लेकिन अमीर साहूकारों और अंग्रेज अफसरों की रातों की नींद उड़ा देता है। यही थे। टंट्या भील। एक ऐसा नाम। जिसे आज भी मध्य प्रदेश और निमाड़ का आदिवासी समाज टंट्या मामा कहकर सम्मान देता है। और यही वजह है कि उन्हें “इंडिया का रॉबिनहुड भी कहा गया।
टंट्या भील जिन्हें लोग टंट्या मामा के नाम से भी जानते हैं अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ने वाले ऐसे जननायक थे , जिनकी कहानी इतिहास की किताबों में उतनी जगह नहीं पा सकी, जितनी मिलनी चाहिए थी? आइए जानते हैं। टंट्या भील की पूरी कहानी।
साल था। उन्नीसवीं सदी का मध्य। भारत अंग्रेजों की गुलामी में था। मध्य भारत का निमाड़ इलाका। जहां भील आदिवासी पीढ़ियों से जंगलों और अपनी जमीनों पर निर्भर थे। लेकिन अंग्रेजों ने कानून बदल दिए। जंगलों पर कब्जा। जमीनों पर टैक्स। और ऊपर से साहूकारों का कर्ज। गरीब आदिवासी दो वक्त की रोटी के लिए भी तरसने लगे। इसी दौर में लगभग 1842 के आसपास एक बालक का जन्म हुआ। नाम था। टंट्या। उन्हें नहीं पता था। कि आने वाले वर्षों में अंग्रेज सरकार उन्हें अपना सबसे बड़ा सिरदर्द मानने वाली है।
युवा होते-होते टंट्या ने अपने आसपास केवल अन्याय देखा। किसानों की जमीन छीनी जा रही थी। आदिवासियों को पीटा जा रहा था। गरीबों की मेहनत का पैसा साहूकार लूट रहे थे। तब टंट्या ने फैसला किया। अब अन्याय सहेंगे नहीं। उसका जवाब देंगे। उन्होंने अपने साथियों की टोली बनाई। और शुरू हुआ अंग्रेजी शासन के खिलाफ गुरिल्ला संघर्ष।
टंट्या भील अमीर साहूकारों, अत्याचारी जमींदारों और अंग्रेजी खजाने पर छापे मारते थे। लेकिन। उन्होंने कभी गरीबों को निशाना नहीं बनाया। लोककथाओं के अनुसार। जो धन मिलता। उसका बड़ा हिस्सा गरीब परिवारों में बांट दिया जाता। कई जगह बेटियों की शादी करवाई। भूखे परिवारों तक राशन पहुंचाया। जरूरतमंदों की मदद की। यही वजह है कि लोगों ने उन्हें भारत का रॉबिनहुड कहना शुरू कर दिया। हालांकि इतिहासकार बताते हैं कि यह कोई आधिकारिक उपाधि नहीं, बल्कि जनता के प्रेम और सम्मान से मिली पहचान है।
मुख्यमंत्री के सांस्कृतिक सलाहकार और इतिहासकार श्रीराम तिवारी ने टंट्या मामा लेकर कहा कि टंट्या भील जंगलों के उस्ताद थे। घोड़े की रफ्तार। तीर-कमान की सटीक निशानेबाजी। और गुरिल्ला युद्ध की ऐसी रणनीति। जिसने अंग्रेजों को वर्षों तक परेशान रखा। वे अचानक हमला करते। सरकारी खजाना लूट लेते। और कुछ ही मिनटों में जंगलों में गायब हो जाते। अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ने के लिए कई अभियान चलाए। इनाम घोषित किए। लेकिन हर बार उन्हें नाकामी मिली। कहा जाता है कि अंग्रेज अधिकारियों के बीच टंट्या का नाम डर का पर्याय बन चुका था।
जब अंग्रेज ताकत से टंट्या को नहीं पकड़ पाए। तो उन्होंने चाल चली। इतिहासकारों के अनुसार। विश्वासघात के जरिए टंट्या भील को गिरफ्तार किया गया। यानी। जिसे अंग्रेज हथियारों से नहीं हरा सके। उसे धोखे से पकड़ा गया। कहा जाता है कि उनके ही एक परिचित गणपत, जो उनकी मुंहबोली बहन का पति था, ने पैसों के लालच या डर में आकर अंग्रेजों को उनके आने-जाने के रास्तों और ठिकानों की गुप्त जानकारी दे दी थी। इसी धोखे और घात लगाकर किए गए हमले के कारण ब्रिटिश सेना उन्हें पकड़ने में सफल हुई थी। 4 दिसंबर 1889 को जबलपुर सेंट्रल जेल। अंग्रेजों ने टंट्या भील को फांसी दे दी। लेकिन। वे शायद यह भूल गए थे। कि किसी इंसान को फांसी दी जा सकती है। उसके विचारों को नहीं। आज भी मध्य प्रदेश के गांवों में। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक। उन्हें “टंट्या मामा” कहकर याद करते हैं। इतिहास अक्सर राजाओं और महलों की कहानियां याद रखता है। लेकिन जंगलों से उठी उन आवाज़ों को भूल जाता है। जिन्होंने अपने लोगों के हक के लिए पूरी सल्तनत को चुनौती दे दी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में प्रदेश में भी जनजातीय नायकों के सम्मान को आगे बढ़ाया जा रहा है। प्रदेश सरकार ने उनके सम्मान में इंदौर के पातालपानी रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर टंट्या मामा रेलवे स्टेशन किया है और युवाओं के स्वरोजगार के लिए टंट्या मामा आर्थिक कल्याण योजना भी चलाई जा रही है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 फरवरी 2024 को मध्य प्रदेश के झाबुआ का दौरा किया था, जहां उन्होंने जनजातीय गौरव क्रांतिसूर्य टंट्या मामा भील विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी थी। ₹170 करोड़ की अनुमानित लागत से तैयार होने वाला यह केंद्रीय विश्वविद्यालय क्षेत्र के आदिवासी युवाओं को उच्च शिक्षा के बेहतरीन अवसर प्रदान करेगा। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने आजादी में टंट्या मामा के योगदान पर भी प्रकाश डाला था।
टंट्या भील सिर्फ एक नाम नहीं। वो उस संघर्ष का प्रतीक हैं, जिसने आदिवासियों को यह विश्वास दिलाया कि अन्याय कितना भी बड़ा क्यों न हो। उसके सामने झुकना ज़रूरी नहीं है। शायद इसी वजह से। आज भी मध्य प्रदेश, निमाड़ और आदिवासी समाज के लाखों लोगों के लिए। वो किसी इतिहास की किताब का किरदार नहीं। बल्कि “टंट्या मामा” हैं।