Bihar Elections 2025: मुस्लिम प्रतिनिधित्व में भारी गिरावट, क्यों घट रही है सियासी हिस्सेदारी?
क्या मुस्लिम राजनीति हाशिए पर?
चुनावी समीकरण में मुस्लिम प्रतिनिधित्व घटा
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तैयारियां जोरों पर हैं। पहले चरण के नामांकन की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, लेकिन उम्मीदवारों की सूची ने एक नई बहस को जन्म दिया है — राज्य की राजनीति में मुस्लिम प्रतिनिधित्व की गिरती हिस्सेदारी पर। बिहार की कुल आबादी में मुसलमान लगभग 17.7% हैं, और सीमांचल जैसे इलाकों में यह संख्या 40% से भी अधिक है। इसके बावजूद, प्रमुख राजनीतिक दलों की उम्मीदवार सूची में मुस्लिम नाम बेहद कम नजर आ रहे हैं।
- मुस्लिम उम्मीदवारों की घटती मौजूदगी
- सीमांचल में मुस्लिम आबादी अधिक
- JDU और RJD में कंजूसी
- बीजेपी ने नहीं दिया टिकट
- कांग्रेस पर उठे सवाल
- जन सुराज पार्टी आगे निकली
- पसमांदा मुसलमान पिछड़े रह गए
- वोट बैंक का गणित बदल गया
- 1985 में था स्वर्णकाल
सीमांचल में वोटर लेकिन नेता नहीं
कटिहार, पूर्णिया, अररिया और किशनगंज जैसे जिलों में मुस्लिम मतदाता किसी भी चुनावी नतीजे को बदलने की ताकत रखते हैं। किशनगंज में तो मुस्लिम आबादी 68% से ज्यादा है, फिर भी पार्टियों ने इस क्षेत्र में भी सीमित मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं। यह दर्शाता है कि दल अब इस समुदाय को वोटबैंक के रूप में तो देखते हैं, लेकिन नेतृत्व में हिस्सेदारी देने से हिचक रहे हैं।
JDU और RJD दोनों ने दिखाई कंजूसी
इस बार जेडीयू 101 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, लेकिन उसने सिर्फ 4 मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट दिया है। वहीं आरजेडी ने अब तक तीन ही मुस्लिम उम्मीदवारों के नाम घोषित किए हैं —
ओसामा शहाबुद्दीन (रघुनाथपुर)
यूसुफ सलाहुद्दीन (सिमरी-बख्तियारपुर)
मोहम्मद इसराइल मंसूरी (कांटी)
इन आंकड़ों से साफ है कि प्रमुख पार्टियों में भी अब मुस्लिम नेताओं की हिस्सेदारी सिमटती जा रही है।
बीजेपी की सूची में मुस्लिम शून्य
सत्तारूढ़ गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने जिन 101 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं, उनमें एक भी मुस्लिम नाम नहीं है। बीजेपी के नेताओं का तर्क है कि पार्टी ‘सबका साथ-सबका विकास’ के सिद्धांत पर चलती है और टिकट जाति या धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि जीतने की संभावना पर देती है। हालांकि, विपक्ष इस पर सवाल उठा रहा है कि इतनी बड़ी आबादी के बावजूद किसी एक भी मुस्लिम चेहरे को जगह क्यों नहीं दी गई।
कांग्रेस पर भी उठे सवाल
कांग्रेस पार्टी ने भी अब तक केवल चार मुस्लिम उम्मीदवारों की घोषणा की है। पार्टी के भीतर से ही आवाज उठने लगी है कि राहुल गांधी का “आनुपातिक प्रतिनिधित्व” का नारा बिहार में लागू क्यों नहीं हो रहा? कांग्रेस की परंपरागत मुस्लिम वोटबैंक पर पकड़ अब कमजोर होती दिख रही है।
प्रशांत किशोर की जन सुराज सबसे आगे
इन सबके बीच चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर (PK) की जन सुराज पार्टी ने 116 उम्मीदवारों की सूची में 21 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है। PK ने यह ऐलान किया है कि उनकी पार्टी कुल 40 मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारेगी।
यानी पारंपरिक पार्टियों के मुकाबले जन सुराज ने मुस्लिम प्रतिनिधित्व में सबसे आगे की भूमिका निभाई है।
पसमांदा मुसलमान सबसे ज्यादा उपेक्षित
बिहार के लगभग 2.3 करोड़ मुसलमानों में से 73% पसमांदा समुदाय से आते हैं। फिर भी 1952 से अब तक राज्य के कुल मुस्लिम विधायकों में केवल 18% ही पसमांदा रहे हैं। 2020 के चुनाव में केवल 5 पसमांदा विधायक जीत सके थे, जिनमें से 4 AIMIM से और 1 RJD से थे। यह आंकड़ा बताता है कि राजनीतिक दलों में उच्चवर्गीय मुस्लिमों का वर्चस्व अब भी कायम है।
1985 में चरम पर था प्रतिनिधित्व
इतिहास पर नजर डालें तो 1985 का चुनाव मुस्लिम प्रतिनिधित्व के लिहाज से सबसे मजबूत रहा। तब अविभाजित बिहार की 324 सदस्यीय विधानसभा में 34 मुस्लिम विधायक चुने गए थे। लेकिन 2020 तक यह संख्या घटकर 19 तक सिमट गई।
यानी पिछले चार दशकों में मुस्लिम सियासी प्रभाव लगभग आधा हो गया है।
बदल गया वोट बैंक का गणित
लालू प्रसाद यादव का ‘MY फैक्टर’ — मुस्लिम और यादव गठजोड़ — कभी चुनावी जीत की गारंटी माना जाता था। लेकिन नीतीश कुमार ने सत्ता संतुलन अति पिछड़ा वर्ग (EBC) के साथ जोड़कर बदल दिया। अब बिहार की राजनीति जातीय समीकरणों के नए दौर में पहुंच गई है, जहां मुस्लिम वोट निर्णायक तो हैं, पर निर्णायक नेता नहीं।
क्या मुस्लिम राजनीति अब हाशिए पर?
चुनावी आंकड़े बताते हैं कि बिहार की राजनीति में मुस्लिमों की भूमिका लगातार घट रही है। न कोई बड़ा मुस्लिम चेहरा उभर रहा है, न कोई दल खुलकर इस वर्ग को नेतृत्व देने को तैयार है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या बिहार की मुस्लिम राजनीति अब स्थायी रूप से हाशिए पर जा रही है? या फिर कोई नया नेतृत्व इस गिरावट को रोक पाएगा? यह आने वाला चुनाव तय करेगा कि 17% आबादी वाले समुदाय को बिहार की सत्ता में कितनी आवाज मिलेगी। बिहार की सियासत का यह नया दौर सिर्फ वोटों का नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व और सम्मान की लड़ाई का संकेत दे रहा है — जहां संख्या बड़ी है, लेकिन सियासी आवाज छोटी होती जा रही है। (प्रकाश कुमार पांडेय)





