कर्नाटक में बुल्डोजर एक्शन: बेंगलुरु में ध्वस्तीकरण …मुस्लिम परिवारों को कांग्रेस सरकार ने एक झटके में किया बेघर…सिद्धारमैया से पार्टी नेतृत्व ने की ये अपील
बेंगलुरु के बाहरी इलाके में चलाए गए एक ध्वस्तीकरण अभियान ने कर्नाटक की सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के भीतर असहज स्थिति पैदा कर दी है। येलहंका के पास कोगिलु गांव में हुए इस अभियान को लेकर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से हस्तक्षेप करते हुए राज्य सरकार को सावधानी, संवेदनशीलता और करुणा से काम करने की सलाह दी है। स्थानीय लोगों के विरोध, विपक्षी दलों की तीखी आलोचना और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच यह मामला तेजी से राजनीतिक तूल पकड़ता जा रहा है।
शनिवार को कांग्रेस के महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से फोन पर बातचीत की। बातचीत का केंद्र कोगिलु गांव के निवासियों को हटाने की कार्रवाई रही, जिसने न केवल स्थानीय लोगों में रोष पैदा किया है बल्कि कांग्रेस के लिए भी असहज तुलना और सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्टी नेतृत्व को आशंका है कि इस तरह की कार्रवाइयों से कांग्रेस की उस छवि को नुकसान पहुंच सकता है, जो वह गरीबों, वंचितों और कमजोर तबकों के हितैषी के रूप में पेश करती रही है।
केसी वेणुगोपाल ने कहा कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) इस बात को लेकर गहरी चिंता में है कि ध्वस्तीकरण की पूरी प्रक्रिया किस तरह से अंजाम दी गई। उन्होंने स्पष्ट रूप से यह संदेश दिया कि इस तरह के कदम उठाते समय केवल कानूनी या प्रशासनिक पहलुओं को ही नहीं, बल्कि मानवीय प्रभाव को भी निर्णय प्रक्रिया के केंद्र में रखना चाहिए। उनके अनुसार, किसी भी सरकारी कार्रवाई में प्रभावित परिवारों की पीड़ा, उनकी आजीविका और भविष्य की सुरक्षा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
वेणुगोपाल ने यह भी कहा कि पार्टी का मानना है कि विकास और कानून के नाम पर उठाए गए कदमों में करुणा और संवेदनशीलता अनिवार्य है। उन्होंने मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री से अपेक्षा जताई कि वे स्वयं प्रभावित परिवारों से संवाद करेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि किसी भी व्यक्ति को बिना वैकल्पिक व्यवस्था के बेघर न किया जाए।
पार्टी महासचिव के अनुसार, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने उन्हें भरोसा दिलाया है कि वे व्यक्तिगत रूप से प्रभावित परिवारों से मिलेंगे। साथ ही, एक प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र स्थापित किया जाएगा ताकि लोगों की समस्याओं को सुना और सुलझाया जा सके। राज्य सरकार ने यह भी आश्वासन दिया है कि जिन परिवारों को हटाया गया है, उनके पुनर्वास और राहत की समुचित व्यवस्था की जाएगी।
जमीनी स्तर पर विरोध और आरोप
इन आश्वासनों के बावजूद, जमीनी स्तर पर असंतोष थमता नहीं दिख रहा है। सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) और स्थानीय निवासियों ने ध्वस्तीकरण के खिलाफ प्रदर्शन किए। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकार ने बिना किसी ठोस वैकल्पिक व्यवस्था के गरीब और कमजोर परिवारों को उनके घरों से बेदखल कर दिया। कई परिवारों का कहना है कि वे वर्षों से वहां रह रहे थे और अचानक की गई कार्रवाई ने उन्हें खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर कर दिया है।
प्रदर्शनकारियों ने तत्काल पुनर्वास, अस्थायी आश्रय, भोजन, पानी और अन्य बुनियादी सुविधाओं की मांग की। उनका कहना है कि सरकार को पहले वैकल्पिक आवास और आजीविका की व्यवस्था करनी चाहिए थी, उसके बाद ही किसी भी तरह की तोड़फोड़ की कार्रवाई की जानी चाहिए थी।
विपक्ष का हमला और राजनीतिक असर
इस मुद्दे पर विपक्षी दलों ने कांग्रेस सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। विपक्ष का आरोप है कि कांग्रेस एक ओर खुद को गरीबों की पार्टी बताती है, वहीं दूसरी ओर उसकी सरकार ऐसे कदम उठा रही है, जिससे कमजोर वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है। कुछ विपक्षी नेताओं ने इस कार्रवाई की तुलना अन्य राज्यों में हुए ध्वस्तीकरण अभियानों से करते हुए कांग्रेस पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला आने वाले समय में कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदेह साबित हो सकता है, खासकर शहरी गरीब और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच। पार्टी के भीतर भी यह चिंता बढ़ रही है कि यदि समय रहते स्थिति को नहीं संभाला गया, तो इसका असर जनसमर्थन पर पड़ सकता है। कांग्रेस नेतृत्व का हस्तक्षेप इस बात का संकेत है कि पार्टी इस मुद्दे को हल्के में नहीं लेना चाहती। मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री द्वारा दिए गए आश्वासन यदि जमीन पर अमल में आते हैं, तो कुछ हद तक हालात संभाले जा सकते हैं। हालांकि, प्रभावित परिवारों के लिए वास्तविक राहत और पुनर्वास ही यह तय करेगा कि सरकार और पार्टी की मंशा पर जनता कितना भरोसा करती है। फिलहाल, कोगिलु गांव का ध्वस्तीकरण अभियान न केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई भर नहीं रह गया है, बल्कि यह कांग्रेस सरकार की संवेदनशीलता, उसकी नीतियों और राजनीतिक प्रतिबद्धताओं की एक बड़ी परीक्षा बन चुका है।