डरेंगे नहीं, झुकेंगे नहीं…’ बांग्लादेश में अखबारों पर हमले के बाद इस अखबार ने दिखाया उपद्रवी भीड़ को आईना

Bangladesh media attacked newspaper offices burnt in Dhaka

डरेंगे नहीं, झुकेंगे नहीं…’ बांग्लादेश में अखबारों पर हमले के बाद इस अखबार ने दिखाया उपद्रवी भीड़ को आईना

बांग्लादेश में स्वतंत्र पत्रकारिता के इतिहास में शुक्रवार की रात एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई। राजधानी ढाका में देश के दो सबसे बड़े और प्रभावशाली अखबार—अंग्रेजी दैनिक द डेली स्टार और बांग्ला अखबार प्रोथोम आलो—के दफ्तरों पर हिंसक भीड़ ने हमला कर दिया। आगजनी, तोड़फोड़, लूटपाट और पत्रकारों को घंटों तक बंधक जैसी स्थिति ने न सिर्फ मीडिया संस्थानों की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए, बल्कि अभिव्यक्ति की आज़ादी और लोकतांत्रिक मूल्यों को भी गहरी चोट पहुंचाई।

शुक्रवार देर रात ढाका की सड़कों पर हालात अचानक बेकाबू हो गए। आधी रात से लेकर सुबह तक फैले इस आतंक में अखबारों के दफ्तर जलते रहे, कंप्यूटर, कैमरे और जरूरी दस्तावेज लूट लिए गए। हालात इतने भयावह हो गए कि कई पत्रकार अपनी जान बचाने के लिए धुएं से भरी इमारतों की छतों पर फंस गए। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, उग्र भीड़ ने दमकल विभाग की गाड़ियों को भी मौके पर पहुंचने से रोका, जिससे आग पर काबू पाने में घंटों की देरी हुई।

इस पूरे घटनाक्रम पर द डेली स्टार ने कड़ा और साहसी रुख अपनाया है। अखबार ने अपने आधिकारिक बयान में कहा, “हम डरेंगे नहीं, हम झुकेंगे नहीं।” डेली स्टार ने इस हमले को बांग्लादेश में स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए सबसे काले दिनों में से एक बताया। अखबार का कहना है कि यह हमला केवल दो मीडिया संस्थानों पर नहीं, बल्कि लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सीधा हमला है।

डेली स्टार के अनुसार, काजी नजरुल इस्लाम एवेन्यू स्थित उसके मुख्यालय में हमलावर आधी रात के करीब जबरन घुस आए। इमारत में घुसते ही भीड़ ने जमकर तोड़फोड़ शुरू कर दी। फर्नीचर, शीशे के दरवाजे और ऑफिस उपकरण नष्ट कर दिए गए। जुलाई विद्रोह के शहीदों—अबू सईद और मीर महफूज़ुर रहमान मुग्धो—के पोस्टर तक फाड़ दिए गए, जो हमलावरों की मानसिकता को उजागर करता है।

हमलावरों ने ग्राउंड फ्लोर और पहली मंजिल पर आग लगा दी, जहां जुलाई आंदोलन से जुड़ी तस्वीरें लगी थीं। ग्राउंड फ्लोर पर रखे फर्नीचर और अखबारों के बंडल जलाए गए, जिससे आग तेजी से दूसरी मंजिल तक फैल गई। भीड़ के एक अन्य समूह ने फर्नीचर को घसीटकर सड़क पर ले जाकर आग के हवाले कर दिया। हालात इतने बिगड़ गए कि आग और धुएं ने पूरी इमारत को अपनी चपेट में ले लिया।

भीड़ यहीं नहीं रुकी। पहली मंजिल से लेकर छठी मंजिल तक उपद्रवी पहुंचे और कंप्यूटर, कैमरे, हार्ड ड्राइव समेत तमाम इलेक्ट्रॉनिक उपकरण लूट लिए। यहां तक कि ऑफिस कैंटीन से खाने-पीने का सामान भी उठा लिया गया। यह हमला सुनियोजित प्रतीत होता है, जिसका मकसद मीडिया को डराना और उसकी आवाज़ को दबाना था।

जैसे-जैसे आग बढ़ती गई, काले धुएं ने सीढ़ियों और गलियारों को भर दिया। कम से कम 28 पत्रकार और कर्मचारी जान बचाने के लिए ऊपर की ओर भागे और छत पर शरण लेनी पड़ी। वहां भी हालात बेहद गंभीर थे और सांस लेना मुश्किल हो रहा था। इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट जायमा इस्लाम ने रात करीब एक बजे फेसबुक पर लिखा, “मैं अब सांस नहीं ले पा रही हूं। बहुत ज्यादा धुआं है। मैं अंदर फंसी हूं। आप मुझे मार रहे हैं।” यह पोस्ट उस भयावह स्थिति की गवाही देती है, जिससे पत्रकार गुजर रहे थे।

इमारत के बाहर पत्रकारों के परिवारजन, दोस्त और सहकर्मी घंटों तक बेचैनी में इंतजार करते रहे। हर किसी के मन में यही सवाल था कि अंदर फंसे लोग सुरक्षित हैं या नहीं। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि प्रदर्शनकारियों ने फायर सर्विस की गाड़ियों को रोक दिया, जिससे बचाव कार्य में भारी देरी हुई। भीड़ आधी रात से सुबह करीब 4:30 बजे तक डटी रही। पुलिस, सेना और दमकल कर्मियों ने हालात पर काबू पाने की कोशिश की, लेकिन चार घंटे तक स्थिति बेहद तनावपूर्ण बनी रही।

डेली स्टार के एचआर प्रमुख महमूदुल हसन खान ने बताया कि आग फैलने के दौरान 28 कर्मचारी छत पर पहुंच गए और उन्होंने लोहे का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। आखिरकार सुबह करीब पांच बजे सेना और फायर फाइटर्स ने सभी को सुरक्षित बाहर निकाला। हालांकि इस हमले के चलते इमारत की बिजली, पानी और गैस की आपूर्ति पूरी तरह ठप हो गई। 34 साल के इतिहास में यह पहली बार हुआ, जब द डेली स्टार का प्रिंट संस्करण प्रकाशित नहीं हो सका।

इसी रात करवान बाजार स्थित प्रोथोम आलो के मुख्यालय को भी निशाना बनाया गया। एक खबर के बाद फैली अफवाहों के चलते करीब 30–35 लोगों की भीड़ शाहबाग से प्रोथोम आलो के दफ्तर की ओर बढ़ी। पुलिस ने शुरुआती तौर पर भीड़ को रोकने की कोशिश की, लेकिन उपद्रवी देर तक वहां डटे रहे। डेली स्टार ने अपने संपादकीय रुख में साफ कहा है कि “वे हमारे कार्यालय जला सकते हैं, लेकिन हमारे संकल्प को नहीं।” यह बयान न सिर्फ एक अखबार की जिद और साहस को दर्शाता है, बल्कि पूरे बांग्लादेशी मीडिया के लिए एक संदेश भी है कि सच बोलने की कीमत चाहे कितनी भी भारी क्यों न हो, पत्रकारिता झुकेगी नहीं। यह घटना अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता का विषय बन चुकी है और बांग्लादेश में मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

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