आंदोलन से सत्ता तक बालेन शाह…क्या आपदा में टिक पाएगी Gen-Z सरकार?

Balen Shah From movement to power will the Gen Z government withstand the crisis

पूरे विश्व में इस समय Gen Z और Gen Z आंदोलन को लेकर चर्चाऐं हो रही है। देश का भविष्य मानते हुए ज्यादातर देशों में Gen Z को प्राथमिकता के तौर पर रखा जा रहा है। भारत जैसे बड़े देश में अब Gen Z से कनेक्ट होने के लिए मोदी सरकार अपने मंत्रियों को निर्देश दे रही है। वहीं दुनिया के कई हिस्सों में युवाओं मतलब कि Gen Z को लेकर हलचल तेज है।

नेपाल में Gen-Z सरकार की परीक्षा

नेपाल में प्रलयंकारी बाढ़ के बाद अब विश्व की सबसे पहली Gen Z सरकार की अग्नि परीक्षा जारी है। देश के इतने बड़े आपाद के समय बालेन शाह किस तरह से देश के लोगों के साथ खड़े हैं। क्यो वो जनता को इमोशनली सरकार के जोड़ पा रहे हैं। क्या वो प्रलय के बाद फैली गाद को जल्दी हटा पाऐंगे उनके पास गाद हटाने का क्या कोई प्लान है, किसी तरह की योजना है। क्या बालेन शाह नेपाल की जनता के रहने के लिए घर और रोजी रोटी के साधनों को फिर से वापस दिला पाऐंगे अगर वो ऐसा कर पा रहे हैं तो कितना समय लगेगा।

बालेन शाह का दावा है कि घटना के 45 मिनट बाद ही उन्होंने आपातकालीन बैठक बुला ली थी। बचाव और राहत कार्यों को तुरंत शुरू करा गया था.साथ ही दुनिया भर के देशों से मिल रही सहायता के लिए भी संसद में बालेन शाह ने धन्यवाद दिया। एक समय था जब बालेन शाह सरकार भारत को अपना दोस्त नही मनाती थी। लेकिन आपदा के तुंरत बाद भारत से सबसे पहले नेपाल की मदद की इसके लिए बालने शाह में ससंद में भारत को थऐंक यू भारत कहा।
अब भले ही बालेन शाह की सरकार देश में त्वरित बताव और राहत देने की बात कर रही है लेकिन हकीकत ये है कि जिस बड़े पैमाने पर भोटेकाशी में बाढ आई है जिस बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है उसकी जल्दी भरपाई कर पाना हुत कठिन है इसलिए बालेन शाह के तमाम दावों के बाद भी सच तो ये है कि उनके सामने अभी कई प्रशानिक और राजनैतिक चुनौतियां है। इस बीच नेपाल के मंत्री पड़ोसी देशों से नेपाल के रिश्तों को बड़े ही कूटनीतिक अंदाज में बता रहे हैं। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने भारत और चीन के रिश्तों की तुलना माता-पिता से की है। उनके लिए दोनों पड़ोसी देश माता पिता की तरह हैं।

बालेन शाह सरकार पर क्यों है सबकी नजर

दरअसल बालेन शाह सरकार नेपाल में Gen Z आंदोलन के बाद बनी है। ये Gen Z आंदोलन से निकली सरकार है , इसलिए इसे कसौटी पर कसा जा रहा है। इतिहास इस बात का गवाह है कि आंदोलन से उपजी सरकारें कभी काम नहीं कर पाती। उनकी क्षमताओं पर हमेशा सवाल खड़े होते हैं. इतिहास में कई ऐसे उदाहरण है जो इस बात की गवाही भी देते है। करीब 12 साल पहले 2014 में दिल्ली में आण आदमी पार्टी की सरकार बनी लेकिन सरकार को दो महीने से भी कम समय में इस्तीफा देना पड़ा। इटली के फाइव स्टार मूवमेंट का हश्र भी कुछ ऐसा ही हुआ। 2018 में जीत के बाद पूरा आंदोलन बिखर गया। मेडागास्कर में 2025 में Gen Z आंदोलन सत्ता को मिल जाती है लेकिन अनुभवों के अभाव में उसे चला पाना आसान नहीं होता।
आंदोलनों से बनी सरकारों की छवि धूमिल होते समय नहीं लगता । भारत में अकेले आम आदमी पार्टी ही नहीं बल्कि असम राज्य भी इसका गवाह है। 1985 में असम में छह साल चले आंदोलन के बाद असम गण परिषद (AGP) की सरकार बनी। पार्टी ने 126 में से 67 सीटें जीतीं और 33 साल के प्रफुल्ल महंत राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। आंदोलन ने युवा नेता तो दिया लेकिन अनुभव और मजबूत संगठन की कमी के चलते सरकार ने अपनी चमक खो दी और ULFA जैसेसंगठन मजबूत हुए तो सरकार को बर्खास्त करना पड़ा।

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