GST में बदलाव से मिलेगा बूस्टर डोज!…आर्थिक घाटा सहकर सियासी मुनाफा कमाएगी सरकार?बिहार चुनाव पर सीधा असर?

Changes in GST will provide a booster dose the government will earn political profit by bearing the economic loss

GST में बदलाव से मिलेगा बूस्टर डोज!…आर्थिक घाटा सहकर सियासी मुनाफा कमाएगी सरकार?बिहार चुनाव पर सीधा असर?

केंद्र की एनडीए सरकार की ओर से आम जनता को बड़ी राहत देते हुए जीएसटी (GST) के स्लैब में बड़ा बदलाव किया है। अब तक लागू चार टैक्स स्लैब की जगह केवल two slabs दो स्लैब रह गए हैं। जो हैं 5 और 18 प्रतिशत वाले। इसका सीधा सीधा असर आम आदमी की रोज़मर्रा की वस्तुओं से लेकर महंगे सामानों तक पर पड़ने वाला है। मोदी सरकार का दावा है कि यह कदम आम से लेकर खास तक सभी वर्गों को राहत देगा। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इससे सरकार को करीब 48 हजार करोड़ रुपये के राजस्व की हानि होगी। सवाल है कि क्या सरकार यह घाटा सहकर सियासी लाभ लेने की तैयारी में है?

आम जनता को राहत, सरकार को घाटा

जीएसटी में कटौती से कई वस्तुएं सस्ती हो जाएंगी। सरकार का कहना है कि यह “डबल डोज” है। एक तरफ महंगाई से जूझ रहे लोगों को राहत और दूसरी ओर खपत को बढ़ावा भी मिलेगा। पीएम नरेन्द्र मोदी अब इसे “GST 2.0” बता रहे हैंं पीएम कहते हैं कि यह निर्णय निश्चित ही देश की विकास यात्रा के लिए मील का पत्थर साबित होने वाला है। बता दें राहत का असर 22 सितंबर से दिखेगा, यानी नवरात्र और त्योहारों से ठीक पहले। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आर्थिक घाटा उठाने का यह फैसला बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सियासी मायने भी रखता है। दिवाली और छठ जैसे बड़े पर्वों से पहले सामान सस्ता होना, जनता के मन पर गहरी छाप छोड़ सकता है।

बिहार चुनाव पर सीधा असर?

बिहार में चुनावी माहौल पहले से ही गर्म है। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की “वोटर अधिकार यात्रा” को विपक्ष ने बड़ी सफलता के रूप में प्रचारित किया। लाखों की भीड़ वाली तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए। लेकिन जैसे ही सरकार ने जीएसटी पर बड़ा फैसला लिया, बहस का केंद्र बदल गया। अब चर्चा राहुल की यात्रा से ज्यादा जीएसटी पर है। बीजेपी इसे अपने मास्टरस्ट्रोक के रूप में प्रचारित कर रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि यह कदम सीधे-सीधे हर घर तक पहुंचेगा। विपक्ष को जहां चुनाव आयोग और SIR-वोट चोरी जैसे मुद्दों पर हमले का मौका मिल रहा था, वहीं अब उसे नए नैरेटिव से जूझना पड़ रहा है।

SIR और वोट चोरी पर दबाव घटा?

राहुल गांधी और महागठबंधन चुनाव आयोग पर निशाना साधते रहे हैं। उनका आरोप है कि वोटर लिस्ट से बड़े पैमाने पर नाम काटे जा रहे हैं। उन्होंने बाकायदा प्रेजेंटेशन भी दिखाया। विपक्ष को यह मुद्दा सत्तापक्ष पर दबाव बनाने का एक मजबूत हथियार मिल रहा था। लेकिन जीएसटी में बदलाव की घोषणा ने बहस का ट्रैक बदल दिया। अब टीवी डिबेट्स से लेकर सोशल मीडिया तक पर लोग राहत पैकेज की चर्चा करने लगे। बीजेपी ने विपक्ष की आलोचना को नकारात्मक राजनीति बताया और केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि कांग्रेस देश की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की सच्चाई को नकार रही है।

आर्थिक और सियासी समीकरण

जीएसटी में बदलाव केवल टैक्स सुधार का मामला नहीं है। यह सीधे खपत, निवेश और रोजगार से जुड़ा है। अगर सामान सस्ता होता है तो खपत बढ़ती है। ज्यादा खपत का मतलब ज्यादा उत्पादन और उद्योग जगत में निवेश। इससे रोजगार के अवसर पैदा होंगे। रोजगार का मतलब है लोगों के हाथ में ज्यादा पैसा और खर्च बढ़ेगा। यह चक्र अर्थव्यवस्था को गति देगा। राजनीतिक तौर पर देखें तो यह फैसला सरकार के लिए दोहरी जीत हो सकता है।

आर्थिक मोर्चे पर: उपभोग बढ़ने से उद्योग जगत को राहत।
सियासी मोर्चे पर: जनता के बीच “जनहितैषी सरकार” की छवि।
टैरिफ, चीन और अमेरिका का समीकरण

हाल के महीनों में अमेरिका के साथ भारत के व्यापारिक रिश्तों में खटास आई है। टैरिफ बढ़ने से कई क्षेत्रों में संकट पैदा हुआ और विपक्ष ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया। दूसरी तरफ चीन के साथ पीएम मोदी की मुलाकातों को लेकर भी विपक्ष ने सवाल उठाए। ऐसे में जीएसटी में बदलाव ने सरकार को घरेलू स्तर पर सकारात्मक नैरेटिव दिया है। चीन और अमेरिका पर घिरने वाली सरकार अब जनता के बीच “राहत देने वाली सरकार” का संदेश फैला सकती है।

महंगाई और बेरोजगारी पर तगड़ा वार

महंगाई और बेरोजगारी लंबे समय से विपक्ष के हथियार रहे हैं। बिहार चुनाव में भी यही मुद्दे गूंज रहे थे। लेकिन जीएसटी स्लैब घटाकर सरकार ने उन पर बड़ा प्रहार किया है। अब जनता के लिए प्रत्यक्ष लाभदायक फैसले की चर्चा ज्यादा होगी। जीएसटी स्लैब में बदलाव को सरकार ने आर्थिक सुधार और राजनीतिक रणनीति दोनों ही रूपों में पेश किया है। राजस्व में घाटा उठाने के बावजूद इस कदम से जनता को राहत मिलेगी। त्योहारों से ठीक पहले यह फैसला जनता के मन को छूने वाला हो सकता है। राहुल गांधी की “वोटर अधिकार यात्रा” और SIR-वोट चोरी का मुद्दा भले ही विपक्ष को गति देता रहा हो, लेकिन अब सियासी विमर्श जीएसटी की ओर शिफ्ट हो गया है। ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि सरकार ने एक ही चाल से आर्थिक और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर बढ़त लेने की कोशिश की है। क्या यह बूस्टर डोज सरकार को बिहार चुनाव में सियासी मुनाफा दिला पाएगा? इसका जवाब आने वाले महीनों में मतपेटियों से मिलेगा। प्रकाश कुमार पांडेय

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