एक भारत श्रेष्ठ भारत – आदिवासी गौरव का अमृत काल…एक नारा नहीं, PM मोदी का वह मंत्र है जिसने देश की आत्मा को एक सूत्र में पिरो दिया…!

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एक भारत श्रेष्ठ भारत – आदिवासी गौरव का अमृत काल

एक भारत श्रेष्ठ भारत — यह केवल एक नारा नहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वह मंत्र है जिसने देश की आत्मा को एक सूत्र में पिरो दिया है। यही वह विचार है जिसने भारत को विविधता में एकता के भाव से जोड़ा और हर वर्ग के दिल में राष्ट्रभक्ति की लौ जलायी। मोदी का यह मंत्र देश के कोने-कोने में गूंजता है — पहाड़ों से लेकर मैदानों तक, और वनवासियों से लेकर नगरों तक। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आदिवासी समाज से रिश्ता नया नहीं, बल्कि उनके जीवन का अभिन्न अध्याय है। उन्होंने न केवल आदिवासी जीवन के संघर्ष को करीब से देखा, बल्कि उनके कल्याण के लिए ठोस और ऐतिहासिक कदम उठाए हैं। यही कारण है कि आज जनजातीय गौरव दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व की शुरुआत भी नरेंद्र मोदी ने की, ताकि देश उस समाज के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करे जिसने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी।

धरती आबा बिरसा मुंडा – बलिदान और गौरव की प्रतीक कथा

रांची जेल — वह स्थान जो अंग्रेजी हुकूमत के जुल्मों की कहानी बयां करता है। यहीं कैद थे धरती आबा बिरसा मुंडा, जिन्हें आदिवासी भगवान के रूप में पूजा जाता है। बिरसा मुंडा ने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए जो आंदोलन छेड़ा, उसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी। उनका बलिदान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे आदिवासी समाज की आत्मा का प्रतीक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिरसा मुंडा की स्मृति को अमर करते हुए उसी रांची जेल में बिरसा मुंडा स्मृति संग्रहालय सह उद्यान का निर्माण कराया, जहाँ धरती आबा ने अपने प्राण त्यागे थे।
₹142 करोड़ की लागत से बने इस संग्रहालय में 25 फीट ऊंची बिरसा मुंडा की भव्य प्रतिमा स्थापित की गई है। यहां न केवल बिरसा मुंडा की जीवनगाथा, बल्कि 13 अन्य जनजातीय नायकों के अदम्य साहस और संघर्ष की कहानियां भी प्रदर्शित की गई हैं।

मोदी और आदिवासी समाज का पुराना रिश्ता

प्रधानमंत्री मोदी का आदिवासी समाज से जुड़ाव कोई राजनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदना की कहानी है। सन् 1983 में, जब नरेंद्र मोदी एक स्वयंसेवक के रूप में दक्षिण गुजरात के धर्मपुर गांव पहुंचे, तब उन्होंने आदिवासी जीवन की कठिनाइयों को नजदीक से देखा। संसाधनों के अभाव में जीवन जी रहे उन परिवारों की पीड़ा ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। इसी अनुभव से प्रेरित होकर उन्होंने ‘मारुति की प्राण प्रतिष्ठा’ शीर्षक से एक कविता भी लिखी, जिसमें उन्होंने आदिवासी संघर्ष और जीवन दर्शन को शब्द दिए। 1985 के एक भाषण में मोदी ने सवाल उठाया था “स्वतंत्रता के 38 साल बाद भी भारत के आदिवासी गरीबी और पिछड़ेपन से क्यों जूझ रहे हैं, जबकि यह देश प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है? यही संवेदना आगे चलकर उनके नीति निर्णयों में झलकी — चाहे वे गुजरात के मुख्यमंत्री रहे हों या भारत के प्रधानमंत्री।

आदिवासी उत्थान के लिए ऐतिहासिक कदम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने आदिवासी समाज के समग्र विकास के लिए कई ऐतिहासिक योजनाएं शुरू कीं। पीएम जनमन योजना के लिए ₹24,104 करोड़ और धरती आबा अभियान के लिए ₹79,156 करोड़ का बजट निर्धारित किया गया। अनुसूचित जनजातियों के विकास के लिए बजट को पांच गुना बढ़ाते हुए 2024-25 में इसे ₹1,23,000 करोड़ तक पहुंचाया गया। पिछले एक दशक में मोदी सरकार ने आदिवासी विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति योजनाओं को सशक्त बनाया और 117 नए समुदायों को अनुसूचित जनजातियों की सूची में शामिल किया। वन धन योजना, पीएम जनम, एकलव्य मॉडल स्कूल, और आदिवासी संग्रहालयों के जरिए इस समाज को शिक्षा, स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता के पथ पर अग्रसर किया गया।

आदिवासी योगदान का राष्ट्रीय सम्मान

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है आदिवासी समाज के बलिदानों का हम पर ऋण है। यह समाज प्रकृति का सच्चा रक्षक है, जिसने हमें सिखाया कि पर्यावरण के साथ सामंजस्य में कैसे जिया जाता है।
वास्तव में, आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से जूझ रही है, भारत का आदिवासी समाज अपने पारंपरिक ज्ञान और जीवनशैली से पर्यावरण संरक्षण का उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। आदिवासी केवल जंगलों के वासी नहीं, बल्कि भारत की आत्मा के प्रहरी हैं। आज देश में 10 करोड़ से अधिक आदिवासी हैं जो सभ्यता की जड़ों को पोषित करते हैं। वे उस भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं जहाँ संस्कृति, श्रम और प्रकृति का संगम है।

नया भारत – सबका साथ, सबका विकास

आज जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ की बात करते हैं, तो उसमें आदिवासी समाज का विशेष स्थान है। पीएम मोदी के नेतृत्व में यह समाज अब सिर्फ ‘वंचित’ नहीं, बल्कि ‘विकास के वाहक’ के रूप में उभर रहा है। जनजातीय गौरव दिवस इसका प्रतीक है — यह सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि उस पहचान का सम्मान है जो सदियों तक उपेक्षित रही। भारत श्रेष्ठ भारत — यह मंत्र आज उस रूप में साकार हो रहा है जहाँ हर नागरिक, हर समुदाय, हर जनजाति भारत के विकास की कहानी का हिस्सा है। और जब इस एकता की डोर में आदिवासी समाज के बलिदान, संस्कृति और योगदान की गूंज शामिल होती है, तब सचमुच भारत श्रेष्ठ बनता है — सबका भारत, सर्वोत्तम भारत।

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