भारत के संविधान का सबसे बड़ा संशोधन: 42वां संशोधन और उससे जुड़ा विवाद
नई दिल्ली, 26 नवंबर। भारतीय लोकतंत्र का इतिहास बार-बार इस बात की गवाही देता है कि देश का संविधान स्थिर नहीं बल्कि एक जीवंत दस्तावेज़ है। जिसे समय और समाज की ज़रूरतों के अनुसार बदला जा सकता है। इसी लचीलेपन के कारण आज तक करीब 106 संशोधन किए जा चुके हैं। लेकिन इनमें सबसे अधिक और सबसे व्यापक बदलाव 1976 का 42वां संविधान संशोधन लेकर आया, जिसे इतिहासकार और संवैधानिक विशेषज्ञ ‘मिनी संविधान’ तक कहते हैं। यह संशोधन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आपातकाल के दौरान लाया गया था और आज भी यह भारतीय राजनीति के सबसे विवादित अध्यायों में से एक माना जाता है।
भारत का संविधान दुनिया में अमेरिका के बाद दूसरा सबसे पुराना और सबसे विस्तृत संविधान माना जाता है। 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत और 26 जनवरी 1950 से लागू हुए मूल संविधान में कुल 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियाँ शामिल थीं। इसकी सबसे बड़ी विशेषताओं में नागरिकों के लिए मौलिक अधिकार, राज्य के लिए निदेशक सिद्धांत, और एक मजबूत लोकतांत्रिक ढांचा स्थापित करने की व्यवस्था शामिल है। भारतीय संविधान दुनिया का सबसे विस्तृत संविधान है, जिसकी कई व्यवस्था—जैसे न्यायिक समीक्षा, मौलिक अधिकार, संघीय संरचना—अमेरिका, कनाडा, आयरलैंड और जापान के संविधानों से प्रेरित हैं। संविधान सभा ने विभिन्न देशों की व्यवस्थाओं का अध्ययन कर एक संतुलित और भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ढांचा तैयार किया।
75 वर्षों की यात्रा में संविधान को समयानुकूल बनाए रखने के लिए अब तक करीब 106 संशोधन किए जा चुके हैं। पहला संशोधन 18 जून 1951 को किया गया था, जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संपत्ति के अधिकार से जुड़े प्रावधानों में बदलाव किए गए थे। वहीं सबसे हालिया 106वां संशोधन 28 दिसंबर 2023 को लागू हुआ, जिसमें लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण अनिवार्य रूप से देने का प्रावधान जोड़ा गया। भारत का संविधान आज भी विश्व के सबसे प्रभावशाली लोकतांत्रिक दस्तावेजों में एक है।
सबसे अधिक संशोधन वाली प्रधानमंत्री: इंदिरा गांधी
इंदिरा गांधी के कार्यकाल में कुल 28 संविधान संशोधन किए गए—यह किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री के कार्यकाल में सबसे अधिक है। इनमें से बड़ी संख्या आपातकाल के दौरान हुई, जब सत्ता संरचना एकतरफ़ा नियंत्रण में थी और विपक्ष राजनीतिक रूप से लगभग निष्क्रिय कर दिया गया था।
42वें संशोधन की पृष्ठभूमि
संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था। निर्माताओं का स्पष्ट विचार था कि यह दस्तावेज़ आधुनिकता के साथ-साथ समयानुकूल रहे। लिखित दुनिया का सबसे बड़ा संविधान होने के कारण इसमें संशोधन की प्रक्रिया भी विस्तृत रखी गई। इसके आर्टिकल 368 के तहत संसद को संविधान संशोधन की शक्ति दी गई है। आपातकाल के दौरान 1976 में आया 42वां संशोधन भारतीय संविधान का सबसे बड़ा बदलाव था। देश में राजनीतिक असंतोष, न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच बढ़ता तनाव और सत्ता के केंद्रीकरण की राजनीति इस संशोधन के केंद्र में थे। उस समय ऐसा माहौल था कि कई संवैधानिक विशेषज्ञों ने इसे लोकतंत्र की नींव को हिलाने वाला कदम बताया।
42वें संशोधन में क्या-क्या बदला?
इस संशोधन को इतिहास में ‘सबसे विस्तृत और व्यापक’ कहा जाता है। कुछ प्रमुख बदलाव इस प्रकार थे संसद के निर्णयों को न्यायालय में चुनौती देने पर रोक: सरकार ने ऐसा प्रावधान जोड़ा कि संसद द्वारा पारित कई निर्णय—विशेष रूप से चुनाव और सदस्यता से जुड़े—को न्यायालय चुनौती न दे सके। सांसदों-विधायकों की सदस्यता पर फैसला लेने का अधिकार न्यायालय से लेकर राष्ट्रपति को दिया गया। संसद का कार्यकाल 5 वर्ष से बढ़ाकर 6 वर्ष किया गया।
संविधान की प्रस्तावना में महत्वपूर्ण बदलाव
- ‘सोशलिस्ट’ (समाजवादी) शब्द जोड़ा गया
- ‘सेक्युलर’ (धर्मनिरपेक्ष) शब्द जोड़ा गया
- ‘राष्ट्र की एकता’ को बदलकर ‘राष्ट्र की एकता और अखंडता’ किया गया
पर्यावरण संरक्षण को पहली बार संविधान का हिस्सा बनाया गया, जो दुनिया के किसी भी संविधान में उस समय नहीं था। विशेषज्ञों के अनुसार यह एक दूरदर्शी कदम था। बीएचयू के सहायक प्रोफेसर (विधि) सी.एम. जरीवाला बताते हैं कि यह पहली बार था जब किसी देश ने पर्यावरण संरक्षण को संवैधानिक दर्जा दिया। यह भारत को भविष्य की पर्यावरणीय चुनौतियों के प्रति सचेत करने वाला निर्णय था।
42वें संशोधन की आलोचना क्यों हुई?
आलोचकों का कहना है कि इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य सत्ता का केंद्रीकरण था। इसका मकसद सिर्फ समाजवाद या धर्मनिरपेक्षता को स्थापित करना नहीं, बल्कि सरकार को अधिकतम अधिकार देना था, ताकि न्यायपालिका की दखल सीमित की जा सके। संसद को लगभग सर्वोच्च और न्यायपालिका को कमजोर बनाने का प्रयास स्पष्ट रूप से दिखा। राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, इस संशोधन की आड़ में कार्यपालिका ने लोकतांत्रिक संस्थाओं पर अपनी पकड़ मजबूत की और विपक्ष की आवाज को सीमित किया। कई कानूनी और राजनीतिक चिंताएं इस मुद्दे पर खुलकर सामने आईं।
जनता पार्टी की सरकार ने क्यों रद्द किए प्रावधान?
1977 में इंदिरा गांधी की हार के बाद सत्ता में आई जनता पार्टी सरकार ने 42वें संशोधन की आलोचना करते हुए 44वें संविधान संशोधन के जरिए उसके कई प्रावधान वापस ले लिए, जैसे सांसदों को दिए गए असीमित अधिकार। संसद के कार्यकाल को छह वर्ष करने का प्रावधान। हालांकि, प्रस्तावना में जोड़े गए समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्दों को नहीं हटाया गया।
केशवानंद भारती केस: ‘बेसिक स्ट्रक्चर सिद्धांत’ का जन्म
संविधान संशोधन पर सबसे बड़ी रोक सुप्रीम कोर्ट ने केशवानंद भारती केस (1973) में लगाई। 13 न्यायाधीशों की यह पीठ भारतीय न्यायपालिका के इतिहास की सबसे बड़ी बेंच थी।
मुख्य निर्णय यह था संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान के ‘बुनियादी ढांचे’ (Basic Structure) को नहीं बदल सकती। यही सिद्धांत आज भी भारतीय लोकतंत्र के लिए सुरक्षा कवच माना जाता है। इस फैसले ने कार्यपालिका और संसद के असीमित अधिकारों पर अंकुश लगाया और संविधान की सर्वोच्चता सुनिश्चित की।
धर्मनिरपेक्षता और आज की बहस
भले ही संविधान कई अनुच्छेदों—जैसे 14, 15, 25—में धर्मनिरपेक्षता की भावना पहले से समाहित करता है, लेकिन प्रस्तावना में ‘सेक्युलर’ शब्द जोड़ना बाद में राजनीतिक विवाद का कारण बना। बीएचयू के असिस्टेंट प्रोफेसर मयंक प्रताप के अनुसार, यह बदलाव अधिक राजनीतिक इच्छा शक्ति का परिणाम था, न कि संवैधानिक आवश्यकता। 42वां संशोधन भारतीय संविधान के इतिहास का वह अध्याय है, जो लोकतंत्र, न्यायपालिका, सत्ता संतुलन और नागरिक अधिकारों पर सबसे गहन प्रभाव छोड़ता है। जहां एक ओर इसने समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और पर्यावरण संरक्षण जैसे आदर्शों को मजबूत किया, वहीं दूसरी ओर इसे लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रहार के रूप में भी देखा गया। आज, दशकों बाद भी 42वें संशोधन पर बहस जारी है।क्या यह लोकतांत्रिक सुधार था या सत्ता का केंद्रीकरण? भारत के संवैधानिक इतिहास में यह सवाल अब भी महत्वपूर्ण है।





