बिहार विधानसभा चुनाव 2025: रामगढ़ सीट पर फिर बढ़ा सियासी पारा, किसके पक्ष में जाएगा जनादेश?
बिहार में विधानसभा चुनाव 2025 की तैयारियां जोर पकड़ने लगी हैं और कैमूर जिले की रामगढ़ विधानसभा सीट इस बार भी राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में है। यहां का चुनावी इतिहास और जातीय समीकरण हर बार दिलचस्प नतीजे देता रहा है। इस सीट पर आमतौर पर आरजेडी, बीजेपी और बसपा के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिलता है। बसपा भले ही अब तक जीत दर्ज नहीं कर सकी हो, लेकिन वह लगातार समीकरण बिगाड़ने की स्थिति में रहती है। यही वजह है कि इस बार भी रामगढ़ का चुनाव त्रिकोणीय और रोमांचक हो सकता है।
रामगढ़ विधानसभा क्षेत्र: भौगोलिक और सामाजिक परिदृश्य
रामगढ़ विधानसभा क्षेत्र कैमूर जिले का हिस्सा है और वर्ष 1951 में गठित किया गया था। लगभग 169 वर्ग किलोमीटर में फैले इस क्षेत्र में रामगढ़ प्रखंड, नुआंव और दुर्गावती सामुदायिक विकास प्रखंड शामिल हैं।
यहां की भोजपुरी प्रमुख भाषा है, जबकि हिंदी और उर्दू भी व्यापक रूप से बोली जाती है। रामगढ़ पूरी तरह ग्रामीण बहुल इलाका है, जहां खेती-किसानी के साथ स्थानीय कारोबार और उद्योग ही यहां पर लोगों की आजीविका के मुख्य साधन हैं। जातीय समीकरण को देखे तो इस लिहाज से रामगढ़ में पिछड़े वर्ग और दलित मतदाताओं की संख्या काफी प्रभावी है। वहीं सवर्ण और अल्पसंख्यक मतदाता भी परिणाम तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
चुनावी इतिहास: किसने कब जीती यह सीट?
रामगढ़ विधानसभा सीट पर अब तक 19 बार चुनाव हो चुके हैं, जिसमें 2024 का उपचुनाव भी शामिल है।
आरजेडी ने यहां सबसे ज्यादा 6 बार जीत दर्ज की है। कांग्रेस 4 बार विजयी रही है। जनता दल और बीजेपी ने दो-दो बार कब्जा जमाया है। जबकि जनता पार्टी और लोकदल को एक-एक बार जीत मिली है। पिछले कुछ वर्षों में यहां मुकाबला और भी दिलचस्प होता गया है। 2024 के उपचुनाव में बीजेपी के अशोक कुमार सिंह ने बसपा प्रत्याशी सतीश कुमार सिंह यादव को 1362 वोटों से हराकर सीट पर दोबारा कब्जा जमाया। 2020 का चुनाव बेहद करीबी रहा, जहां आरजेडी के सुधाकर सिंह ने बसपा की अंबिका सिंह को मात्र 189 वोटों से मात दी थी। बीजेपी के अशोक कुमार सिंह तीसरे नंबर पर रहे थे और विजेता से महज 2001 वोट पीछे थे।
2015 में बीजेपी ने यह सीट जीती थी, जब अशोक कुमार सिंह ने आरजेडी को 8 हजार से अधिक मतों से हराया। 2010 के चुनाव में आरजेडी से टिकट मिला था और अंबिका सिंह ने जीत दर्ज की थी। 2005 में समाजवादी पार्टी के ददन सिंह ने अप्रत्याशित जीत हासिल की थी। 2000 में बीजेपी और 1995 में जेडीयू ने यहां जीत दर्ज की थी। इन नतीजों से साफ है कि रामगढ़ सीट पर कोई भी पार्टी स्थायी रूप से मजबूत नहीं रही है और यहां का मतदाता अक्सर बदलाव का मूड दिखाता है।
बसपा: किंगमेकर या गेमचेंजर?
रामगढ़ विधानसभा क्षेत्र में बसपा भले ही कभी जीत हासिल नहीं कर सकी, लेकिन उसका मजबूत वोट बैंक है। हाल के चुनावों में बसपा लगातार शीर्ष तीन में रही है और उसका वोट प्रतिशत इतना असरदार है कि वह आरजेडी और बीजेपी दोनों का खेल बिगाड़ सकती है। 2020 और 2024 के चुनावों में बसपा का प्रदर्शन इस बात का सबूत है कि अगर वह कुछ और हजार वोट हासिल कर लेती, तो परिणाम पूरी तरह से अलग हो सकता था। यही वजह है कि इस बार भी बसपा को यहां “किंगमेकर” की भूमिका में देखा जा रहा है।
2025 का चुनाव: किसके पक्ष में माहौल?
रामगढ़ में इस बार भी मुकाबला त्रिकोणीय रहने की संभावना है। बीजेपी को यहां पर सत्ता विरोधी लहर से जूझना पड़ सकता है, लेकिन अशोक कुमार सिंह की स्थानीय पकड़ पार्टी को मजबूती देती है। आरजेडी इस सीट पर परंपरागत रूप से मजबूत मानी जाती है और सुधाकर सिंह के नेतृत्व में फिर से वापसी की कोशिश करेगी। वहीं बसपा यहां के पिछड़े और दलित वोटरों के बीच अपनी पकड़ और मजबूत करने की रणनीति में लगी है। राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि बसपा ने वोट प्रतिशत में मामूली भी इजाफा कर लिया, तो इस बार परिणाम अप्रत्याशित हो सकते हैं। दूसरी ओर, आरजेडी और बीजेपी दोनों ही पूरी ताकत झोंककर बसपा के प्रभाव को सीमित करने की कोशिश में हैं।
रामगढ़ विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास यह दर्शाता है कि यहां का मतदाता हमेशा बदलाव के मूड में रहा है। कभी आरजेडी, कभी बीजेपी और कभी अन्य दलों को मौका देकर जनता ने साफ कर दिया है कि यहां किसी एक पार्टी का वर्चस्व स्थायी नहीं हो सकता। 2025 के चुनाव में एक बार फिर यह सीट राजनीतिक हॉटस्पॉट बनने जा रही है, जहां नतीजे पूरे बिहार के चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकते हैं। बसपा भले ही अब तक विजयी न रही हो, लेकिन इस बार भी उसके वोटर तय करेंगे कि बाजी आरजेडी मारेगी या बीजेपी। कुल मिलाकर, रामगढ़ का रण इस बार भी रोमांच से भरपूर रहेगा और यहां का हर वोट नतीजे को बदलने की क्षमता रखता है। (प्रकाश कुमार पांडेय)