बिहार विधानसभा चुनाव: “स्टारडम बनाम जनादेश: यूपी मे जीत…बिहार में असफलता, क्यों नहीं चमक पाई ‘स्टार पॉवर’?
भोजपुरी सिनेमा लंबे समय से पूर्वी भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और अब राजनीतिक जीवन में भी प्रभावी भूमिका निभा रहा है। जहां एक ओर इन सितारों का आभामंडल पर्दे पर दर्शकों को सम्मोहित करता है, वहीं जब ये कलाकार मंच से उतरकर वोट मांगने निकलते हैं, तो जनता उनसे अभिनय नहीं, असल काम की उम्मीद करती है।
बिहार चुनाव 2025 में कौन-सा भोजपुरी सितारा करेगा धमाल?
अभिनय से संसद तक…स्टारडम ने किया राजनीति में प्रवेश
मनोज तिवारी, रवि किशन और निरहुआ जैसे नाम इस फॉर्मूले में सफल हुए हैं, जबकि पवन सिंह, कुणाल सिंह और रानी चटर्जी जैसे कुछ सितारे राजनीतिक परीक्षा में विफल रहे। अब जब बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की आहट सुनाई देने लगी है, तो यह सवाल चर्चा में है: क्या इस बार कोई नया भोजपुरी चेहरा जनादेश जीत पाएगा?
यूपी की जीत, बिहार में असफलता: क्यों नहीं चमक पाई ‘स्टार पॉवर’?
UP में भोजपुरी सिनेमा के सितारों की लोकप्रियता रंग लाई, लेकिन बिहार में उनकी सियासी पकड़ कमजोर ही साबित हुई। मनोज तिवारी, जो पहले गायक और अभिनेता थे। अब भाजपा के सांसद हैं। वे 2014, 2019 और 2024 में दिल्ली की उत्तर-पूर्वी सीट से जीते हैं। इसी तरह, रवि किशन ने कांग्रेस से हार के बाद भाजपा का दामन थामा और गोरखपुर से लगातार दो बार लोकसभा पहुंचे। निरहुआ जिन्होंने आजमगढ़ से चुनाव जीता, यह साबित किया कि जब स्टारडम के साथ संगठन और जमीन पर मेहनत जुड़ती है, तो जीत संभव होती है।
पवन सिंह क स्टारडम…वोटर्स के आगे फेल
भोजपुरी के पॉपुलर स्टार पवन सिंह को 2024 में भाजपा ने टिकट दिया था, लेकिन बाद में उनकी सीट बदली गई। इसके बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और काराकाट से किस्मत आजमाई, लेकिन नतीजा निराशाजनक रहा। उनकी लोकप्रियता उन्हें संसद नहीं पहुंचा सकी।
पवन सिंह पॉपुलर भोजपुरी सितारों में शामिल हैं। वे 2024 के लोकसभा चुनाव में में काराकाट से निर्दलीय उतरे लेकिन हार गए। बिहार के सिनेमा में चर्चित खेसारी लाल यादव, अक्षरा सिंह और रानी चटर्जी जैसे कई नाम चर्चा में तो रहते हैं, लेकिन राजनीति में अब तक वे मतदाता का विश्वास जीतने में असफल ही रहे हैं।
कौन पास, कौन फेल: सितारों की रिपोर्ट कार्ड
पास हुए चेहरे
मनोज तिवारी: सफल रणनीति, पूर्वांचली मतदाताओं से गहरा जुड़ाव।
रवि किशन: पार्टी का मजबूत सपोर्ट, स्पष्ट प्रचार शैली।
दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’: चुनावी जमीनी पकड़ और भाजपा की योजना का लाभ।
फेल रहे चेहरे:
पवन सिंह: स्टारडम के बावजूद चुनावी तैयारी और संगठन का अभाव।
रानी चटर्जी: कांग्रेस में शामिल होने के बाद राजनीतिक निष्क्रियता।
कुणाल सिंह: शुरुआती कोशिशों के बावजूद राजनीतिक समर्थन का अभाव।
अक्षरा सिंह: जनसुराज से जुड़ाव के बाद नई राजनीतिक जमीन की तलाश में, अभी निर्णायक स्थिति नहीं।
कौन उतरेगा बिहार के चुनावी मैदान में?
अब जब बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है, तो राजनीतिक गलियारों में फिर से इन सितारों के नाम गूंजने लगे हैं। खासकर पवन सिंह, जिनका अगला कदम सबकी नजर में है। क्या वे फिर चुनाव लड़ेंगे या राजनीति से अब किनारा करेंगे? खेसारी लाल यादव भी विभिन्न दलों के मंचों पर देखे जाते हैं – क्या वे पहली बार किस्मत आजमाएंगे? अक्षरा सिंह का झुकाव किसी नए राजनीतिक मंच की ओर संकेत देता है। रवि किशन और मनोज तिवारी जैसे नेता अपने प्रभाव से बिहार में पार्टी के लिए प्रचार करेंगे।
स्टार बनाम जन प्रतिनिधि: चुनौती बड़ी है
बिहार की राजनीति जातीय संतुलन, क्षेत्रीय समीकरण और विकास के मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती है। ऐसे में किसी अभिनेता का स्टार होना उन्हें सिर्फ शुरुआती फायदा देता है। वास्तविकता यह है कि पर्दे का हीरो बनने और धरातल का जनप्रतिनिधि बनने में अंतर है। चुनाव में सफलता के लिए जनभावनाओं को समझना, निरंतर संवाद बनाए रखना और सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाना जरूरी है। जनता अब “चेहरे” नहीं, “चरित्र और काम” देखती है। जो स्टार जनता की समस्याओं को सुनता है, वही असली नायक बनता है।भोजपुरी दर्शकों से भावनात्मक जुड़ाव रखने वाले ये कलाकार वोट में कितना बदलते हैं, यह इस बार देखना दिलचस्प होगा।