यह फर्क महत्वपूर्ण है। संगठन महामंत्री का पद पार्टी और संघ की संगठनात्मक व्यवस्था में बेहद अहम होता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे सरकार के राजनीतिक नेतृत्व का विकल्प बन जाते हैं। मध्यप्रदेश में नई टीम में चंद्रशेखर के साथ राष्ट्रीय सह-संगठन महामंत्री शिव प्रकाश को भी प्रदेश का दायित्व मिला है। यानी केंद्रीय संगठन ने एमपी में संगठनात्मक निगरानी और स्थानीय संगठन संचालन, दोनों स्तरों पर नई व्यवस्था बनाई है। इसलिए अभी सबसे दिलचस्प कहानी ‘कौन कमजोर हुआ’ नहीं, बल्कि ‘किसके साथ किस तरह का नया संगठनात्मक संतुलन बनेगा’ है। यही आने वाले महीनों में नरोत्तम, सिंधिया, कैलाश विजयवर्गीय, शिवराज और मुख्यमंत्री मोहन यादव के बीच संगठन-सत्ता के रिश्तों को समझने की अहम कुंजी होगी।
क्या तिवारी के आने से नया ‘रहनुमा’?
यहां एक महत्वपूर्ण फर्क समझना जरूरी है। चंद्रशेखर का पद राजनीतिक सरकार के नेतृत्व का विकल्प नहीं है। उनकी भूमिका संगठन को चलाने, कार्यकर्ताओं से संवाद, चुनावी तैयारी और पार्टी-संगठन के समन्वय से जुड़ी होगी। लेकिन इस पद की अहमियत इसलिए ज्यादा है क्योंकि मध्यप्रदेश में 2027 में पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव प्रस्तावित हैं और उसके बाद 2028 का विधानसभा चुनाव होगा। ऐसे में बूथ से लेकर जिला स्तर तक संगठन की सक्रियता की जिम्मेदारी उनके कंधों पर होगी। इसलिए उन्हें ‘नया रहनुमा’ कहने के बजाय नए संगठनात्मक समन्वयक के तौर पर देखना ज्यादा सटीक होगा।
नरोत्तम खेमे पर नजर, लेकिन फैसला अभी बाकी
अब आती है सबसे ज्यादा चर्चा वाले सवाल की बारी—क्या नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों को संगठन में पीछे किया जाएगा? फिलहाल ऐसा निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त सार्वजनिक प्रमाण नहीं हैं। संगठन में किसी चेहरे की वास्तविक स्थिति केवल पद या एक नियुक्ति से तय नहीं होती। जिला अध्यक्षों की नियुक्ति, प्रदेश पदाधिकारियों में बदलाव, चुनावी समितियां, टिकट वितरण और संगठनात्मक जिम्मेदारियों में हिस्सेदारी जैसे फैसले ज्यादा बड़ा संकेत देंगे। यानी चंद्रशेखर की असली परीक्षा नियुक्ति के बाद होने वाली नियुक्तियों में दिखाई देगी।
सिंधिया समर्थक और पुराने चेहरे, संतुलन की चुनौती
मध्यप्रदेश भाजपा की एक खासियत यह है कि यहां संगठन में पुराने भाजपा नेताओं के साथ कांग्रेस से भाजपा में आए नेताओं और ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों का भी राजनीतिक स्पेस है। ऐसे में चंद्रशेखर के सामने चुनौती किसी एक गुट को आगे या पीछे करने की नहीं, बल्कि अलग-अलग राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं को संगठन की एक कमान के नीचे सक्रिय रखने की होगी।
यही वजह है कि आने वाले महीनों में प्रदेश संगठन की नियुक्तियां ज्यादा महत्वपूर्ण होंगी। किस क्षेत्र को कौन संभालता है, किन नेताओं को चुनावी जिम्मेदारी मिलती है और किस तरह जिला स्तर पर समीकरण बनाए जाते हैं, इससे संगठन की दिशा ज्यादा स्पष्ट होगी।
शिवराज-कैलाश समीकरण पर भी नजर
शिवराज सिंह चौहान और कैलाश विजयवर्गीय भाजपा के लंबे अनुभव वाले प्रमुख नेता हैं। दोनों की राजनीतिक भूमिकाएं अलग-अलग रही हैं। इनके बीच मतभेद खत्म होंगे या नहीं, यह कहना अभी अटकल होगी। लेकिन नई संगठनात्मक व्यवस्था में एक बात महत्वपूर्ण होगी—क्या संगठन सभी बड़े नेताओं को एक साझा चुनावी ढांचे में प्रभावी तरीके से साथ लेकर चलता है? अगर चंद्रशेखर और बिप्लब देब अलग-अलग राजनीतिक प्रभाव वाले नेताओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर पाते हैं, तो संगठन की कार्यप्रणाली में इसका असर दिखाई दे सकता है। यह किसी एक नेता की जीत-हार से ज्यादा संगठनात्मक प्रबंधन का सवाल होगा। कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और शिवराज सिंह चौहान दोनों भाजपा के शीर्ष प्रदेश नेताओं में हैं और नई प्रदेश कार्यसमिति में शामिल हैं। अप्रैल की कोर कमेटी में भी दोनों का प्रतिनिधित्व था। इसलिए चंद्रशेखर की नियुक्ति को किसी एक नेता के प्रभाव को खत्म करने से जोड़ना अभी तथ्यात्मक रूप से साबित नहीं होता।
असली टेस्ट 2027, लक्ष्य 2028
नई टीम के सामने तत्काल सबसे बड़ा मैदान 2027 के पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव होंगे। यही पहला बड़ा अवसर होगा जब नए प्रदेश प्रभारी और नए संगठन महामंत्री को पूरे प्रदेश में पार्टी की जमीनी मशीनरी के साथ काम करना पड़ेगा। इसके बाद 2028 विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू होगी। इसलिए मध्यप्रदेश भाजपा में यह बदलाव सिर्फ दो पदों पर नई नियुक्तियां नहीं हैं। बिप्लब देब बाहर से संगठनात्मक निगरानी का अनुभव लेकर आए हैं और चंद्रशेखर प्रदेश संगठन की रोजमर्रा की संरचना संभालेंगे। अब कहानी इस बात की नहीं होगी कि किस गुट का प्रभाव बढ़ा और किसका घटा। असली कहानी यह होगी कि नई टीम पुराने शक्ति-संतुलन के बीच संगठन को किस तरह चलाती है। और इसका पहला जवाब आने वाले संगठनात्मक फेरबदल और 2027 के स्थानीय चुनावों में मिलेगा।
चंद्रशेखर तिवारी को मध्यप्रदेश भाजपा का प्रदेश महामंत्री संगठन बनाया गया। यह पद हितानंद शर्मा के संघ में लौटने के बाद करीब आठ महीने से पूर्णकालिक रूप से खाली था। चंद्रशेखर इससे पहले राजस्थान और तेलंगाना में संगठनात्मक जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं और संघ पृष्ठभूमि के प्रचारक रहे हैं। मध्यप्रदेश में चंद्रशेखर के सामने प्रदेश संगठन को मजबूत करने के साथ जिला और मंडल स्तर के संगठन में कसावट लाने की जिम्मेदारी होगी। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के साथ संगठन और सरकार के बीच समन्वय, बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय रखने तथा आगामी चुनावों के लिए पार्टी की तैयारियों को गति देना भी उनके दायित्व का अहम हिस्सा रहेगा।





