बिहार चुनाव में बहादुरगंज की जंग: मुस्लिम बहुल सीट पर RJD की मुश्किलें बरकरार, AIMIM की एंट्री से बढ़ा एनडीए का फायदा
मुस्लिम बहुल सीट, RJD अब तक शून्य
बिहार के सीमांचल क्षेत्र की बहादुरगंज विधानसभा सीट हर बार चुनावी हलचल का केंद्र रही है। यहां 68 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है, लेकिन इसके बावजूद लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) अब तक यहां जीत दर्ज नहीं कर सकी है।
यह सीट 1951 में अस्तित्व में आई और अब तक 17 चुनाव हो चुके हैं।
दिलचस्प बात यह है कि इस क्षेत्र से अब तक केवल तीन गैर-मुस्लिम विधायक ही चुने गए हैं। कांग्रेस का यहां लंबा दबदबा रहा है — उसने 10 बार जीत हासिल की है।
आरजेडी के लिए यह सीट 2025 के चुनाव में प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुकी है।
- मुस्लिम बहुल सीट, RJD शून्य
- AIMIM ने तोड़ी परंपरा
- कांग्रेस-VIP में टिकट खींचतान
- एनडीए को अप्रत्यक्ष बढ़त
- बहादुरगंज में सियासी जंग
AIMIM ने तोड़ी परंपरा, फिर मजबूत पकड़
2020 के विधानसभा चुनाव में बहादुरगंज की राजनीति में बड़ा उलटफेर हुआ था। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के उम्मीदवार मोहम्मद अंजार नईमी ने 45,000 से ज्यादा वोटों के अंतर से जीत दर्ज कर सबको चौंका दिया था। यह जीत AIMIM की सीमांचल में मुस्लिम मतदाताओं पर पकड़ का सबूत बनी। हालांकि, मार्च 2022 में नईमी तीन अन्य विधायकों के साथ आरजेडी में शामिल हो गए। इसके बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में AIMIM ने बहादुरगंज में फिर से मजबूत प्रदर्शन किया और RJD से 6,800 वोट आगे रही, जो यह दिखाता है कि जनता का भरोसा नईमी नहीं बल्कि AIMIM के ब्रांड पर ज्यादा है।
कांग्रेस और VIP के दावे से बढ़ा महागठबंधन का तनाव
बहादुरगंज सीट अब महागठबंधन के भीतर सिरदर्द बन गई है। हालांकि मौजूदा विधायक आरजेडी के पाले में हैं, लेकिन कांग्रेस और विकासशील इंसान पार्टी (VIP) भी यहां अपनी दावेदारी ठोक रही हैं। VIP 2020 में इस सीट पर दूसरे स्थान पर रही थी, जबकि कांग्रेस को उम्मीद है कि उसकी पुरानी पकड़ अभी भी वोटरों के बीच कायम है। महागठबंधन के घटक दलों में अब इस बात पर खींचतान है कि टिकट किसे मिले।
अगर समझौता नहीं हुआ तो यहां फ्रेंडली फाइट या बगावत की स्थिति बन सकती है, जो विपक्षी गठबंधन की रणनीति को कमजोर कर देगी।
AIMIM के उतरने से एनडीए की उम्मीदें बढ़ीं
असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने बहादुरगंज में दोबारा उतरने का ऐलान कर दिया है। AIMIM का दावा है कि “जनता के साथ विश्वासघात हुआ है” क्योंकि उसके चुने विधायक ने पार्टी बदल ली। इसलिए इस बार AIMIM पूरी ताकत के साथ मैदान में उतरना चाहती है। अगर ऐसा हुआ तो मुस्लिम वोटों में सीधा बंटवारा होगा, जिसका फायदा सीधे एनडीए को मिलेगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बहादुरगंज में AIMIM की मौजूदगी RJD-कांग्रेस वोट बैंक को तोड़ेगी और इससे BJP या JDU को अप्रत्यक्ष लाभ हो सकता है। 1995 में यहां से बीजेपी के अवध बिहारी सिंह ने जीत हासिल की थी — वही जीत एनडीए इस बार दोहराने की कोशिश कर सकता है।
स्थानीय समीकरणों में नजमुद्दीन और तौसीफ फैक्टर
बहादुरगंज के राजनीतिक इतिहास में दो नाम सबसे ज्यादा प्रभावशाली रहे हैं। नजमुद्दीन और मोहम्मद तौसीफ आलम। दोनों ने चार-चार बार इस सीट पर जीत हासिल की है।
नजमुद्दीन ने हमेशा कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा, जबकि तौसीफ ने बतौर निर्दलीय शुरुआत की थी और बाद में कांग्रेस से जुड़ गए। हालांकि, 2020 में तौसीफ आलम तीसरे स्थान पर खिसक गए और उन्हें महज 4.5 प्रतिशत वोट मिले। इससे साफ है कि पारंपरिक चेहरे अब बहादुरगंज में असर खो रहे हैं, और नई पीढ़ी AIMIM जैसे विकल्पों की ओर झुक रही है।
मुकाबला त्रिकोणीय, समीकरण पेचीदा
2025 के विधानसभा चुनाव में बहादुरगंज सीट का समीकरण तीन-कोणीय हो सकता है
RJD (मौजूदा विधायक और संगठन)
AIMIM (पार्टी ब्रांड और ओवैसी फैक्टर)
एनडीए (वोट बंटवारे से अप्रत्यक्ष लाभ)
अगर AIMIM मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा अपने पक्ष में रखती है, तो RJD का रास्ता बेहद मुश्किल हो जाएगा। वहीं, एनडीए को उम्मीद है कि अल्पसंख्यक वोटों के बंटवारे से हिंदू मतदाता एकजुट होकर उन्हें फायदा पहुंचा सकते हैं। इसलिए बहादुरगंज की लड़ाई केवल एक सीट की नहीं, बल्कि सीमांचल के राजनीतिक प्रभाव की भी परीक्षा होगी। बहादुरगंज सीट बिहार चुनाव 2025 की सबसे दिलचस्प और रणनीतिक रूप से अहम लड़ाई बनने जा रही है। 68% मुस्लिम वोटों के बावजूद अब तक RJD का खाता नहीं खुला है, AIMIM की वापसी और कांग्रेस-VIP की दावेदारी ने इसे महागठबंधन के लिए सिरदर्द बना दिया है। अगर ओवैसी की पार्टी यहां मजबूत प्रदर्शन करती है, तो नीतीश कुमार और एनडीए को अप्रत्याशित राहत मिल सकती है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या इस बार बहादुरगंज में इतिहास बदलेगा या परंपरा कायम रहेगी।
( प्रकाश कुमार पांडेय)