बिहार विधानसभा चुनाव 2025:70 प्लस फॉर्मूला लागू हुआ तो बीजेपी-जेडीयू के 9 सीनियर विधायकों की टिकट पर लग सकता है ग्रहण
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में सत्ताधारी एनडीए गठबंधन — जिसमें भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) प्रमुख घटक दल हैं — ने जहां अब तक सीट शेयरिंग का अंतिम फॉर्मूला तय नहीं किया है। वहीं एक महत्वपूर्ण नीति की तैयारी ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। यह नीति है। “70 प्लस फॉर्मूला”, यानी उम्र के आधार पर टिकट बंटवारे का चयन। बीजेपी और जेडीयू दोनों इस बार चुनावी मैदान में युवा चेहरों को प्राथमिकता देने की रणनीति पर काम कर रही हैं। यदि 70 वर्ष से अधिक उम्र वाले विधायकों को टिकट नहीं देने की नीति लागू होती है, तो दोनों दलों के कई वरिष्ठ और अनुभवी नेता 2025 के विधानसभा चुनाव में मैदान से बाहर हो सकते हैं।
उम्र का ‘कटऑफ’ और बदलती रणनीति
बीजेपी पहले से ही “70 वर्ष से ऊपर नहीं” की अघोषित नीति पर काम करती रही है। इस नीति के अंतर्गत कई बार उम्रदराज नेताओं का टिकट काटकर युवा और नए चेहरों को मौका दिया गया है। 2024 के लोकसभा चुनाव के अलावा दिल्ली, हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी यह रणनीति अपनाई गई और काफी हद तक सफल भी रही। अब जेडीयू भी इसी नीति को अपनाने की तैयारी में दिख रही है। नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जेडीयू इस बार टिकट बंटवारे में उम्र, सक्रियता, जनसंपर्क और कार्यकर्ता आधार जैसे मानकों को तरजीह दे सकती है। यदि दोनों पार्टियां “70 प्लस” फॉर्मूले पर सहमत होती हैं तो एनडीए के नौ मौजूदा विधायक चुनावी दौड़ से बाहर हो सकते हैं।
70 प्लस क्लब: कौन हैं संभावित ‘आउट’?
जेडीयू के 6 विधायक
बिजेंद्र प्रसाद यादव (सुपौल) – वर्तमान विधानसभा के सबसे वरिष्ठ विधायक हैं। इनकी उम्र 80 वर्ष के पार है।
ललित नारायण मंडल (सुल्तानगंज) – 75 वर्ष के हो रहे हैं।
मदन सहनी (बहादुरपुर) – करीब 73 साल के हैं।
मनोज यादव (बेलहर) – 70 वर्ष की उम्र में पहुंच चुके हैं।
जितेंद्र कुमार राय (परिहार) – 70 वर्ष के हो चुके हैं।
अच्मित ऋषिदेव (रानीगंज) – जल्द ही 70 की दहलीज पार करेंगे।
बीजेपी के 3 विधायक
अरुण कुमार सिन्हा (कुम्हरार) – 74 वर्ष के हो रहे हैं।
नंदकिशोर यादव (पटना साहिब) – 73 वर्ष की उम्र में हैं और वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष भी हैं।
राम नारायण मंडल (बाकां) की उम्र 72 साल के करीब बताई जा रही है।
इन सभी नेताओं ने लंबे राजनीतिक जीवन में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया है। हालांकि उम्र के कारण अब इनकी जगह नए चेहरों को मौका देने की बात पर दोनों दल गंभीरता से विचार कर रहे हैं।
जीतन राम मांझी की स्थिति
पूर्व मुख्यमंत्री और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के नेता जीतन राम मांझी भी इस लिस्ट में आते, लेकिन वे पहले ही विधानसभा से इस्तीफा देकर 2024 में लोकसभा सांसद बन चुके हैं। 2020 में उन्होंने 74 साल की उम्र में इमामगंज सीट से जीत दर्ज की थी। उनके मामले में “70 प्लस” नीति अप्रासंगिक हो गई है, लेकिन उनका उदाहरण भी इस नीति की गंभीरता को दर्शाता है।
बीजेपी-जेडीयू की अंदरूनी प्लानिंग
सूत्रों के अनुसार, बीजेपी और जेडीयू दोनों ने सीटवाइज सर्वे शुरू कर दिया है। सर्वे में न सिर्फ जनाधार देखा जा रहा है, बल्कि विधायकों की सक्रियता, जनसंपर्क और जनता से जुड़ाव भी मापा जा रहा है। इसके साथ ही उम्र को भी एक निर्णायक फैक्टर बनाया जा सकता है।
बीजेपी अपने बुजुर्ग विधायकों को मार्गदर्शक मंडल या संगठनात्मक भूमिकाओं में समायोजित कर सकती है। उधर जेडीयू के लिए ललित नारायण मंडल और बिजेंद्र यादव जैसे वरिष्ठ विधायकों का टिकट काटना आसान नहीं होगा। हालांकि पार्टी के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि यदि यह नीति सर्वसम्मति से तय होती है तो इस तरह के’कठोर’ फैसले से भी पीछे नहीं हटा जाएगा।
क्या सिर्फ उम्र तय करेगी टिकट?
हालांकि उम्र सीमा एक महत्त्वपूर्ण कारक हो सकता है, लेकिन सूत्र बताते हैं कि “एक्सेप्शनल केस” भी हो सकते हैं। जैसे यदि किसी 70+ नेता की लोकप्रियता और जीत की गारंटी पक्की है तो उन्हें टिकट मिल सकता है। लेकिन ऐसे अपवाद सीमित ही होंगे।
बीजेपी-जेडीयू दोनों दल इस बार अपने जनाधार को मज़बूत करने के लिए युवा उम्मीदवारों को आगे बढ़ाना चाहते हैं। खासकर तब जब विपक्ष — RJD, कांग्रेस और लेफ्ट — लगातार “नई पीढ़ी बनाम पुरानी व्यवस्था” का नैरेटिव गढ़ने में जुटे हैं।
असर: राजनीति में पीढ़ी परिवर्तन
“70 प्लस फॉर्मूला” का सबसे बड़ा प्रभाव होगा राजनीति में पीढ़ी परिवर्तन (generation shift)। यह नीति सिर्फ सियासी चेहरों को बदलने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि राजनीतिक कार्यशैली और दृष्टिकोण में भी बदलाव लाएगी। युवा नेताओं के आने से टेक्नोलॉजी, सोशल मीडिया और ज़मीनी अभियान को लेकर ज्यादा आक्रामक रणनीति अपनाई जा सकेगी। इसके अलावा, यह कदम दलों के लिए anti-incumbency से भी निपटने का अवसर देगा। उम्रदराज और लंबे समय से चुने जा रहे विधायकों की जगह नए चेहरे लाकर बदलाव का संदेश जनता तक पहुंचाया जा सकेगा।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में एनडीए की रणनीति “परंपरा + परिवर्तन” के मॉडल पर आधारित दिखाई दे रही है। जहां एक ओर नीतीश कुमार जैसे अनुभवी चेहरे गठबंधन की स्थिरता और साख बनाए रखते हैं, वहीं दूसरी ओर 70 प्लस फॉर्मूले जैसी नीतियों से यह स्पष्ट होता है कि सत्ता की चाबी युवा नेताओं के हाथों में सौंपने की तैयारी चल रही है। ऐसे में अब देखना यह होगा कि बीजेपी और जेडीयू इस नीति को कितनी सख्ती से लागू करती हैं और किन चेहरों को टिकिट से वंचित कर नया नेतृत्व सामने लाती हैं। लेकिन इतना तय है कि इस बार बिहार की सियासत में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। …प्रकाश कुमार पांडेय