बिहार विधानसभा चुनाव 2025: राज्य वो 11 सीटें जहां होगा असली चुनावी मुकाबला, 1000 से कम वोटों से हार जीत का फैसला…एक सीट पर 12 वोट से हुर्ह थी हार—जीत

Bihar Assembly Elections 2025 11 Assembly seats real electoral contest

बिहार विधानसभा चुनाव 2025: राज्य वो 11 सीटें जहां होगा असली चुनावी मुकाबला, 1000 से कम वोटों से हार जीत का फैसला…एक सीट पर 12 वोट से हुर्ह थी हार—जीत

ये हैं वो 11 सीटें जो पलट सकतीं बिहार की सत्ता!
पिछले चुनाव में महज 1000 वोटों ने तय की थी जीत”

बिहार में विधानसभा चुनाव की रणभेरी कभी भी बज सकती है। ऐसे में राज्य का सियासी पारा तेजी से चढ़ रहा है। नीतीश कुमार के नेतृत्व वाला एनडीए और लालू यादव-तेजस्वी यादव की जोड़ी वाला महागठबंधन इंडिया ब्लॉक इस बार मुकाबले में आमने-सामने हैं। 243 सीटों वाले इस राज्य में कुछ ऐसी विधानसभा सीटें हैं जो चुनावी गणित बदल सकती हैं। 2020 के चुनाव में 11 सीटें ऐसी थीं, जहां जीत का अंतर मात्र 1000 वोटों से भी कम था। अब 2025 में इन्हीं सीटों पर असली मुकाबला देखने को मिलेगा।

बेहद करीबी रहा था मुकाबला

2020 के विधानसभा चुनाव में बिहार में कई सीटों पर कांटे की टक्कर देखने को मिली थी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन सीटों पर मामूली वोट स्विंग से भी सत्ता का गणित उलट सकता है। नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने हिलसा, बारबीघा, भोरे और परबत्ता जैसी सीटों पर बेहद कम अंतर से जीत हासिल की थी, जबकि आरजेडी ने रामगढ़, डेहरी और कुढ़नी में करीबी जीत दर्ज की थी। एलजेपी ने सिर्फ मटिहानी सीट जीती थी—वह भी 333 वोटों के अंतर से।

हिलसा में मात्र 12 वोटों का अंतर

हिलसा सीट 2020 में सबसे रोमांचक रही। जेडीयू उम्मीदवार प्रेम मुखिया उर्फ कृष्णमुरारी शरण ने आरजेडी के अत्रि मुनि को केवल 12 वोटों से हराया था। यहां 19 उम्मीदवार मैदान में थे। 2015 में यही अत्रि मुनि 25 हजार वोटों से जीते थे। इस बार यह सीट एनडीए और महागठबंधन दोनों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुकी है।

बरबीघा में हुआ वोट-टू-वोट संग्राम

बरबीघा विधानसभा सीट पर जेडीयू के सुदर्शन कुमार ने कांग्रेस के गजानंद शाही को केवल 113 वोटों से हराया था। सुदर्शन कुमार को 39,878 वोट मिले, जबकि गजानंद शाही को 39,765 वोट। यहां मुकाबला इस बार भी त्रिकोणीय हो सकता है, क्योंकि कांग्रेस, जेडीयू और बीजेपी सभी की नजर इस सीट पर है।

रामगढ़ और मटिहानी में भी कड़ा संघर्ष

रामगढ़ में आरजेडी के सुधाकर सिंह ने बसपा के अंबिका यादव को 189 वोटों से हराया था। वहीं मटिहानी सीट पर एलजेपी के राज कुमार सिंह ने जेडीयू के नरेंद्र कुमार सिंह उर्फ बोगो सिंह को मात्र 333 वोटों से मात दी थी। यह सीट इस बार पासवान परिवार की साख से भी जुड़ी होगी, क्योंकि चिराग पासवान खुद यहां प्रचार का केंद्र बना सकते हैं।

भोरे, डेहरी और बछवारा में सांस रोक देने वाला नतीजा

भोरे सीट पर जेडीयू के सुनील कुमार ने सीपीआई (एमएल) के जितेंद्र पासवान को 462 वोटों से हराया था। डेहरी सीट से आरजेडी के फतेह बहादुर सिंह ने बीजेपी के सत्यनारायण यादव को 464 वोटों से शिकस्त दी थी। बछवारा में बीजेपी के सुरेंद्र मेहता ने सीपीआई उम्मीदवार को 484 वोटों से हराया था। इन तीनों सीटों पर इस बार युवा मतदाता और महिला वोटर बड़ा रोल निभाने वाले हैं।

चकाई, बखरी और कुढ़नी पर नजरें टिकीं

राज्य की चकाई सीट पर निर्दलीय सुमित कुमार सिंह ने आरजेडी की सावित्री देवी को 581 वोटों से हराया था। बखरी सीट पर सीपीआई के सूर्यकांत पासवान ने बीजेपी के राम शंकर पासवान को 777 वोटों से मात दी थी। वहीं कुढ़नी में आरजेडी के केदार गुप्ता ने बीजेपी के केदार प्रसाद गुप्ता को 712 वोटों से हराया था। यहां इस बार जातीय समीकरण और गठबंधन रणनीति निर्णायक होगी।

परबत्ता बनेगी ‘किंगमेकर सीट’

परबत्ता सीट पर जेडीयू के डॉ. संजीव कुमार ने आरजेडी के दिगंबर प्रसाद तिवारी को 951 वोटों से हराया था। यह सीट इस बार भी बेहद चर्चित है, क्योंकि यहां कोसी क्षेत्र का प्रभाव सीधा चुनावी गणित पर पड़ता है। स्थानीय विकास, रोजगार और बाढ़ राहत जैसे मुद्दे यहां निर्णायक रहेंगे।

बिहार का ‘गोल्डन जोन’ तय करेगा सत्ता का समीकरण

इन 11 सीटों का कुल वोट अंतर मिलाकर भी 6,000 से कम है। इसका मतलब है कि यदि किसी गठबंधन को इन सीटों में बढ़त मिल जाए तो वह आसानी से बहुमत के करीब पहुंच सकता है।
राजनीतिक दल अब इन क्षेत्रों में बूथ-स्तर पर रणनीति बना रहे हैं। जेडीयू और बीजेपी जहां विकास और शासन की स्थिरता पर जोर देंगी, वहीं आरजेडी और कांग्रेस बेरोजगारी व महंगाई के मुद्दे उठाने की तैयारी में हैं।

2025 में फिर दिखेगा ‘मतों का जादू’

बिहार के चुनाव हमेशा अप्रत्याशित रहे हैं—कभी जाति समीकरण, तो कभी गठबंधन की चाल सत्ता बदल देती है। इन 11 सीटों पर आने वाला मुकाबला सिर्फ उम्मीदवारों का नहीं, बल्कि दो विचारधाराओं का होगा—“विकास बनाम बदलाव”। अब देखना होगा कि 2025 में बिहार की जनता किसे मौका देती है और कौन बनता है राज्य की राजनीति का नया “किंगमेकर”!

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