बिहार विधानसभा चुनाव 2025:लोकतंत्र के साथ यहां जन्मा था अपराध…इन बाहुबलियों बनाया था अपराध को सत्ता का हथियार

Bihar Assembly Elections 2025 Crime was born here along with democracy

बिहार विधानसभा चुनाव 2025:लोकतंत्र के साथ यहां जन्मा था अपराध…इन बाहुबलियों बनाया था अपराध को सत्ता का हथियार

“बिहार की मिट्टी में खून की गंध है। हवा में सत्ता की साज़िश, और गलियों में बंदूक की गूंज… ये कहानी है उस बिहार की, जहां आज़ादी के बाद लोकतंत्र के साथ-साथ अपराध भी जन्मा — और वक्त के साथ बाहुबलियों ने उसे सत्ता का हथियार बना लिया।”

1947-1950: आज़ादी के बाद अपराध का बीज

आज़ादी के बाद बिहार का सामाजिक ताना-बाना जातीय असमानता, गरीबी और जमींदारी पर टिका था। यही असमानता अपराध की जड़ बनी। बेगूसराय, भोजपुर और मुजफ्फरपुर जैसे जिलों में भूमिहार और राजपूत गैंग्स ने जमींदारी बचाने के लिए अपने “गुंडों” की फौज तैयार की। इसी दौर में कामदेव सिंह नाम का युवक उभरा, जो आगे चलकर बिहार का पहला माफिया डॉन कहलाया।

1950-1960: बिहार का पहला माफिया — कामदेव सिंह

कामदेव सिंह, भूमिहार समाज से, लेकिन सोच में ‘राजा’ बन चुका था। 1957 के विधानसभा चुनाव में उसने 34 बूथ कैप्चर कराए — ताकि उसके राजनीतिक आकाओं की जीत सुनिश्चित हो सके। लोग उसे “सम्राट” और “रॉबिनहुड” दोनों कहते थे — गरीबों की मदद करता था, पर किसी की जुबान खुलने पर उसी हाथ से गोली भी चल जाती थी। उसने नेपाल से कलकत्ता तक स्मगलिंग नेटवर्क बनाया और पुलिस को जेब में रखा। कामदेव ने बिहार को यह सिखाया — “जो बंदूक पकड़ेगा, वही राजनीति करेगा।”

1960-1970: अपराध और राजनीति का गठजोड़

60 के दशक में कामदेव सिंह का वर्चस्व चरम पर था। उसने “एंटी-कम्युनिस्ट” अभियान के नाम पर कम्युनिस्ट नेताओं को ठिकाने लगाया। उसकी फंडिंग चुनावों में जाती, और बदले में उसे पुलिस-प्रशासन का संरक्षण मिलता। बिहार की सत्ता अपराधियों की बैरक बन चुकी थी। इसी दौर में जातीय संघर्ष ने गैंगवार का रूप लिया — भूमिहार बनाम यादव, राजपूत बनाम कोइरी। राजनीति और अपराध का यह गठबंधन आने वाले 50 साल की दिशा तय कर गया।

1970-1980: ‘बिहार का पाब्लो एस्कोबार’ और पतन की शुरुआत

कामदेव सिंह का आतंक गंगा किनारे तक फैला, पर 1980 में उसकी मौत हुई । पुलिस एनकाउंटर में गोली लगने से। उसकी मौत ने सत्ता में एक “क्राइम वैक्यूम” पैदा किया। यही शून्य भरने के लिए नए नाम आए सूरजभान सिंह (मोकामा), छोटन-मुन्ना शुक्ला (मुजफ्फरपुर), आनंद मोहन (सहरसा), और आगे चलकर शहाबुद्दीन (सिवान)। 1980 तक बिहार पूरी तरह “गन कल्चर” के कब्जे में था।

1980-1990: जंगलराज की जड़ें

लालू यादव के उदय के साथ अपराधियों को राजनीतिक वैधता मिली। शहाबुद्दीन ने सिवान में अपहरण और हत्या का उद्योग खड़ा किया। छोटन शुक्ला भूमिहारों के हीरो बन गए — पर 1994 में उनकी हत्या ने जातीय हिंसा को हवा दी। आनंद मोहन ने “बिहार पीपुल्स पार्टी” बनाई, और अपराध को वैचारिक जामा पहनाया। पप्पू यादव ने मधेपुरा में बंदूक से वोट मांगा। यह दशक बिहार के लिए सबसे खूनी साबित हुआ। कुल 32,000 से ज्यादा किडनैपिंग केस, जिनमें ज्यादातर राजनेताओं के संरक्षण में हुए।

1990-1995: सिवान का सुल्तान – शहाबुद्दीन

1990 के बाद सिवान में “एक व्यक्ति, एक कानून” का राज था — शहाबुद्दीन का। वो लालू प्रसाद यादव का करीबी था। सिवान की गलियों में ‘शहाबु भाई’ का नाम सुनते ही लोग दरवाजे बंद कर लेते थे। छोटन शुक्ला की हत्या ने मुन्ना शुक्ला को बदले की आग में झोंका, और 1998 में मंत्री बृज बिहारी प्रसाद मारे गए। इस दशक में पुलिस मूकदर्शक थी — क्योंकि हुक्म सत्ता से आता था।

1995-2000: DM मर्डर और अपराध का चरम

1994 में छोटन शुक्ला की हत्या के बाद उसके समर्थकों ने गोपालगंज के DM जी. कृष्णैया की हत्या कर दी। इस भीड़ को आनंद मोहन ने भड़काया था। बिहार का प्रशासन ठप हो गया था। अनंत सिंह, पप्पू यादव और सूरजभान सिंह — सभी अपराधी राजनीति में कदम रख चुके थे। 2000 तक “जंगलराज” शब्द बिहार की पहचान बन चुका था।

2000-2005: अपराधियों का लोकतंत्र

2000 के दशक की शुरुआत में बाहुबलियों ने विधानसभा को भी अपनी गन से जीता।
शहाबुद्दीन का तेजाब कांड (2004) बिहार के इतिहास का सबसे क्रूर मामला था। पप्पू यादव ने सीपीएम विधायक अजित सरकार की हत्या के आरोप झेले। अनंत सिंह मोकामा से विधायक बने,बबलू श्रीवास्तव किडनैपिंग के नेटवर्क के जरिए “नॉर्थ इंडिया का डॉन” बन गया। यह वह दौर था जब अपराध ने सिस्टम को हरा दिया था।

2005-2010: नितीश कुमार और ‘सुशासन’ की वापसी

2005 में सत्ता बदली — नितीश कुमार आए, और उनके साथ “कानून का राज” लौटा। शहाबुद्दीन, मुन्ना शुक्ला, आनंद मोहन, सूरजभान सिंह, पप्पू यादव — सभी जेल पहुंचे। बबलू श्रीवास्तव को आजीवन कारावास मिला। अपराध दर गिरी, लेकिन राजनीति में बाहुबलियों की जड़ें बचीं रहीं। अब अपराध ने नया चेहरा ले लिया — “रेत माफिया”, “भूमि घोटाला”, “ठेकेदारी गैंग्स”।

2010-2015: बाहुबलियों का पुनरुत्थान और साइबर अपराध का दौर

अनंत सिंह और पप्पू यादव ने दोबारा चुनाव जीते। शहाबुद्दीन जेल से बाहर आया, फिर जमानत रद्द हुई। बबलू श्रीवास्तव जेल से अपना गैंग चला रहा था। इसी दौर में बिहार में साइबर क्राइम और “कॉरपोरेट अपराध” की एंट्री हुई। गांवों की गोलीबारी अब स्मार्टफोन और सर्वर फार्म से बदलने लगी थी।

2015-2020: बाहुबलियों की विरासत

2015 में अनंत सिंह ने निर्दलीय जीत दर्ज की सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी लोकसभा पहुंचीं। 2021 में शहाबुद्दीन की मौत हुई — पर उसकी विरासत सिवान की गलियों में जिंदा है। राजनीति में अपराध अब खुलकर नहीं, पर ‘संरचना’ में मौजूद है। सत्ता ने “क्लीन इमेज” का चोला पहना, पर धब्बे मिटे नहीं।

2020-2025: अपराध का नया रूप — सत्ता के नए खिलाड़ी

2020 के बाद अपराध ने रूप बदला। अब गोली नहीं, सर्वर, रेत, और लिकर माफिया खेल तय कर रहे हैं। अनंत सिंह 2022 में सजा पाए, फिर 2024 में बरी हुए। आनंद मोहन 2023 में जेल से रिहा हुए — सरकार की नीति बदली थी। पप्पू यादव 2024 में फिर सांसद बने। 2025 के विधानसभा चुनाव में बाहुबलियों की पत्नियां, भाई और बेटे फिर से मैदान में हैं। अर्थात् अपराध की “राजनीतिक जड़ें” अभी भी हरी हैं।

जाति से साइबर क्राइम तक — अपराध का विकासक्रम

दशक अपराध का रूप प्रमुख चेहरे
1947-1980 जातीय वर्चस्व, डकैती, बूथ कैप्चरिंग कामदेव सिंह
1980-2000 अपहरण, हत्या, राजनीतिक संरक्षण शहाबुद्दीन, आनंद मोहन, पप्पू यादव
2000-2010 रंगदारी, ठेकेदारी, तेजाब कांड अनंत सिंह, सूरजभान
2010-2025 सैंड, शराब, साइबर अपराध नई पीढ़ी के बाहुबली

राजनीति में अपराध का नेक्सस

बिहार में अपराध और सत्ता का रिश्ता कभी टूटा नहीं। लालू प्रसाद यादव के दौर में अपराधियों को सत्ता मिली, और नीतीश कुमार के दौर में अपराधी “सत्ता के भीतर” समा गए। आज भी चुनावों में टिकट पाने वालों में अपराधी पृष्ठभूमि वाले नेता शामिल हैं। यही नेक्सस बिहार की सबसे बड़ी चुनौती है।

विरासत और सबक

“कभी कामदेव सिंह का आतंक था, फिर शहाबुद्दीन का साया, अब साइबर डॉन का जमाना है… बिहार बदला जरूर है, लेकिन ‘क्राइम कatha’ की कहानी अभी बाकी भोपाल एमपी नगर से भोपाल आरटीओ कार्यालय कोकता। (प्रकाश कुमार पांडेय )

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