बजट का सीधा असर बाजार पर
केंद्रीय बजट 2026 में सरकार ने शेयर बाजार से जुड़े निवेशकों और खासकर एक्टिव ट्रेडर्स के लिए कई अहम बदलावों का ऐलान किया है। डेरिवेटिव ट्रेडिंग यानी फ्यूचर्स और ऑप्शंस पर टैक्स बढ़ाने के साथ-साथ शेयर बायबैक की टैक्स व्यवस्था में भी बड़ा संशोधन किया गया है। इन प्रस्तावों का सीधा प्रभाव शॉर्ट टर्म ट्रेडिंग, हाई फ्रिक्वेंसी ट्रेडर्स और कॉरपोरेट प्रमोटर्स पर पड़ने वाला है। सरकार का मानना है कि इन बदलावों से बाजार में अनुशासन बढ़ेगा और टैक्स सिस्टम ज्यादा संतुलित बनेगा।
फ्यूचर्स-ऑप्शंस ट्रेडिंग हुई महंगी
बजट प्रस्तावों के अनुसार सरकार ने फ्यूचर्स ट्रेडिंग पर लगने वाले सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) को 0.02 प्रतिशत से बढ़ाकर 0.05 प्रतिशत करने का फैसला किया है। वहीं ऑप्शंस ट्रेडिंग में अब प्रीमियम और एक्सरसाइज दोनों पर 0.15 प्रतिशत STT लगेगा। अभी तक ऑप्शंस प्रीमियम पर 0.1 प्रतिशत और एक्सरसाइज पर 0.125 प्रतिशत टैक्स लिया जाता था। इस बदलाव से डे ट्रेडिंग और बार-बार सौदे करने वाले निवेशकों की लागत बढ़ेगी, जिससे उनके मुनाफे पर सीधा असर पड़ सकता है।
शॉर्ट टर्म ट्रेडर्स पर ज्यादा दबाव
मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि STT में बढ़ोतरी का सबसे ज्यादा असर उन ट्रेडर्स पर होगा जो रोजाना बड़ी संख्या में सौदे करते हैं। हाई फ्रिक्वेंसी ट्रेडिंग और शॉर्ट टर्म सट्टेबाजी पर इससे कुछ हद तक रोक लग सकती है। हालांकि दूसरी ओर यह भी आशंका जताई जा रही है कि बढ़ी हुई लागत के कारण छोटे रिटेल ट्रेडर्स बाजार से दूरी बना सकते हैं, जिससे उनकी भागीदारी घटने का खतरा है।
शेयर बायबैक पर टैक्स सिस्टम बदला
सरकार ने शेयर बायबैक को लेकर भी बड़ा कदम उठाया है। अब बायबैक से मिलने वाली राशि को सभी शेयरधारकों के लिए कैपिटल गेन माना जाएगा और उसी के अनुसार टैक्स लगेगा। पहले कंपनियां खुद बायबैक टैक्स का भुगतान करती थीं, जिससे शेयरधारकों पर सीधा बोझ नहीं पड़ता था। सरकार का कहना है कि कुछ प्रमोटर्स बायबैक के जरिए टैक्स बचाने के रास्ते खोज रहे थे, जिसे रोकने के लिए यह बदलाव जरूरी है।
प्रमोटर्स पर बढ़ेगा टैक्स बोझ
नए नियमों के तहत प्रमोटर्स के लिए बायबैक अब ज्यादा महंगा सौदा साबित हो सकता है। कॉरपोरेट प्रमोटर्स पर प्रभावी टैक्स दर करीब 22 प्रतिशत, जबकि नॉन-कॉरपोरेट प्रमोटर्स के लिए यह लगभग 30 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। इससे बायबैक के जरिए टैक्स आर्बिट्रेज करना मुश्किल हो जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि लॉन्ग टर्म निवेशकों पर इन फैसलों का असर सीमित रहेगा, लेकिन एक्टिव ट्रेडर्स और प्रमोटर्स को अपनी निवेश रणनीति पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है।
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