बिहार विधानसभा चुनाव 2025: जातीय समीकरण बना टिकट बंटवारे का आधार RJD में 51 यादव, BJP में 21 राजपूत; हर पार्टी ने साधा सामाजिक संतुलन

Bihar Assembly Elections 2025 Caste equations form the basis of ticket distribution

बिहार विधानसभा चुनाव 2025: जातीय समीकरण बना टिकट बंटवारे का आधार

RJD में 51 यादव, BJP में 21 राजपूत; हर पार्टी ने साधा सामाजिक संतुलन

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए टिकटों का बंटवारा अब पूरी तरह फाइनल हो गया है। 243 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा के साथ ही यह स्पष्ट हो गया है कि इस बार भी जातीय समीकरण ही प्रत्याशियों के चयन का सबसे बड़ा आधार बना है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD), भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जनता दल यूनाइटेड (JDU) — तीनों प्रमुख दलों ने उम्मीदवार तय करते समय अपने-अपने सामाजिक आधार और वोट बैंक को साधने पर पूरा ध्यान दिया है।

RJD की MY सोशल इंजीनियरिंग

राष्ट्रीय जनता दल ने इस बार 143 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। तेजस्वी यादव ने लोकसभा चुनाव के दौरान अपनाए गए “MY” यानी मुस्लिम-यादव समीकरण को विधानसभा चुनाव में भी जारी रखा है। आरजेडी के 143 उम्मीदवारों में से 51 यादव जाति और 19 मुस्लिम समुदाय से हैं। यानी कुल मिलाकर पार्टी के लगभग 50 प्रतिशत टिकट अपने पारंपरिक MY आधार को मजबूत करने के लिए दिए गए हैं।
इसके अलावा आरजेडी ने सामान्य वर्ग से 14 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। एनडीए के वोट बैंक में सेंधमारी के लिए तेजस्वी यादव ने कुशवाहा जाति से आने वाले 11 उम्मीदवारों को टिकट दिया है। यह वही प्रयोग है, जिसने तेजस्वी को लोकसभा चुनाव में फायदा पहुंचाया था। राजद ने अति पिछड़ा वर्ग और दलित समाज के प्रत्याशियों को भी प्रतिनिधित्व दिया है, ताकि सामाजिक संतुलन बना रहे और “A to Z” के दावे को कुछ हद तक बनाए रखा जा सके।

JDU का पिछड़ा–अति पिछड़ा मॉडल

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने अपने पारंपरिक सामाजिक आधार पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग पर भरोसा जताया है। जेडीयू ने कुल 101 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं, जिनमें से 37 पिछड़ा वर्ग और 22 अति पिछड़ा वर्ग से हैं।
कुशवाहा जाति के 13 और कुर्मी जाति के 12 उम्मीदवार जेडीयू के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। इसके अलावा 8 यादव और 8 धानुक जाति के उम्मीदवारों को भी मौका दिया गया है। सामान्य वर्ग से जेडीयू ने 22 प्रत्याशी उतारे हैं — इनमें 9 भूमिहार, 10 राजपूत, 1 ब्राह्मण और 1 कायस्थ उम्मीदवार शामिल हैं।

नीतीश कुमार ने मुस्लिम समुदाय से भी 4 उम्मीदवारों को टिकट दिया है। दलित समाज को भी जेडीयू ने पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया है — मुसहर और मांझी समाज से 5-5 उम्मीदवार और रविदास समाज से भी 5 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। जेडीयू की उम्मीदवार सूची में 13 महिलाएं भी शामिल हैं, जो सामाजिक और लैंगिक संतुलन की दिशा में पार्टी की रणनीति को दर्शाती हैं।

BJP का सामाजिक संतुलन: सवर्णों पर भरोसा, पिछड़ों पर ध्यान

भाजपा ने भी अपने 101 उम्मीदवारों की सूची में सभी वर्गों को सामाजिक संतुलन के अनुरूप प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की है। भाजपा की लिस्ट में सबसे बड़ी संख्या सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों की है — कुल 49 प्रत्याशी इस वर्ग से हैं। इनमें 21 राजपूत, 16 भूमिहार, 11 ब्राह्मण, और 1 कायस्थ उम्मीदवार शामिल हैं।

भाजपा ने पिछड़ा वर्ग से 24 उम्मीदवारों को टिकट दिया है — इनमें 6 यादव, 5 कुशवाहा, 2 कुर्मी, 4 बनिया, 3 कलवार, 3 सूढ़ी, 1 मारवाड़ी और 1 चनऊ जाति के उम्मीदवार हैं। अति पिछड़ा वर्ग से भी बीजेपी ने 16 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं — इनमें निषाद, तेली, केवट, बिंद, धानुक, कानू, नोनिया, चौरसिया, डांगी और चंद्रवंशी जैसी जातियों का प्रतिनिधित्व है।

अनुसूचित जाति वर्ग से भाजपा ने 11 उम्मीदवार उतारे हैं — इनमें 7 पासवान, 3 रविदास, और 1 मुसहर जाति के प्रत्याशी हैं। अनुसूचित जनजाति से भी 1 उम्मीदवार को टिकट दिया गया है। पार्टी ने इस बार सवर्ण वर्ग को मजबूत बनाए रखते हुए, पिछड़ों और अति पिछड़ों में भी अपनी पकड़ बढ़ाने की कोशिश की है।

अन्य दलों का समीकरण

महागठबंधन के अन्य घटक दल — कांग्रेस, लेफ्ट पार्टियां और वीआईपी — ने भी टिकट बंटवारे में जातीय संतुलन को अहम माना है। कांग्रेस ने पारंपरिक सवर्ण और मुस्लिम उम्मीदवारों को तरजीह दी है, जबकि लेफ्ट दलों ने दलित, पिछड़े और गरीब वर्गों पर ध्यान केंद्रित किया है। दूसरी ओर एनडीए खेमे में शामिल चिराग पासवान (LJP-R), उपेंद्र कुशवाहा (RLSP) और जीतन राम मांझी (HAM) ने अपने-अपने सामाजिक आधार के अनुरूप प्रत्याशियों का चयन किया है। पासवान ने दलितों में, मांझी ने अति पिछड़ों में और कुशवाहा ने अपने समुदाय में पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है।

जातीय समीकरण से ही तय होगी जीत की दिशा

इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारों की सूची से यह साफ झलक रहा है कि राजनीतिक दलों ने “विकास” से ज्यादा “वोट बैंक” पर फोकस किया है। हर पार्टी ने अपने परंपरागत समर्थन समूहों को साधने के साथ-साथ विरोधी खेमे में सेंधमारी की रणनीति अपनाई है। अब सवाल यही है कि इस जातीय-सामाजिक गणित का लाभ किसे मिलेगा। 14 नवंबर को जब नतीजे सामने आएंगे, तभी यह तय होगा कि आरजेडी का MY कार्ड, जेडीयू का अति पिछड़ा समीकरण, या बीजेपी का सामाजिक संतुलन मॉडल — इनमें से कौन-सा दांव बिहार की सत्ता तक पहुंचाएगा। फिलहाल चुनावी मैदान में हर दल यही कोशिश कर रहा है कि जातीय जुड़ाव को वोट में तब्दील कर अपनी जीत सुनिश्चित की जाए। प्रकाश कुमार पांडेय

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