बिहार चुनाव 2025: सियासी रण में धार्मिक राजनीति का प्रवेश…शाह ने संभाला मोर्चा! माता सीता मंदिर के जरिए सबसे मजबूत गढ़ दुरुस्त करने उतरे शाह
बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और राज्य में सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लगातार राज्य में योजनाओं की घोषणाएं कर रहे हैं, तो वहीं अब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह खुद चुनावी अभियान की अगुवाई करने मैदान में उतर आए हैं। शुक्रवार को सीतामढ़ी के पुनौराधाम में माता सीता मंदिर के शिलान्यास ने न सिर्फ मिथिलांचल में हिंदुत्व का एजेंडा दोबारा सक्रिय कर दिया है, बल्कि यह एनडीए के गढ़ को दुरुस्त करने की बड़ी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
धार्मिक भावनाओं के साथ राजनीति का संगम
माता सीता की जन्मस्थली मानी जाने वाली पुनौराधाम में करीब 67 एकड़ में भव्य मंदिर परिसर का निर्माण होगा। इसमें सीता वाटिका, लव-कुश वाटिका और एक संग्रहालय भी शामिल होगा। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राज्य सरकार के कई मंत्री भी शामिल हुए, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि जेडीयू-बीजेपी की जोड़ी एक बार फिर मिथिला बेल्ट को साधने के लिए एकजुट है। अमित शाह ने इससे पहले एक्स (पूर्व ट्विटर) पर लिखा “शुक्रवार का दिन मिथिलांचल और पूरे देश के लिए सौभाग्य का दिन होगा। माता सीता की जन्मभूमि पर पुनौराधाम मंदिर का शिलान्यास हमारी आस्था और संस्कृति के पुनर्निर्माण का प्रतीक है। यह बयान खुद में साफ संकेत देता है कि बीजेपी अब राम मंदिर के बाद सीता मंदिर को भी चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाने जा रही है।
मिथिलांचल की सियासी अहमियत
बिहार विधानसभा की 243 सीटों में से मिथिलांचल की 60 सीटें बेहद निर्णायक मानी जाती हैं। 2020 में एनडीए ने यहां 40 सीटें जीती थीं। मिथिलांचल का राजनीतिक इतिहास देखें तो कभी यह क्षेत्र आरजेडी का अभेद्य किला हुआ करता था, लेकिन पिछले एक दशक में बीजेपी-जेडीयू ने यहां अपनी पैठ मजबूत की है। अमित शाह का यह दौरा सिर्फ मंदिर शिलान्यास भर नहीं, बल्कि एक साफ राजनीतिक संदेश है — एनडीए का गढ़ इस बार और मजबूत किया जाएगा। चुनावी पंडितों का मानना है कि मिथिला बेल्ट को साधे बिना पटना की सत्ता तक पहुंचना बेहद कठिन होता है।
जातीय समीकरणों की गणित
मिथिलांचल में जातीय समीकरण बेहद जटिल हैं। यहां ब्राह्मण, राजपूत, यादव, मुस्लिम, दलित और अति पिछड़ा वर्ग की उल्लेखनीय उपस्थिति है। ब्राह्मण-राजपूत पारंपरिक रूप से बीजेपी के कोर वोटर रहे हैं।यादव-मुस्लिम समीकरण आरजेडी का आधार हैं। ईबीसी (Extremely Backward Castes) को नीतीश कुमार ने हमेशा साधने की कोशिश की है। यही वजह है कि शाह का यह दौरा ना केवल हिंदू भावनाओं को पुनर्जीवित करने की कोशिश है, बल्कि ब्राह्मण, अति पिछड़े वर्ग और महिलाओं को आकर्षित करने का भी माध्यम बन सकता है — खासतौर पर माता सीता को लेकर क्षेत्र में गहरी आस्था को देखते हुए।
राम के बाद सीता: बीजेपी का नया एजेंडा?
राम मंदिर आंदोलन ने भारतीय राजनीति को पूरी तरह बदल दिया। बीजेपी ने इससे जो राजनीतिक लाभ उठाया, वह अब सबके सामने है। अब उसी रास्ते पर आगे बढ़ते हुए पार्टी ने माता सीता के मंदिर को अपने एजेंडे में शामिल किया है। यह नया प्रयास, खासकर महिलाओं, पारंपरिक वोटरों और युवाओं को जोड़ने की दिशा में एक मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। मिथिलांचल की महिलाएं हमेशा धार्मिक रीति-रिवाजों में अग्रणी रही हैं और माता सीता को “मिथिला पुत्री” के तौर पर सम्मान देती हैं। ऐसे में मंदिर निर्माण का एजेंडा भावनात्मक रूप से वोटरों को जोड़ने की रणनीति है।
विपक्ष की प्रतिक्रिया और संभावित टकराव
आरजेडी, कांग्रेस और वामपंथी दलों ने इस शिलान्यास को “चुनावी स्टंट” बताया है। आरजेडी प्रवक्ता ने कहा बीजेपी को मंदिर की याद सिर्फ चुनाव के वक्त ही क्यों आती है? सीता माता का सम्मान हमारे लिए चुनावी मुद्दा नहीं, हमारी श्रद्धा का विषय है। विपक्ष के नेताओं ने इसे मुद्दों से भटकाने वाला कदम बताया और यह सवाल भी उठाया कि बिहार की बेरोजगारी, पलायन और शिक्षा व्यवस्था पर बात क्यों नहीं हो रही?
धार्मिकता बनाम मुद्दा आधारित राजनीति
बिहार में इस समय सियासत अपने कई रंग दिखा रही है। कई मोर्चों पर सियासी चाल चली जा रही है। जातीय जनगणना का मुद्दा हो या बेरोजगारी और पिछड़ा वर्ग आरक्षण के साथ बाढ़ प्रबंधन, राज्य में शिक्षा संकट ही नहीं मंडी व्यवस्था जैसे कई जमीनी मुद्दे हवा में हैं। लेकिन इन सबके बीच धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक गौरव का एजेंडा बीजेपी बार-बार सफलतापूर्वक इस्तेमाल करती रही है। अमित शाह का यह दौरा केवल मंदिर निर्माण का उद्घोष नहीं, बल्कि यह 2025 विधानसभा चुनाव की उद्घोषणा के रूप में देखा जा रहा है। पुनौराधाम में माता सीता मंदिर के बहाने बीजेपी ने एक बार फिर से साबित किया है कि वह भावनात्मक मुद्दों को भी विकास के साथ जोड़कर सियासत की नई चाल चल सकती है। ऐसे में अब देखना यह होगा कि क्या सीता के नाम की राजनीति बिहार के वोटरों को एक बार फिर कमल के निशान की ओर मोड़ पाती है या नहीं। ..(प्रकाश कुमार पांडेय)




