चिराग और मांझी की हसरत होगी पूरी?
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले NDA के 5 पार्टनर्स की ताकत का विश्लेषण
बिहार में 2025 का विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के पांचों घटक दल—भाजपा, जनता दल (यूनाइटेड), लोक जनशक्ति पार्टी-राम विलास, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा और राष्ट्रीय लोक मोर्चा—अपनी-अपनी ताकत के हिसाब से सीटों में हिस्सेदारी चाहते हैं। सवाल यह है कि चिराग पासवान और जीतन राम मांझी जैसे छोटे सहयोगियों की हसरतें इस बार पूरी होंगी या भाजपा-जदयू की बराबरी वाली ताकत फिर उन्हें दबा देगी।
2020 के चुनाव का नजदीकी मुकाबला
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए और महागठबंधन के बीच केवल 12,000 से अधिक वोटों का अंतर था, जो कुल मतदान का मात्र 0.03 प्रतिशत है। यह आंकड़ा बताता है कि मुकाबला कितना कांटे का था। इस करीबी जीत ने साफ कर दिया था कि बिहार में किसी भी छोटे राजनीतिक समीकरण का असर अंतिम परिणाम को प्रभावित कर सकता है।
भाजपा-जदयू: बराबरी के दावेदार
विश्लेषण बताता है कि भाजपा और नीतीश कुमार की जदयू की चुनावी ताकत लगभग बराबर है। 98 सीटों पर भाजपा को 30% या उससे ज्यादा वोट मिले। 97 सीटों पर जदयू को 30% या उससे ज्यादा वोट मिले। पहले और दूसरे स्थान के आधार पर देखें तो भाजपा 152 सीटों पर और जदयू 151 सीटों पर मजबूत रही है। यही कारण है कि सीट बंटवारे में दोनों दल बराबरी की हिस्सेदारी पर जोर देते हैं।
2020 में हालांकि तस्वीर थोड़ी अलग थी। भाजपा ने लगभग 20% वोट शेयर के साथ 74 सीटें जीतीं, जबकि जदयू केवल 15% वोट लेकर 43 सीटों पर सिमट गई। इसके बावजूद गठबंधन में जदयू की “बार्गेनिंग पावर” बनी हुई है, क्योंकि उसने लंबे समय तक राज्य की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाई है।
चिराग पासवान और लोजपा की वापसी
2020 में लोजपा ने एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ा और केवल एक सीट जीत सकी। हालांकि पार्टी ने 18 सीटों पर दूसरा स्थान पाया और 3 सीटों पर 30% से अधिक वोट हासिल किए। पिछले चार चुनावों में लोजपा ने कुल 15 निर्वाचन क्षेत्रों में 30% या उससे ज्यादा वोट हासिल किए हैं।
अब चिराग पासवान एनडीए में वापस आ चुके हैं और सीट बंटवारे में बड़ी हिस्सेदारी की मांग कर रहे हैं। लेकिन उनकी ताकत सीमित क्षेत्रों तक ही केंद्रित है। भाजपा-जदयू के मुकाबले उनका दबाव उतना प्रभावी नहीं दिखता, फिर भी करीबी चुनाव में उनका योगदान निर्णायक हो सकता है।
जीतन राम मांझी और HAM की स्थिति
जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) ने अब तक दो विधानसभा चुनाव (2015 और 2020) लड़े हैं। पार्टी गया और औरंगाबाद जैसे इलाकों में प्रभाव बनाए हुए है। मांझी की जातिगत पकड़ उन्हें सीमित लेकिन महत्वपूर्ण ताकत देती है। इसलिए एनडीए उन्हें भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।
उपेंद्र कुशवाहा और राष्ट्रीय लोक मोर्चा
उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी का नाम बदलकर राष्ट्रीय लोक मोर्चा कर दिया गया है। पहले यह राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (RLSP) थी। कुशवाहा की पार्टी कभी एनडीए तो कभी महागठबंधन का हिस्सा रही है। उनकी जातिगत पकड़ विशेषकर कुछ इलाकों में असर डालती है, लेकिन राज्यव्यापी आधार पर उनका प्रभाव सीमित है।
NDA में शक्ति संतुलन
कुल मिलाकर तस्वीर साफ है मुख्य ताकत भाजपा और जदयू के पास है। लोजपा, हम और आरएलएम जैसी पार्टियां अपनी-अपनी जातिगत और क्षेत्रीय पकड़ के दम पर सौदेबाजी करती हैं। सीट बंटवारे में भाजपा-जदयू ही निर्णायक भूमिका निभाएंगे, जबकि छोटे सहयोगी अपने हिस्से को बढ़ाने के लिए दबाव बनाएंगे।
रिपोर्टों के अनुसार बिहार के आगामी विधानसभा चुनाव में जदयू 102 सीटों पर और भाजपा 101 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है। यह फॉर्मूला दिखाता है कि बड़े दलों के बीच बराबरी कायम रखी जाएगी। वहीं, चिराग पासवान और मांझी की हसरतें तभी पूरी हो पाएंगी जब भाजपा-जदयू उनकी मांगों को संतुलित रूप से स्वीकार करेंगे।
बिहार का चुनावी गणित हमेशा जटिल रहा है। जातिगत समीकरण, गठबंधन की मजबूती और छोटे दलों की भूमिका परिणाम को प्रभावित करती है। इस बार भी भाजपा और जदयू की बराबरी की ताकत गठबंधन को संतुलन में रखेगी। लेकिन चिराग पासवान और जीतन राम मांझी जैसे नेता अपनी सीमित लेकिन निर्णायक ताकत से एनडीए में बेहतर सौदेबाजी की उम्मीद कर रहे हैं। आखिरकार, बिहार का 2025 का चुनाव यह भी साबित करने वाला है कि एनडीए में “छोटे दलों की हसरत” पूरी होती है या फिर चुनाव के दौरान केवल भाजपा और जदयू का दबदबा ही हावी रहता है। (प्रकाश कुमार पांडेय)