CAPF बनाम IPS: प्रमोशन और अधिकारों की खींचतान में केंद्र के नए बिल से बढ़ा विवाद

CAPF vs IPS

CAPF बनाम IPS: प्रमोशन और अधिकारों की खींचतान में केंद्र के नए बिल से बढ़ा विवाद

देश की आंतरिक सुरक्षा संभालने वाले केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में इन दिनों एक बड़ा प्रशासनिक विवाद चर्चा में है। यह विवाद केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल यानी Central Armed Police Forces (CAPF) और Indian Police Service (IPS) के अधिकारियों के बीच प्रमोशन और पदों की हिस्सेदारी को लेकर है। हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित नए बिल के बाद यह मुद्दा और अधिक गर्मा गया है। CAPF के कैडर अधिकारियों का कहना है कि यदि यह बिल पारित हो गया तो उनके प्रमोशन के अवसर और सीमित हो जाएंगे, जबकि सरकार का तर्क है कि इससे प्रशासनिक व्यवस्था अधिक प्रभावी बनेगी।

CAPF क्या है और कौन-कौन से बल आते हैं

CAPF के तहत देश की छह प्रमुख अर्धसैनिक सुरक्षा एजेंसियां आती हैं, जो सीमाओं की सुरक्षा से लेकर आंतरिक सुरक्षा तक की जिम्मेदारी निभाती हैं। इनमें प्रमुख हैं — Central Reserve Police Force (CRPF), Border Security Force (BSF), Indo-Tibetan Border Police (ITBP), Central Industrial Security Force (CISF), Sashastra Seema Bal (SSB) और Assam Rifles। इन बलों की जिम्मेदारी बेहद महत्वपूर्ण है। उदाहरण के तौर पर जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों में CRPF सक्रिय रहती है, अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा BSF और ITBP करती हैं, जबकि एयरपोर्ट, मेट्रो और बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा CISF के जिम्मे होती है।

विवाद की जड़ क्या है

इस पूरे विवाद की जड़ CAPF में अधिकारियों की नियुक्ति और प्रमोशन की व्यवस्था है। CAPF में दो प्रकार के अधिकारी होते हैं। पहला वर्ग IPS अधिकारियों का होता है, जिन्हें केंद्र सरकार डेप्युटेशन पर कुछ वर्षों के लिए CAPF में भेजती है। दूसरा वर्ग CAPF के अपने कैडर अधिकारियों का होता है, जिनकी भर्ती संघ लोक सेवा आयोग यानी Union Public Service Commission (UPSC) द्वारा आयोजित CAPF (Assistant Commandant) परीक्षा के माध्यम से होती है। कैडर अधिकारियों का आरोप है कि ऊंचे पदों जैसे IG, ADG और DG पर अक्सर IPS अधिकारियों की नियुक्ति कर दी जाती है। इससे CAPF के अपने अधिकारियों के लिए पदोन्नति के अवसर सीमित हो जाते हैं।

प्रमोशन में बड़ा अंतर

विवाद का सबसे बड़ा कारण प्रमोशन की गति है। आमतौर पर एक IPS अधिकारी लगभग 13 से 14 वर्षों की सेवा के बाद DIG (डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल) रैंक तक पहुंच जाता है। इसके विपरीत CAPF के कैडर अधिकारी को इसी पद तक पहुंचने में 24 से 28 वर्ष तक का समय लग सकता है। आंकड़ों के अनुसार CRPF और BSF जैसे बलों में लगभग 60 प्रतिशत से अधिक अधिकारी असिस्टेंट कमांडेंट के पद पर भर्ती होने के बाद 10 से 12 वर्षों तक उसी रैंक पर बने रहते हैं। इस दौरान IPS अधिकारी दो या तीन प्रमोशन हासिल कर चुके होते हैं। इस असमानता के कारण कई अधिकारी लंबे समय तक प्रमोशन का इंतजार करते रहते हैं, जिससे उनके मनोबल पर भी असर पड़ता है।

बढ़ रहे हैं इस्तीफे और VRS

प्रमोशन में देरी का असर यह भी है कि कई अधिकारी समय से पहले सेवा छोड़ने लगे हैं। पिछले पांच वर्षों में CAPF में वॉलेंटरी रिटायरमेंट स्कीम यानी VRS लेने वाले अधिकारियों की संख्या में लगभग 25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी देखी गई है। रिपोर्टों के अनुसार पिछले तीन वर्षों में लगभग 20 हजार जवानों और अधिकारियों ने या तो स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली या नौकरी छोड़ दी। CAPF के अधिकारियों का कहना है कि यदि कैरियर ग्रोथ का रास्ता स्पष्ट नहीं होगा तो यह प्रवृत्ति आगे भी जारी रह सकती है।

सुप्रीम कोर्ट का क्या फैसला था

इस विवाद को लेकर मामला अदालत तक पहुंचा था। Supreme Court of India ने 2019 में दिए एक महत्वपूर्ण फैसले में CAPF के कैडर अधिकारियों की मांगों को उचित माना था। इसके बाद 2025 में अदालत ने एक और निर्णय देते हुए कहा कि CAPF को “ऑर्गनाइज्ड ग्रुप-ए सर्विस” यानी OGAS का दर्जा दिया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि शीर्ष पदों पर IPS अधिकारियों का कोटा धीरे-धीरे कम किया जाए, ताकि CAPF के अपने अधिकारियों को भी नेतृत्व के अवसर मिल सकें। अदालत ने इस प्रक्रिया को दो वर्षों के भीतर लागू करने का सुझाव दिया था।

CAPF की प्रमुख मांगें

CAPF के कैडर अधिकारियों की दो मुख्य मांगें रही हैं — पहली, उन्हें ऑर्गनाइज्ड ग्रुप-ए सर्विस का पूरा लाभ मिले। दूसरी, उन्हें नॉन-फंक्शनल फाइनेंशियल अपग्रेडेशन (NFFU) दिया जाए। NFFU का मतलब यह है कि यदि पद खाली न होने के कारण किसी अधिकारी को प्रमोशन नहीं मिलता है तो उसे उसके बैच के समकक्ष अधिकारी के बराबर वेतन और लाभ मिल सके।

सरकार का प्रस्तावित नया बिल

अब केंद्र सरकार ‘केंद्रीय सशस्त्र बल (सामान्य प्रशासन) बिल’ लाने की तैयारी कर रही है। सरकार का कहना है कि इस बिल से CAPF की प्रशासनिक व्यवस्था को और स्पष्ट और मजबूत बनाया जा सकेगा। हालांकि CAPF के कई अधिकारी मानते हैं कि यह बिल सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को कमजोर कर सकता है जिसमें IPS अधिकारियों का कोटा कम करने की बात कही गई थी। उनका कहना है कि यदि यह बिल लागू हुआ तो DIG, IG और उससे ऊपर के पदों पर IPS अधिकारियों की नियुक्ति का रास्ता फिर से आसान हो जाएगा।

राजनीतिक और प्रशासनिक बहस

यह मुद्दा अब राजनीतिक बहस का विषय भी बन चुका है। संसद में भी इस पर सवाल उठने लगे हैं। कुछ सांसदों का कहना है कि CAPF देश की सुरक्षा व्यवस्था की रीढ़ है और उसके अधिकारियों को कैरियर में समान अवसर मिलना चाहिए। दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि IPS अधिकारियों का अनुभव और प्रशासनिक प्रशिक्षण CAPF के लिए उपयोगी होता है, इसलिए दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

आगे क्या हो सकता है

अब सबकी नजर इस बात पर है कि प्रस्तावित बिल संसद में कब पेश होगा और उस पर क्या फैसला लिया जाएगा। यदि बिल पारित होता है तो CAPF और IPS के बीच अधिकारों और पदों की यह खींचतान और तेज हो सकती है। साफ है कि यह केवल प्रमोशन का मुद्दा नहीं बल्कि देश की सुरक्षा व्यवस्था में नेतृत्व संरचना से जुड़ा बड़ा प्रशासनिक सवाल बन चुका है। आने वाले समय में सरकार, अदालत और सुरक्षा बलों के बीच संतुलन कैसे बनेगा, यही इस विवाद की दिशा तय करेगा।

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