अभिजीत दीपके ने इंडिया गठबंधन की रैली का किया समर्थन, लेकिन शामिल होने पर फैसला बाकी | खरगे बोले-CJP नहीं आएगी, संगठन ने कहा-अभी निर्णय नहीं | राहुल गांधी के न्यौते और कांग्रेस की पुरानी दूरी के बीच रिश्तों का नया मोड़
कांग्रेस की 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में होने वाली रैली से पहले विपक्षी एकजुटता की तस्वीर में एक नया मोड़ आ गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के विरोध में होने वाली इस रैली को सीजेपी ने अपना समर्थन दे दिया है। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पर साफ लिखा—“ज्ञानेश कुमार को जाना होगा, सीजेपी इंडिया गठबंधन की 1 नवंबर की रैली का समर्थन करती है।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। समर्थन के ऐलान के बावजूद सीजेपी रैली में शामिल होगी या नहीं, इस पर असमंजस बना हुआ है। 30 अक्टूबर को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि सीजेपी रैली में नहीं आ रही है। वहीं सीजेपी के प्रवक्ता ने कहा कि भागीदारी को लेकर अभी फैसला नहीं हुआ है। यानी समर्थन सार्वजनिक है, लेकिन साझा मंच पर मौजूदगी अब भी तय नहीं है।
पांच बड़े सवाल, जिनमें उलझा है सीजेपी-कांग्रेस का रिश्ता
पहला सवाल—समर्थन के बाद भी रैली में जाने से हिचकिचाहट क्यों?
सीजेपी ने अपने बयान में साफ किया है कि वह उन सभी संगठनों का समर्थन करेगी, जो देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए आवाज उठा रहे हैं। संगठन का तर्क है कि लोकतंत्र में सरकार जनता चुनती है, सरकार यह तय नहीं कर सकती कि कौन मतदाता बनेगा। सीजेपी ने एसआईआर को लेकर पात्र मतदाताओं के नाम कटने की आशंका जताई है और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग दोहराई है।
लेकिन सीजेपी के बयान में यह नहीं कहा गया कि उसके नेता रामलीला मैदान पहुंचेंगे या मंच साझा करेंगे। यही अंतर इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम राजनीतिक पहलू है। मुद्दे पर समर्थन देना और किसी राजनीतिक गठबंधन के आयोजन का हिस्सा बनना, दोनों अलग-अलग फैसले हैं।
दूसरा सवाल—कांग्रेस और सीजेपी के बीच पुरानी दूरी क्या अब खत्म हो रही है?
सीजेपी और कांग्रेस के रिश्ते हमेशा सहज नहीं रहे हैं। सीजेपी ने पहले भी चुनावी प्रक्रिया, परीक्षा और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर अलग आंदोलन किए। कांग्रेस ने इन मुद्दों पर अपनी आवाज उठाई, लेकिन संगठन के तौर पर सीजेपी के आंदोलन से दूरी बनाए रखी।
अक्टूबर में सीजेपी नेताओं की गिरफ्तारी के बाद राहुल गांधी ने उनके समर्थन में बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में तिरंगा लहराना अपराध नहीं है और अलग-अलग बैनर के बावजूद आंदोलन का उद्देश्य एक है। राहुल गांधी ने सीजेपी संस्थापक अभिजीत दीपके को विपक्षी नेताओं और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के लिए आमंत्रित भी किया था। हालांकि, सीजेपी उस बैठक में शामिल नहीं हुई थी।
इससे संकेत मिलता है कि दोनों पक्षों के बीच संवाद के रास्ते खुले हैं, लेकिन संगठनात्मक नजदीकी अभी पूरी तरह स्थापित नहीं हुई है।
तीसरा सवाल—क्या कांग्रेस सीजेपी को अपने मंच पर जगह देने के लिए तैयार है?
यही वह बिंदु है जहां खरगे और सीजेपी के बयान महत्वपूर्ण हो जाते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष का यह कहना कि सीजेपी रैली में नहीं आएगी, जबकि सीजेपी का कहना है कि फैसला अभी बाकी है, दोनों के बीच स्थिति स्पष्ट न होने की ओर इशारा करता है।
कांग्रेस के लिए यह रैली इंडिया गठबंधन की एकजुटता दिखाने का बड़ा अवसर है। ऐसे में सीजेपी जैसे युवा आंदोलन का समर्थन मिलना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन सीजेपी की अपनी स्वतंत्र पहचान और आंदोलन की अलग कार्यशैली है। वह किसी राजनीतिक दल की सहयोगी इकाई के रूप में दिखाई देने से बचना चाह सकती है। इसलिए समर्थन और मंच साझा करने के बीच की दूरी दोनों पक्षों की रणनीति को समझने की कुंजी है।
चौथा सवाल—क्या सीजेपी अपनी स्वतंत्र पहचान बचाना चाहती है?
सीजेपी की ताकत उसकी स्वतंत्र आंदोलनकारी छवि और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर सक्रियता में रही है। संगठन पहले भी अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं के समर्थन के बावजूद अपने आंदोलन का नेतृत्व स्वयं करता रहा है।
यदि सीजेपी कांग्रेस की रैली में शामिल होती है, तो इसे विपक्षी एकजुटता के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन इसके साथ यह सवाल भी उठेगा कि क्या उसका स्वतंत्र आंदोलन धीरे-धीरे किसी राजनीतिक गठबंधन के बड़े अभियान का हिस्सा बन रहा है?
दूसरी ओर, यदि सीजेपी सिर्फ समर्थन तक सीमित रहती है और रैली में नहीं जाती, तो वह अपने स्वतंत्र स्वरूप को बनाए रखते हुए समान मुद्दे पर विपक्ष के साथ खड़ी दिखाई दे सकती है। फिलहाल उपलब्ध बयानों से किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
पांचवां सवाल—व्यापारियों का विरोध कांग्रेस के लिए नई चुनौती क्यों है?
सीजेपी के सवाल के साथ कांग्रेस के सामने रैली के आयोजन को लेकर व्यापारियों का विरोध भी है। दिल्ली के व्यापारिक संगठनों ने दीपावली के आसपास बाजारों में भीड़, यातायात प्रतिबंध और सुरक्षा व्यवस्था के कारण कारोबार प्रभावित होने की आशंका जताई है। चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री ने राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व से रैली को दीपावली के बाद कराने की अपील की है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने व्यापारियों की मांग पर विचार करने की बात कही थी, लेकिन साथ ही एसआईआर और मताधिकार के मुद्दे को महत्वपूर्ण बताया। इस तरह कांग्रेस को एक तरफ अपने राजनीतिक अभियान को आगे बढ़ाना है, तो दूसरी तरफ व्यापारियों की आपत्तियों का जवाब भी देना है।
असली राजनीतिक तस्वीर क्या है?
इस पूरे घटनाक्रम में तीन स्तर दिखाई देते हैं।
पहला, एसआईआर के विरोध में कांग्रेस और सीजेपी के मुद्दे एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं। दूसरा, राहुल गांधी की ओर से सीजेपी नेताओं के समर्थन और अभिजीत दीपके को बातचीत का न्यौता दिए जाने से संवाद की गुंजाइश बनी है। तीसरा, सीजेपी अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखते हुए समर्थन देना चाहती है या विपक्षी गठबंधन के साथ मंच साझा करना चाहती है, इसका अंतिम जवाब अभी सामने नहीं आया है।
30 अक्टूबर की स्थिति के मुताबिक, सीजेपी ने रैली का समर्थन किया है, लेकिन उसकी भागीदारी की पुष्टि नहीं हुई है। खरगे का बयान और सीजेपी प्रवक्ता की प्रतिक्रिया इस असमंजस को और स्पष्ट करती है। निष्कर्ष यह है कि 1 नवंबर की रैली में सीजेपी की मौजूदगी से ज्यादा अहम सवाल कांग्रेस और सीजेपी के बीच राजनीतिक दूरी घटने का है। क्या दोनों पक्ष साझा मुद्दे पर साथ खड़े होकर आगे बढ़ेंगे, या समर्थन और स्वतंत्र आंदोलन की अपनी-अपनी सीमाएं बनाए रखेंगे? इसका संकेत रामलीला मैदान की रैली से मिल सकता है।