बीजेपी का ‘सी-फोर’ दांव: आखिर क्यों नितिन नबीन बने कार्यकारी अध्यक्ष….
बीजेपी की संगठनात्मक राजनीति में एक बार फिर बड़ा और चौंकाने वाला फैसला सामने आया है। पार्टी ने नितिन नबीन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर न सिर्फ सियासी हलकों में हलचल मचा दी, बल्कि यह भी साफ कर दिया कि अब संगठन में नए संतुलन और नए पावर सेंटर तैयार किए जा रहे हैं। डी-फोर रणनीति के बाद अब बीजेपी ने जिस तरह ‘सी-फोर’ जैसा सियासी धमाका किया है, उसके कई मायने निकाले जा रहे हैं।
क्योंकि 2012 में राजनाथ सिंह के स्थान पर इसी तरह नितिन गडकरी को बीजेपी ने पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया था। उस समय दिल्ली के चार बड़े नेताओं के नाम चर्चा थे, लेकिन कुर्सी महाराष्ट्र के गडकरी को मिली थी।
नितिन नबीन ही क्यों?
नितिन नबीन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने के पीछे सबसे बड़ी वजह उनकी संगठनात्मक पकड़ और अनुशासित छवि मानी जा रही है। पार्टी के भीतर उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जो बिना विवाद, बिना बयानबाजी, सीधे संगठन का काम करने में भरोसा रखते हैं। बीजेपी इस समय ऐसे ही चेहरों को आगे बढ़ा रही है, जो चुनावी मोर्चे के साथ-साथ संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत कर सकें।
इसके अलावा नितिन नबीन का RSS बैकग्राउंड, लंबे समय से पार्टी के प्रति निष्ठा और अलग-अलग जिम्मेदारियों को चुपचाप निभाने का रिकॉर्ड भी उनके पक्ष में गया। पार्टी नेतृत्व को लगता है कि आने वाले समय में संगठन को ज्यादा “मैनेजमेंट मोड” में चलाने की जरूरत है, और नबीन उस भूमिका में फिट बैठते हैं।
क्या ये सिर्फ संतुलन की राजनीति है?
राजनीतिक जानकारों की मानें तो यह फैसला केवल किसी एक चेहरे को आगे बढ़ाने का नहीं, बल्कि संगठनात्मक संतुलन साधने की रणनीति का हिस्सा है। बीजेपी में फिलहाल कई बड़े नेता, कई दावेदार और कई क्षेत्रीय समीकरण सक्रिय हैं। ऐसे में कार्यकारी अध्यक्ष का पद बनाकर पार्टी ने यह संकेत दिया है कि सत्ता और संगठन दोनों में एक ही व्यक्ति सब कुछ नियंत्रित नहीं करेगा।
यही वजह है कि इसे डी-फोर के बाद सी-फोर रणनीति कहा जा रहा है—जहां पार्टी एक के बाद एक सियासी ‘ब्लास्ट’ कर पुराने समीकरण तोड़ रही है और नए खांचे बना रही है।
जो सपना देख रहे थे उनका क्या होगा?
बीजेपी में शिवराज सिंह चौहान और धर्मेन्द्र प्रधान सहित सहित ऐसे कई नेता थे जो पार्टी अध्यक्ष बनने का सपना संजोए हुए थे। नबीन को नई जिम्मेदारी मिलने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि इस फैसले के बाद इन नेताओं की भूमिका क्या रह जाएगी? क्या यह फैसला उनके प्रभाव को सीमित करने की दिशा में उठाया गया कदम है?
फिलहाल पार्टी सूत्रों की मानें तो धर्मेन्द्र प्रधान और शिवराज सिंह चौहान जैसे नेताओं को पूरी तरह साइडलाइन करना बीजेपी की रणनीति नहीं है। यह नेता अब भी एक बड़ा चेहरा हैं। खासकर चुनावी राजनीति और जनसंपर्क के मामले में इनका कोई तोड़ नहीं, लेकिन यह साफ है कि संगठन पर उनकी एकछत्र पकड़ को अब बांटा जा रहा है।
बीजेपी नेतृत्व शायद यह मान चुका है कि चुनाव जीतने और संगठन चलाने के लिए अलग-अलग कौशल चाहिए। शिवराज को जहां जनआधार, भाषण और चुनावी चेहरे के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा, वहीं नितिन नबीन जैसे नेता संगठन की अंदरूनी मशीनरी संभालेंगे।
भविष्य का संकेत
इस पूरे घटनाक्रम से यह भी संकेत मिलता है कि बीजेपी आने वाले समय में कलेक्टिव लीडरशिप मॉडल की ओर बढ़ रही है। एक ही नेता पर पूरी पार्टी निर्भर रहे, इस सोच से पार्टी धीरे-धीरे बाहर निकल रही है। नए चेहरे, नए पद और नई संरचनाएं उसी दिशा का संकेत हैं।
नितिन नबीन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाना कोई साधारण नियुक्ति नहीं, बल्कि एक सोची-समझी सियासी चाल है। यह फैसला बताता है कि बीजेपी अब पुराने ढर्रे को तोड़कर नए संगठनात्मक प्रयोग करने के मूड में है। शिवराज की भूमिका खत्म नहीं हो रही, लेकिन अब वह अकेले केंद्र में नहीं रहेंगे। डी-फोर के बाद सी-फोर का यह धमाका साफ संकेत है—बीजेपी में अब बदलाव सिर्फ चेहरों का नहीं, पूरा पावर स्ट्रक्चर बदला जा रहा है।
मोदी युग की सरप्राइज परंपरा जारी
नबीन के रुप में बीजेपी के मोदी युग का एक ट्रेडमार्क सरप्राइज़ आप कह सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने फैसलों से अक्सर चौंकाते रहे हैं और नितिन नबीन की राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर नियुक्ति ने बता दिया कि चौंकाने की यह मोदी परंपरा अभी भी जारी है। नितिन नबीन अभी बिहार सरकार में मंत्री हैं।