जमीयत उलेमा-ए-हिंद के चीफ महमूद मदनी दिल्ली में जमीयत के 34वें अधिवेशन में शामिल हुए। उन्होंने कहा कि हमारा भाजपा और RSS से धार्मिक नहीं, बल्कि वैचारिक मतभेद है। मदनी ने कहा, ‘भारत हमारा देश है, जितना ये देश मोदी और भागवत का है। उतना ही मदनी का भी है। हमें सनातन धर्म से कोई शिकायत नहीं है, आपको भी इस्लाम से कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए।’
- दिल्ली के रामलीला मैदान में खड़े होकर मदीना की तर्ज पर नाम में मदनी लगाने वाले महमूद मदनी ने दावा किया कि इस्लाम भारत का सबसे प्राचीन मजहब है। अगर महमूद मदनी यह बोल रहे हैं तो इसे हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। महमूद मदनी देओबंदी मुसलमानों की सबसे ताकतवर संस्था जमीयत ए उलमा ए हिन्द के मुखिया हैं, जो 1919 के खिलाफत मूवमेन्ट से पैदा हुआ इस्लामिक संगठन है।
- इसका बुनियादी काम मुसलमानों को सच्चा इस्लाम पहुंचाकर उनको ताकतवर बनाना है। जमीयत-ए-उलमा-ए-हिन्द भारत के सबसे धनी इस्लामिक संगठन के रूप में काम करता है जिसे हलाल सर्टिफिकेट, मस्जिदों में इमामों की तैनाती तथा चंदे के रूप में भारी भरकम धन मिलता है। दिल्ली के आईटीओ चौराहे पर इनका विशाल कार्यालय है। देशभर की अधिकांश सुन्नी मस्जिदों में इन्हीं के द्वारा इमाम नियुक्त किये जाते हैं।
- लेकिन दिल्ली के रामलीला मैदान में मदनी ने जो बोला है वह इस्लाम की नयी परिभाषा करने जैसा है। मदनी ने प्रमुख रूप से तीन बाते कहीं हैं। पहला, इस्लाम भारत का सबसे प्राचीन मजहब है, दूसरा, मुसलमान कहीं बाहर से नहीं आये बल्कि यहीं के हैं, और तीसरा कि इस्लाम को बाहर का मजहब कहना बंद होना चाहिए। ये तीनों ही बातें इस्लाम की नयी परिभाषा करने जैसी हैं जिसे सुनकर हो सकता है कि कुछ लोगों को हंसी भी आये लेकिन जो इस्लाम को समझते हैं वो मदनी की बातों की गंभीरता को भी जरूर समझेंगे।
- इब्न ए इशाक, तबरी और कतीर ने आठवीं सदी में जो लिखा वही इस्लाम की बुनियाद बन गया। इसी के आधार पर हदीसें लिखी गयीं। यह सब अब्बासियों के शासनकाल के दौरान किया गया या कराया गया। इस्लाम के इन प्रामाणित स्रोतों में जो कहा गया है उसके मुताबिक सातवीं सदी में अरब में एक पैगंबर आये जिन्होंने एक नया दीन शुरु किया। उनके ऊपर आसमान से बही उतरती थी जो मुसलमानों के लिए कुरान के रूप में आज मौजूद है।
- ये सब बातें कितनी सच हैं और कितनी झूठ इसको प्रमाणित करने का कोई जरिया मानव जाति के सामने नहीं हैं। मुसलमान इसी को सच मानते हैं और इसी के मुताबिक जीवन जीते हैं। लेकिन अब्बासियों के समय तारीख, तफ्सीर और हदीसों (इतिहास, विवरण, और प्रमाण) के जरिए जो इस्लाम गढ़ा गया उसमें बहुत चालाकी से उसे यहूदियों के अब्राहम (इब्राहिम) से जोड़ दिया गया। अपने इस नये सेक्ट को प्रामाणिक बनाने के लिए अब्बासियों ने इसे मोजेज (मूसा) और जीसस (ईसा) की निरंतरता वाला मजहब बता दिया। जबकि इस नये मजहब का न तो अब्राहम से दूर दूर तक कोई लेना देना था और न ही मोजेज या जीसस से।
- इसी की निरंतरता भारत में तब दिखी जब आर्य समाज को चुनौती देने तथा हिन्दुओं को मूर्ख बनाने के लिए मिर्जा गुलाम अहमद कादियानी ने कहना शुरु किया कि भारत में पैदा होने वाले कृष्ण भी एक पैगंबर थे और वह खुद इस्लाम का एक पैगंबर है। हिन्दुओं को तो समझ ही नहीं आया कि कादियानी क्या कह रहा है लेकिन मुसलमानों ने उसको गैर मुस्लिम घोषित कर दिया। मुसलमान अपने पैगंबर मोहम्मद को पहला और आखिरी पैगंबर मानते हैं।
- उन्हीं ने इस्लाम को शुरु किया और उन्हीं के दौर में इस्लाम मुकम्मल हो गया। इसके बाद अब इस्लाम में कोई पैगंबर नहीं आयेगा। मिर्जा गुलाम अहमद कादियानी को मुसलमानों ने भले ही जहन्नमी घोषित कर दिया हो या फिर उसके मानने वालों को काफिर कहते हों लेकिन उसके द्वारा बनायी गयी कई झूठी कहानियां इस्लाम में फैल गयी। इसमें बुढ़िया द्वारा उनके पैगंबर पर कूड़ा फेंकने वाली कहानी तथा इस्लाम का सबसे प्राचीन धर्म होनेवाली कहानी भी शामिल है। यह गुलाम अहमद कादियानी ही था जिसने इस्लाम को सनातन धर्म बताया था और इसी को प्रमाणित करने के लिए राम और कृष्ण को भी भारत में पैदा हुए पैगंबर बताया था।
(संजय तिवारी मणिभद्र से साभार)





