Bihar Exit Poll 2025: बिहार में फिर नीतीश कुमार की वापसी के संकेत, NDA को स्पष्ट बहुमत की उम्मीद — वोट शेयर में कौन आगे?
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के एग्जिट पोल्स ने एक बार फिर सूबे की राजनीति में हलचल मचा दी है। मतदान संपन्न होते ही विभिन्न सर्वे एजेंसियों की ओर से जारी अनुमानों में एनडीए (NDA) को स्पष्ट बहुमत मिलता दिख रहा है। अगर ये अनुमान सही साबित होते हैं तो नीतीश कुमार के नेतृत्व में एक बार फिर सत्ता की वापसी तय मानी जा रही है।
राज्य की कुल 243 विधानसभा सीटों में बहुमत का आंकड़ा 122 है। एग्जिट पोल के अनुसार NDA को 140 से 150 सीटों, जबकि महागठबंधन को 85 से 95 सीटों तक सीमित रहने का अनुमान है। प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी को 0 से 5 सीटों के बीच आकलित किया गया है।
जानें क्या कहता है एग्जिट पोल
अलग-अलग एजेंसियों के अनुमान भले ही कुछ सीटों के इधर-उधर हों, लेकिन तस्वीर लगभग एक जैसी है — एनडीए आगे है, महागठबंधन पीछे।
सर्वे एजेंसी NDA महागठबंधन जन सुराज अन्य
चाणक्य स्ट्रैटजीज 130-138 100-108 0 3-5
दैनिक भास्कर 145-160 73-91 0-3 5-7
DV रिसर्च 137-152 83-98 2-4 1-8
JVC 135-150 88-103 0-1 3-6
Matrize 147-167 70-90 0-2 2-8
P-Mark 142-162 80-98 1-4 0-3
People Insights 133-148 87-102 0-2 3-6
People Pulse 133-159 75-101 0-5 2-8
Poll of Polls (औसत) 147 90 1 5
इन आंकड़ों से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि बिहार की सत्ता एक बार फिर नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले एनडीए के पास जा सकती है।
वोट शेयर में NDA को बढ़त
प्रारंभिक अनुमानों के मुताबिक एनडीए को करीब 46-48 प्रतिशत वोट शेयर, जबकि महागठबंधन को 39-41 प्रतिशत वोट शेयर मिलने का अनुमान है। जन सुराज पार्टी को करीब 2 प्रतिशत वोट मिलने की संभावना जताई गई है। इसका अर्थ यह है कि नीतीश कुमार और भाजपा की साझेदारी अब भी बिहार के ग्रामीण और शहरी वोटर दोनों में प्रभावशाली बनी हुई है।
‘फिर से नीतीशे कुमार’?
एग्जिट पोल्स में सामने आए रुझानों के बाद सोशल मीडिया पर नारा चल पड़ा है — “फिर से नीतीशे कुमार”। जेडीयू नेताओं ने X (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए लिखा, “बिहार ने एनडीए को ऐतिहासिक जनादेश दिया है। अब हारने वाले EVM पर ठीकरा फोड़ेंगे, लेकिन जनता ने विकास पर भरोसा किया है।
दरअसल नीतीश कुमार के लिए यह परिणाम राजनीतिक रूप से बेहद अहम हैं, क्योंकि बीते वर्षों में उनके “यू-टर्न” वाली छवि पर विपक्ष लगातार हमला करता रहा। यदि अंतिम परिणाम भी एग्जिट पोल की तरह ही रहे, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि नीतीश एक बार फिर “किंगमेकर नहीं, किंग” के रूप में उभरेंगे।
तेजस्वी यादव की मेहनत पर पानी?
आरजेडी नेता और लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव ने इस चुनाव में आक्रामक प्रचार अभियान चलाया। बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर उन्होंने नीतीश सरकार को घेरा।
लेकिन एग्जिट पोल्स के अनुमान बताते हैं कि जनता ने विकास और स्थिरता पर अधिक भरोसा जताया। हालांकि, कई एजेंसियों के अनुमान में महागठबंधन 100 सीटों का आंकड़ा पार कर रहा है, जो बताता है कि विपक्ष पूरी तरह हाशिये पर नहीं है। तेजस्वी यादव अब भी युवा वोट बैंक में मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं, जो भविष्य की राजनीति के लिए उनके लिए सकारात्मक संकेत है।
प्रशांत किशोर की जन सुराज — प्रचार में बड़ी, नतीजों में छोटी
प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी को लेकर बड़ी उम्मीदें थीं। उनके संगठन ने गांव-गांव तक “जन संवाद यात्रा” के जरिए मुद्दों को उठाया, लेकिन एग्जिट पोल्स में पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। ज्यादातर सर्वे एजेंसियों ने जनसुराज को 0 से 5 सीटों के बीच आंका है। यह संकेत देता है कि भले ही जनसुराज ने वैचारिक चर्चा को हवा दी हो, लेकिन मतदाताओं के पारंपरिक जातिगत और गठबंधन-आधारित समीकरण अभी भी बिहार में निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं।
बीजेपी बनाम जेडीयू — कौन बड़ा भाई?
दिलचस्प रूप से कुछ सर्वे एजेंसियों के अनुमानों में जेडीयू (JDU) को बीजेपी से आगे दिखाया गया है। अगर अंतिम परिणाम भी ऐसा ही रहा तो नीतीश कुमार एक बार फिर बड़े भाई की भूमिका में नजर आ सकते हैं। यह परिदृश्य एनडीए के भीतर शक्ति-संतुलन को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है, खासकर 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले।
बिहार का राजनीतिक परिदृश्य और एग्जिट पोल की सटीकता
बिहार के चुनावों में एग्जिट पोल का रिकॉर्ड बहुत भरोसेमंद नहीं रहा है। 2020 के विधानसभा चुनाव में लगभग सभी एग्जिट पोल्स ने महागठबंधन को विजेता बताया था, लेकिन नतीजों में एनडीए ने 125 सीटें जीतकर सरकार बना ली थी। इसी तरह 2015 में, जब एग्जिट पोल्स ने करीबी मुकाबले की बात कही थी, तब लालू-नीतीश गठबंधन ने दो-तिहाई बहुमत (178 सीटें) हासिल कर ली थीं।
इसलिए इस बार भी सभी राजनीतिक दल वास्तविक परिणाम आने तक राहत की सांस नहीं ले रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो जातिगत समीकरण, महिला मतदाताओं की भागीदारी, और केंद्र की योजनाओं का असर — ये तीन कारक एग्जिट पोल्स की दिशा बदल सकते हैं।
एनडीए की रणनीति — “विकास और स्थिरता” पर फोकस
एनडीए ने इस चुनाव में “विकास हुआ है, अब विश्वास चाहिए” नारे के साथ मैदान में उतरकर शिक्षा, सड़क और रोजगार पर जोर दिया। नीतीश कुमार ने महिलाओं के सशक्तिकरण, शराबबंदी और पंचायती सशक्तिकरण जैसे मुद्दों को अपनी उपलब्धि के तौर पर प्रस्तुत किया, वहीं भाजपा ने केंद्र की योजनाओं — प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्जवला और आयुष्मान भारत — को जनता तक पहुंचाया। इन दोनों ताकतों के संयुक्त प्रभाव से एनडीए का वोट शेयर स्थिर रहा।
महागठबंधन की चुनौतियां
राजद-कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती रही — एकीकृत नेतृत्व का अभाव।
भले ही तेजस्वी यादव ने ऊर्जा से प्रचार किया, लेकिन महागठबंधन के भीतर संगठनात्मक सामंजस्य कमजोर रहा। कांग्रेस का प्रदर्शन पिछली बार की तरह ही फीका दिख रहा है।
नतीजों से पहले संकेत साफ
एग्जिट पोल में बिहार का जनादेश एक बार फिर स्थिरता और अनुभव के पक्ष में झुकता दिखाई दे रहा है। इन सभी एग्जिट पोल्स के ये रुझान अगर अंतिम परिणाम में भी दोहराए गए, तो यह नीतीश कुमार के राजनीतिक कौशल की एक और मिसाल होगी। जिन्होंने बदलते गठबंधनों और राजनीतिक समीकरणों के बीच भी अपनी “जन-स्वीकृति” को कायम रखा है। अब सबकी निगाह 14 नवंबर पर टिकी हैं, जब मतगणना होगी और खुलासा होगा कि क्या एग्जिट पोल इस बार सही साबित होंगे या बिहार एक बार फिर सभी अनुमानों को धता बताएगा — यह आने वाला शुक्रवार तय करेगा। प्रकाश कुमार पांडेय





