गोंड राजा भभूत सिंह की पचमढ़ी में कैबिनेट बैठक….सीएम डॉ.मोहन यादव के नेतृत्व में आदिवासी क्षेत्रों पर बढ़ा भाजपा सरकार का फोकस…जानें एमपी में कितनी है आदिवासियों की सियासी ताकत

गोंड राजा भभूत सिंह की पचमढ़ी में कैबिनेट बैठक….सीएम डॉ.मोहन यादव के नेतृत्व में आदिवासी क्षेत्रों पर बढ़ा भाजपा सरकार का फोकस…जानें एमपी में कितनी है आदिवासियों की सियासी ताकत

आज Pachmarhi में मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव की अध्यक्षता में कैबिनेट बैठक Cabinet meeting आयोजित होने वाली है। कैबिनेट की यह बैठक गोंड राजा भभूत सिंह की स्मृति में रखी गई है। गोंड राजा भभूत सिंह Gond King Bhabhut Singh ने देश की आजादी के लिए अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी थी। ऐसे में पचमढ़ी में कैबिनेट की बैठक बीजेपी सरकार के आदिवासी नायकों को सम्मानित करने के प्रयासों का यह एक हिस्सा माना जा है। कैबिनेट बैठक विशेष तौर पर गोंड राजा भभूत सिंह की बहादुरी के साथ उनकी विरासत को याद करने के लिए ही पचमढ़ी में हो रही है। गोंड राजा भभूत सिंह Gond King Bhabhut Singh को आदिवासी गौरव और शौर्य के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। गोंड राजा भभूत सिंह का मध्यप्रदेश के पचमढ़ी Pachmarhi  से गहरा ऐतिहासिक ही नहीं भावनात्मक संबंध भी रहा है। भभूत सिंह 19वीं शताब्दी में सतपुड़ा की पहाड़ियों Satpura Hills में स्थित हर्राकोट राईखेड़ी शाखा के जागीरदार परिवार में जन्मे थे। यह पचमढ़ी क्षेत्र का हिस्सा है।

जानें गोंड राजा भभूत सिंह का क्या है पचमढ़ी से संबंध

गोंड राजा भभूत सिंह का पचमढ़ी Pachmarhi से गहरा ऐतिहासिक और भावनात्मक संबंध रहा है। वे 19वीं शताब्दी में सतपुड़ा की पहाड़ियों में स्थित हर्राकोट राईखेड़ी शाखा के जागीरदार परिवार में जन्मे थे, जो पचमढ़ी क्षेत्र का हिस्सा है।

पचमढ़ी उनके संघर्ष का केंद्र रहा

राजा भभूत सिंह ने पचमढ़ी और उसके आसपास के क्षेत्रों को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ अपने सशस्त्र संघर्ष का मुख्य केंद्र बनाया। सतपुड़ा की घनी वादियों, महादेव की पहाड़ियों और देनवा घाटी की भौगोलिक जानकारी का लाभ उठाकर उन्होंने छापामार युद्ध की रणनीति अपनाई, जिससे अंग्रेजों को भारी क्षति हुई। उनकी रणकौशलता के कारण उन्हें “नर्मदांचल का शिवाजी” कहा जाता है।

दरअसल मध्यप्रदेश में जब से डॉ.मोहन यादव के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बनी है। तब से प्रदेश के आदिवासियों पर सरकार का फोकस बढ़ गया है। प्रदेश में जब से डॉ. मोहन यादव ने मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली है, तब से मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार ने आदिवासी समुदाय और उनके क्षेत्रों के विकास पर विशेष तौर पर फोकस किया है। Cabinet meeting in Pachmarhi राज्य सरकार की नीतियों और योजनाओं में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि आदिवासी वर्ग को समाज की मुख्यधारा में लाने और सशक्त बनाने की दिशा में गंभीर प्रयास हो रहे हैं।

दरअसल मध्यप्रदेश एक ऐसा स्टेट है जहां विधानसभा की करीब 90 सीटों पर आदिवासी वर्ग का मतदाता चुनाव में हार और जीत में अहम भूमिका निभाता है। वहीं राज्य में करीब 47 सीटें ऐसी हैं जहां आदिवासी वोट निर्णायक भूमिका में हैं। शायद यही वजह है कि राज्य की बीजेपी सरकार का पूरा फोकस आदिवासी क्षेत्रों के विकास और इस वर्ग के मतदाताओं पर रहता है।

मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण के तत्काल  Dr. Mohan Yadav  ने स्पष्ट संकेत दे दिये थे कि आदिवासी विकास उनकी सरकार की प्राथमिकताओं में सदैव ही शामिल रहेगा। इसके तहत न केवल बुनियादी सुविधाओं का विस्तार किया गया है, बल्कि सांस्कृतिक पहचान उनकी शिक्षा और स्वास्थ्य के साथ रोजगार से जुड़ी योजनाएं भी शुरू की गई हैं।

सरकारी सम्मान और पहल

आदिवासी गौरव दिवस को नियमित रूप से मनाया जा रहा है। मध्यप्रदेश के आदिवासी नायकों Tribal heroes of Madhya Pradesh राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह, रानी दुर्गावती, टंट्या मामा भील की स्मृति में सांस्कृतिक कार्यक्रम और जन संवाद भी समय समय पर आयोजित किए जाते हैं। भोपाल में रानी कमलापति के नाम पर रेलवे स्टेशन का नामकरण किया गया है। शिक्षा के क्षेत्र में ई-लर्निंग केंद्र, आवासीय विद्यालयों और छात्रावासों की संख्या में वृद्धि की गई है। प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) और जल जीवन मिशन जैसी केंद्रीय योजनाओं को भी राज्य के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में तेजी से लागू किया जा रहा है।

राजनीतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण

राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि आदिवासी मतदाता मध्यप्रदेश की लगभग 47 विधानसभा सीटों assembly seats पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ऐसे में बीजेपी सरकार का यह फोकस राजनीतिक दृष्टि से भी रणनीतिक माना जा रहा है। मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव ने हाल ही में झाबुआ और मंडला जिलों के दौरे में कहा था “हम केवल योजनाएं नहीं बना रहे, बल्कि ज़मीन पर बदलाव ला रहे हैं। आदिवासी समाज के बिना आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश की कल्पना अधूरी है।

मध्यप्रदेश के आदिवासी नायक न सिर्फ़ स्थानीय इतिहास में बल्कि भारत की आजादी की लड़ाई और सांस्कृतिक विरासत में भी महत्वपूर्ण योगदान रखते हैं। इन वीर नायकों ने अंग्रेजों ही नहीं सामंतों और अन्य शोषणकारी ताकतों के खिलाफ संघर्ष किया। अपने समुदाय की संस्कृति, आत्मसम्मान और अधिकारों की रक्षा की।

मध्यप्रदेश के प्रमुख आदिवासी नायक

टंट्या भील (टंट्या मामा)

समुदाय: भील
जन्म: 1842, बड़वानी ज़िला
उपाधि: “भीलों का रॉबिनहुड”
कार्य: उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध किया और अमीरों से लूटकर गरीबों में बाँटा।
शहादत: 1889 में अंग्रेजों ने उन्हें पकड़कर फांसी दी।
विरासत: मध्यप्रदेश सरकार हर साल “टंट्या मामा जयंती” मनाती है।

राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह

समुदाय: गोंड
क्षेत्र: जबलपुर (गढ़ा मंडला राज्य)
कार्य: 1857 की क्रांति में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह किया।
शहादत: ब्रिटिशों ने दोनों को तोप से उड़ा दिया।
विशेष: यह बलिदान आदिवासी क्रांति की शुरुआत मानी जाती है।

रानी दुर्गावती

समुदाय: गोंड (विवाहित)
क्षेत्र: मंडला, जबलपुर
कार्य: मुगलों के खिलाफ युद्ध किया और अंतिम साँस तक लड़ती रहीं।
शहादत: 1564
विशेष: मध्यप्रदेश में उनके नाम पर विश्वविद्यालय और अनेक संस्थान स्थापित हैं।

बिरसा मुंडा (हालाँकि झारखंड से जुड़े हैं, पर प्रभाव मध्यप्रदेश तक था)
समुदाय: मुंडा
कार्य: आदिवासी अधिकारों, धर्म और संस्कृति की रक्षा में आंदोलन चलाया।
महत्व: मध्यप्रदेश के कई आदिवासी इलाकों में उनके विचारों का गहरा प्रभाव है।

अन्य क्षेत्रीय आदिवासी नायक
गुनू उइके – बैतूल क्षेत्र के आदिवासी नेता
नाहर सिंह गोंड – मंडला जिले से
रूप सिंह नायक – धार और अलीराजपुर के क्षेत्रों में सक्रिय भील योद्धा
(प्रकाश कुमार पांडेय)

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