उल्लास, परंपरा और पहचान का पर्व: राष्ट्रीय मान्यता की राह पर भगोरिया

Bhagoria fair

उल्लास, परंपरा और पहचान का पर्व: राष्ट्रीय मान्यता की राह पर भगोरिया

फागुन की दस्तक के साथ जब पश्चिमी मध्यप्रदेश के पहाड़ी अंचलों में पलाश खिलते हैं, तब हाट-बाजारों में रंगों की एक अलग ही दुनिया बसती है। यही है भगोरिया—उल्लास, प्रेम और आत्मगौरव का लोकपर्व। अब इस पर्व को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में डॉ. मोहन यादव की सरकार सक्रिय है। राज्य सरकार ने इसे राष्ट्रीय पर्व के रूप में स्थापित करने का संकल्प लिया है और जनजातीय बहुल जिलों में ‘कृषि कैबिनेट’ आयोजित करने की तैयारी भी शुरू कर दी है।

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फागुन की दस्तक के साथ जब पश्चिमी मध्यप्रदेश के पहाड़ी अंचलों में पलाश खिलते हैं, तब हाट-बाजारों में रंगों की एक अलग ही दुनिया बसती है। यही है भगोरिया—उल्लास, प्रेम और आत्मगौरव का लोकपर्व। अब इस पर्व को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में डॉ. मोहन यादव की सरकार सक्रिय है। राज्य सरकार ने इसे राष्ट्रीय पर्व के रूप में स्थापित करने का संकल्प लिया है और जनजातीय बहुल जिलों में ‘कृषि कैबिनेट’ आयोजित करने की तैयारी भी शुरू कर दी है।

फसल, फाग और फुहारों का उत्सव

भगोरिया मेला झाबुआ, आलीराजपुर, धार, बड़वानी और खरगोन जिलों के भील, भिलाला और बारेला समुदायों द्वारा होली से सात दिन पहले मनाया जाता है। 2026 में यह महोत्सव 24 फरवरी से शुरू होकर 2 मार्च तक चलेगा। 2 मार्च को बड़वानी जिले के निवाली में मुख्यमंत्री स्वयं इसमें शामिल होंगे। यह पर्व फसल कटाई के बाद का जश्न है—किसान की मेहनत की मुस्कान। साप्ताहिक हाट बाजारों में जब गुलाल, पान, चांदी के आभूषण और रंग-बिरंगे परिधान सजे होते हैं, तब भगोरिया का असली रंग दिखता है। दुकानदारों के लिए यह साल की सबसे बड़ी कमाई का अवसर होता है।

ढोल-मांदल की थाप पर थिरकता जनजीवन

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भगोरिया का हृदय है उसका नृत्य-संगीत। बड़े-बड़े ढोल और मांदल की थाप पर युवक-युवतियां पारंपरिक वेशभूषा में झूमते हैं। पुरुष और महिलाएं चांदी के आभूषणों से सुसज्जित होकर नृत्य करते हैं—यह चांदी भील संस्कृति में समृद्धि का प्रतीक है। अलग-अलग दल एक ही रंग के वस्त्रों में अपनी विशिष्ट पहचान के साथ भाग लेते हैं, जिससे पूरा वातावरण इंद्रधनुषी हो उठता है।

प्रेम और परंपरा का अनोखा संगम

भगोरिया को प्रेम का उत्सव भी कहा जाता है। मान्यता है कि युवक-युवती अपनी पसंद के साथी को गुलाल लगाकर या पान खिलाकर प्रेम का इज़हार करते हैं। कई स्थानों पर ‘भागकर विवाह’ की परंपरा भी रही है, जो सामाजिक स्वीकृति के साथ संपन्न होती है। यही वजह है कि भगोरिया सिर्फ मेला नहीं, जीवनसाथी चुनने का सांस्कृतिक मंच भी है।

वालपुर: तीन संस्कृतियों का संगम

वालपुर का भगोरिया विशेष रूप से प्रसिद्ध है। किंवदंती है कि इसकी शुरुआत राजा भोज काल में भील राजाओं ने की थी। मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात की सीमाओं के निकट स्थित होने से यहां तीन प्रांतों की जनजातीय संस्कृति का अद्भुत संगम दिखाई देता है। पारंपरिकता और आधुनिकता का यह मेल वालपुर को विशिष्ट पहचान देता है।

राजकीय उत्सव से राष्ट्रीय पहचान तक

4 मार्च 2025 को मुख्यमंत्री निवास में ‘जनजातीय देवलोक महोत्सव’ के दौरान भगोरिया को राजकीय उत्सव के रूप में मनाया गया। मुख्यमंत्री ने कहा, “भगोरिया फागुन की खुशबू में ठहरकर उसे जी लेने का पर्व है।” सरकार का मानना है कि इस लोकपर्व को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिलने से जनजातीय संस्कृति को सम्मान और वैश्विक पहचान मिलेगी।

कृषि कैबिनेट: नीति और परंपरा का मेल

मालवा अंचल के बड़वानी, धार और झाबुआ में कृषि कैबिनेट आयोजित करने की तैयारी इस बात का संकेत है कि सरकार जनजातीय क्षेत्रों की कृषि, जल-संरक्षण और वनाधारित अर्थव्यवस्था को नई दिशा देना चाहती है। भगोरिया जैसे पर्व, जहां किसान और बाजार सीधे जुड़े होते हैं, वहां कृषि नीति पर चर्चा प्रतीकात्मक और व्यावहारिक—दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण

भगोरिया मेला सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता की पहचान है। यहां का हर रंग, हर थाप और हर मुस्कान सदियों की परंपरा का विस्तार है। राष्ट्रीय मान्यता मिलने से पर्यटन, हस्तशिल्प और स्थानीय व्यापार को भी बढ़ावा मिलेगा। फागुन के रंगों में सराबोर यह पर्व हमें याद दिलाता है कि विकास की दौड़ में परंपराओं की धड़कन को सुनना भी उतना ही जरूरी है। भगोरिया उसी धड़कन का नाम है—जो हर साल होली से पहले जनजातीय अंचलों में प्रेम, परिश्रम और प्रकृति के उत्सव के रूप में गूंजती है।

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