Bihar Assembly Election 2025, बिहार की राजनीति में मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण को राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का स्थायी वोट बैंक माना जाता है। यह समीकरण दशकों से पार्टी की रीढ़ बना हुआ है। लेकिन 2025 की चुनावी तैयारियों के बीच अब दलित और महादलित मतदाता सियासी गणित के केंद्र में आ गए हैं। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने इस वर्ग को अपने पक्ष में लामबंद करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। इसके लिए बिहार की सामाजिक संरचना, पिछले चुनावों का डेटा और मौजूदा राजनीतिक रणनीति को एक साथ देखने की जरूरत है।
बिहार में चुनावी आंकड़े
- बिहार में साल के अंत में होंगे विधानसभा चुनाव
- 2020 में एनडीए और महागठबंधन को ही एक समान वोट मिले थे
- एनडीए ने 37.9 फीसदी वोट शेयर के साथ 125 सीटें जीती थीं
- महागठबंधन को भी एनडीए के ही बराबर 37.9 फीसदी वोट मिले थे
- चिराग की पार्टी ने 137 सीटों पर अकेले लड़ा था चुनाव,5.8 फीसदी वोट मिले थे
- सूबे की 243 में से 38 विधानसभा सीटें दलितों के लिए आरक्षित
- आरक्षित सीटों में से 21 सीटों पर एनडीए
- आरक्षित सीटों में 17 पर आरजेडी की अगुवाई वाले विपक्षी महागठबंधन को जीत मिली थी
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि दलित-महादलित वोट बैंक, जो कुल मिलाकर बिहार की लगभग 20-22% आबादी है, अगर संगठित हो जाए तो किसी भी चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। इसी वर्ग को अपने साथ बनाए रखने के लिए नीतीश कुमार, चिराग पासवान और जीतनराम मांझी जैसे नेता सक्रिय हो गए हैं। खासकर चिराग पासवान की पार्टी LJP (रामविलास) और मांझी की HAM (सेक्युलर) का असर इस वोट बैंक में सीधा है।
पिछले विधानसभा चुनाव (2020) में NDA और महागठबंधन दोनों को समान 37.9% वोट शेयर मिला था, लेकिन सीटों में NDA को बढ़त मिली थी। इसमें दलित-महादलित सीटों की भूमिका अहम थी। 38 आरक्षित सीटों में से NDA को 21 और महागठबंधन को 17 सीटें मिली थीं। यही वजह है कि दोनों खेमों का फोकस इस बार दलित-महादलितों को लेकर बेहद स्पष्ट है।
RJD भी अब केवल M-Y तक सीमित नहीं रहना चाहती। तेजस्वी यादव ‘BAAP समीकरण’ – Backward, Agda, Aadhi Aabadi, Poor – का नारा देकर नए सामाजिक गठजोड़ की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस ने भी दलित चेहरा राजेश राम को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर संकेत दिया है कि वह इस वर्ग पर अपना दावा मजबूत करना चाहती है।
वहीं NDA अपने दलित-महादलित गठजोड़ को बचाए रखने के लिए योजनाओं और भावनात्मक अपील का सहारा ले रहा है। भूमिहीनों को पट्टा देना, आंबेडकर का सम्मान, दलित छात्रों के लिए छात्रवृत्ति जैसी घोषणाएं इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। चिराग पासवान को NDA के साथ बनाए रखना भी इस रणनीति की अहम कड़ी है।
हालांकि, चुनौतियां दोनों तरफ हैं। अगर RJD छोटे दलों को साथ जोड़कर 3-4% नया वोट बैंक खींचने में सफल होती है, तो उसका आधार M-Y से आगे बढ़ सकता है। दूसरी ओर, अगर चिराग या मांझी जैसे नेता नाराज होते हैं, तो NDA के दलित कार्ड में सेंध लग सकती है।
NDA दलित-महादलित कार्ड से M-Y समीकरण को तोड़ने की मजबूत कोशिश कर रहा है, लेकिन यह तभी संभव है जब उसका गठबंधन अंदरूनी रूप से एकजुट रहे और जमीन पर विकास की नीतियाँ प्रभावी दिखें। इस वर्ग का झुकाव जिस भी तरफ हुआ, बिहार की सत्ता की चाबी उसी के हाथ में होगी। ..(प्रकाश कुमार पांडेय)