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मित्रों…घाटे में चल रही मेट्रो!…आर्थिक चुनौतियों की पटरी पर रेंग रही भोपाल-इंदौर में मेट्रो…जानें हर दिन हो रहा कितना घाटा

DigitalDesk by DigitalDesk
March 9, 2026
in इंदौर, बिजनेस, भोपाल, मध्य प्रदेश, मुख्य समाचार
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Current Status of the Bhopal-Indore Metro
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मध्य प्रदेश के दो प्रमुख शहरों भोपाल और इंदौर में शुरू की गई मेट्रो परियोजनाएं फिलहाल आर्थिक चुनौतियों से जूझ रही हैं। आधुनिक और तेज सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के रूप में शुरू की गई इन परियोजनाओं से शुरुआत में बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन अभी यात्रियों की कम संख्या और संचालन पर अधिक खर्च के कारण दोनों शहरों की मेट्रो सेवाएं शुरुआती चरण में घाटे में चल रही हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति अस्थायी हो सकती है और जैसे-जैसे नेटवर्क का विस्तार होगा, मेट्रो की उपयोगिता और आय दोनों बढ़ सकती हैं।

भोपाल मेट्रो की मौजूदा स्थिति

राजधानी भोपाल में मेट्रो का व्यावसायिक संचालन शुरू होने के बाद उम्मीद थी कि शहर के लोग बड़ी संख्या में इसका उपयोग करेंगे। मेट्रो को शहर के ट्रैफिक जाम से राहत देने और लोगों को तेज, सुरक्षित तथा आरामदायक यात्रा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। लेकिन शुरुआती आंकड़े उम्मीद के अनुरूप नहीं रहे हैं। मिली जानकारी के अनुसार भोपाल मेट्रो को चलाने में प्रतिदिन लगभग 8 लाख रुपये का खर्च आ रहा है। इसमें बिजली, कर्मचारियों का वेतन, रखरखाव और अन्य संचालन संबंधी खर्च शामिल हैं। दूसरी ओर टिकटों की बिक्री से प्रतिदिन औसतन लगभग 39 हजार रुपये की ही आय हो रही है। इस तरह देखा जाए तो संचालन लागत का 5 प्रतिशत भी टिकट से होने वाली कमाई से पूरा नहीं हो पा रहा है।

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यात्रियों की संख्या भी अपेक्षा से काफी कम है। भोपाल मेट्रो के जिन आठ स्टेशनों पर फिलहाल सेवा उपलब्ध है, वहां रोजाना औसतन करीब 1,200 से 1,300 यात्री ही सफर कर रहे हैं। कई ट्रिप में स्थिति यह रहती है कि लगभग 800 यात्रियों की क्षमता वाले कोच में केवल 40 से 50 यात्री ही दिखाई देते हैं। इससे यह साफ है कि अभी लोगों ने मेट्रो को दैनिक परिवहन के रूप में पूरी तरह नहीं अपनाया है।

इंदौर मेट्रो भी शुरुआती घाटे में

भोपाल की तरह ही इंदौर मेट्रो भी फिलहाल सीमित कॉरिडोर पर संचालित हो रही है और यहां भी यात्रियों की संख्या अपेक्षा से कम है। इंदौर को प्रदेश का सबसे बड़ा व्यावसायिक शहर माना जाता है, इसलिए यहां मेट्रो से काफी उम्मीदें थीं। लेकिन शुरुआती दौर में आर्थिक संतुलन बनाना चुनौती साबित हो रहा है। रिपोर्टों के अनुसार इंदौर मेट्रो को टिकटों की बिक्री से अब तक करीब 20 लाख रुपये की आय हुई है। वहीं केवल बिजली का बिल ही लगभग 80 लाख रुपये तक पहुंच गया है। यानी बिजली खर्च ही टिकट से होने वाली आय से कई गुना अधिक है। इसके अलावा संचालन, रखरखाव और कर्मचारियों पर होने वाला खर्च अलग से है। यात्रियों की कमी के कारण कई बार मेट्रो की समय-सारणी और ट्रेनों की आवृत्ति में भी बदलाव करना पड़ा है। कम यात्रियों के कारण कई ट्रिप में ट्रेन लगभग खाली चलती दिखाई देती है, जिससे आय और खर्च के बीच का अंतर और बढ़ जाता है।

घाटे के प्रमुख कारण

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी शहर में मेट्रो परियोजना के शुरुआती वर्षों में घाटा होना असामान्य नहीं है। इसके पीछे कई व्यावहारिक कारण होते हैं। भोपाल और इंदौर के मामले में भी कुछ प्रमुख कारण सामने आ रहे हैं। सबसे बड़ा कारण यह है कि मेट्रो नेटवर्क अभी बहुत छोटे हिस्से तक सीमित है। शहर के कई प्रमुख इलाकों और घनी आबादी वाले क्षेत्रों तक मेट्रो की पहुंच अभी नहीं है। ऐसे में बड़ी संख्या में लोगों के लिए मेट्रो तक पहुंचना ही मुश्किल हो जाता है। दूसरा कारण स्टेशन तक पहुंचने के लिए पर्याप्त फीडर व्यवस्था का न होना है। कई स्टेशनों पर बस, ई-रिक्शा या साझा परिवहन की सुविधाएं सीमित हैं। यदि यात्रियों को स्टेशन तक पहुंचने में ही ज्यादा समय और पैसा खर्च करना पड़े तो वे मेट्रो की बजाय सीधे बस, ऑटो या निजी वाहन का उपयोग करना पसंद करते हैं।

इसके अलावा पार्किंग की पर्याप्त व्यवस्था न होना भी एक कारण है। यदि लोग अपने निजी वाहन से स्टेशन तक आएं और सुरक्षित पार्किंग न मिले तो वे मेट्रो का उपयोग करने से बचते हैं। ट्रेनों के बीच अपेक्षाकृत लंबा इंतजार समय भी यात्रियों को प्रभावित करता है। कई लोगों का मानना है कि यदि ट्रेनों की आवृत्ति बढ़े और सेवा अधिक नियमित हो तो यात्री संख्या बढ़ सकती है। सबसे महत्वपूर्ण कारण लोगों की आदतें भी हैं। भोपाल और इंदौर जैसे शहरों में अभी भी बड़ी संख्या में लोग बस, ऑटो, दोपहिया या निजी कारों पर निर्भर हैं। मेट्रो को दैनिक जीवन का हिस्सा बनने में समय लगता है।

भविष्य में सुधर सकती है स्थिति

विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे मेट्रो के नए कॉरिडोर और स्टेशन शुरू होंगे, यात्रियों की संख्या में स्वाभाविक रूप से वृद्धि होगी। जब मेट्रो शहर के अधिक हिस्सों को जोड़ेगी और अन्य सार्वजनिक परिवहन के साथ बेहतर तालमेल बनेगा, तब इसका उपयोग तेजी से बढ़ सकता है। दुनिया के कई बड़े शहरों में भी मेट्रो परियोजनाएं शुरुआत में घाटे में रही हैं। लेकिन जब नेटवर्क पूरा हुआ और लोगों को इसकी सुविधा का अनुभव हुआ, तब यात्रियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई और आर्थिक स्थिति में सुधार आया।

सरकार और मेट्रो कॉर्पोरेशन भी राजस्व बढ़ाने के लिए विभिन्न विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। इसमें स्टेशन परिसर में व्यावसायिक गतिविधियां, विज्ञापन, पार्किंग शुल्क और किराये की जगह जैसी व्यवस्थाएं शामिल हो सकती हैं। इन माध्यमों से अतिरिक्त आय प्राप्त कर घाटे को कम किया जा सकता है।  कुल मिलाकर देखा जाए तो भोपाल और इंदौर मेट्रो फिलहाल शुरुआती चुनौतियों के दौर से गुजर रही हैं। यात्रियों की कम संख्या और संचालन पर अधिक खर्च के कारण आर्थिक दबाव बना हुआ है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे मेट्रो नेटवर्क का विस्तार होगा और लोग धीरे-धीरे इसे अपनाएंगे, आने वाले वर्षों में इसकी स्थिति बेहतर हो सकती है। मेट्रो जैसी बड़ी शहरी परियोजनाओं का वास्तविक लाभ अक्सर लंबे समय में ही दिखाई देता है।

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Tags: #Bhopal-Indore Metro#Current Status of the Bhopal-Indore Metro#Economic Challenges and Metro
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