क्यों हैं अलग बोहरा मुसलमान बाकी सभी फिरकों और तबकों से, क्या है प्रधानमंत्री मोदी के मिलने की वजह

मुंबई। पीएम नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार यानी 10 फरवरी को मुंबई में दाऊदी बोहरा समुदाय के सैफ एकेडमी के एक कैंपस का उद्घाटन किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि मुझे बार-बार प्रधानमंत्री मत कहिए। मैं आपके परिवार का सदस्य हूं। इससे पहले 2018 में मोदी प्रधानमंत्री के तौर पर इंदौर में बोहरा समुदाय के कार्यक्रम में शामिल हुए थे।

आखिर कौन हैं ये बोहरा और क्यों अभी सुर्खियों में हैं, यह जानने के लिए पहले इस्लामिक फिरकों को समझते हैं-

इस्लाम के भी हैं दर्जनों फिरके, इस्लाम में भी जातिवाद

मुसलमान दावा करते हैं कि उनके यहां सब एक कतार में खड़े होते हैं, कोई भेदभाव नहीं है, लेकिन यह सच नहीं है। अभी पाकिस्तान में हमने देखा कि अहमदिया मुसलमानों के घर किस तरह तोड़े जा रहे थे, मस्जिदें भी तोड़ीं गयीं। भारत में तो मुसलमान सैकड़ों फिरकों में है ही, जातिवाद का भी शिकार है।

मुसलमानों का सबसे बड़ा विभाजन दो फिरकों में है- सुन्नी और शिया। पूरी दुनिया में 85 फीसदी मुसलमान सुन्नी हैं। बाकी के 15 फीसदी शिया हैं। सुन्नी वे हैं जो पैगंबर मुहम्मद के कहे मुताबिक व्यवहार करते हैं और मानते हैं कि मुहम्मद के बाद उनके ससुर अबू बकर मुसलमानों के खलीफा बने। बकर के बाद उमर और उस्मान और फिर अली मुसलमानों के खलीफा हुए।

शिया मानते हैं कि मुहम्मद के बाद अली ही असली वारिस थे। बाकी, इस्लाम एक मात्र मजहब है, पैगंबर एकमात्र संदेशवाहक और कुरान एकमात्र किताब, ये दोनों ही मानते हैं। इसके बाद सुन्नियों के अलग फिरके हैं- हनफी, सलाफी, बरेलवी और हमली। उसी तरह शियाओं के कई फिरके हैं, फिर बोहरा मुसलमान हैं। कुल मिलाकर इस्लाम के 72 फिरके यानी संप्रदाय हैं, जो सभी के सभी भारत में रहते हैं।

सभी 72 फिरके भारत में

बड़ी बात है कि भारत में सिर्फ सुन्नी और शिया ही नहीं, बल्कि मुसलमानों के सभी 72 फिरकों की थोड़ी ना थोड़ी आबादी है और वो सभी आपसी भाईचारे के साथ रह रहे हैं। यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तान में अहमदिया मुसलमानों की मस्जिद को सुन्नी मुसलमानों का एक समूह तोड़ने लगा था। वहां तो अहमदिया को मुसलमान मानने से ही इनकार कर दिया गया है। भारत में मुसलमानों के सभी 72 फिरके साथ रहते हैं। यहां कभी पाकिस्तान जैसी घटना सामने नहीं आती है।

कारोबारी हिंदुओं ने बदला था धर्म

अब बात मुसलमानों के बोहरा समुदाय की करते हैं। यह जानना दिलचस्प होगा कि सुन्नी और शिया, दोनों फिरकों का अपना-अपना बोहरा समुदाय है। सुन्नियों का बोहरा सुन्नी बोहरा कहलाता है जबकि शियाओं का बोहरा समुदाय दाऊदी बोहरा के नाम से जाना जाता है।

बोहरा भी 16वीं सदी में खिलाफत को लेकर दाऊदी और सुलेमानी दो भागों में बंट गए। भारत में दाऊदी बोहरा की आबादी 5 लाख और सुलेमानी बोहरा की आबादी 3 लाख है। वहीं पूरी दुनिया में दाऊदी बोहरा करीब 10 लाख और सुलेमानी बोहरा करीब 5 लाख हैं। भारत के अलावा इस समुदाय के लोग करीब 40 देशों में रहते हैं।

क्यों हैं बोहरा चर्चा में

बोहरा समुदाय के लोग सैयदना के पद पर बैठे शख्स को सुपर अथॉरिटी यानी सर्वोच्च सत्ता मानते हैं। शादी-ब्याह, बच्चे का नामकरण, विदेश यात्रा, हज, नए कारोबार, अंतिम संस्कार आदि सभी कुछ सैयदना की अनुमति से ही संभव होता है। समुदाय के लोग अपनी वार्षिक आमदनी का एक निश्चित हिस्सा दान में देते हैं। इस वक्त दाऊदी बोहरा के लीडर डॉ. सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन हैं। हालांकि उनके ही परिवार के लोग उस पर अपना दावा करते हैं और ये मामला बॉम्बे हाईकोर्ट में चल रहा है। ये मुकदमा चाचे और भतीजे के बीच का है।

इसके अलावा, 2018 में दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना प्रथा के खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। धर्म के नाम पर लंबे समय से चली आ रही इस परंपरा को अमानवीय बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। कोर्ट में दायर जवाब में केंद्र सरकार ने कहा कि वो इस तरह की परंपरा के पक्ष में नहीं है।

तीसरा मामला बहिष्कार या बराअत का है। बोहरा समुदाय बराअत की वजह से भी चर्चा में रहा है। सैयदना के फैसले का उल्लंघन करने वालों को बराअत यानी सामाजिक बहिष्कार का फरमान सुनाया जाता है। अगर किसी शख्स के खिलाफ बराअत का आदेश सैयदना जारी करते हैं तो इसके बाद उस शख्स को मस्जिद में एंट्री नहीं दी जाती है। मरने के बाद उसे कब्रिस्तान में भी दफनाने की इजाजत भी नहीं मिलती है। इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की संवैधानिक पीठ सुनवाई करेगी।

बोहरा समुदाय का बुरका भी काले की जगह गुलाबी होता है।

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