विधानसभा चुनाव चार राज्यों में काउंटिंग का काउंट डाउन, रविवार को साफ हो जाएगा कितने एक्जैक्ट एग्जिट पोल
चार राज्यों की विधानसभाओं के लिए हुए अलग अलग चरण में हुए मतदान के बाद अब मतगणना का इंतजार किया जा रहा है। यह इंतजार रविवार 3 दिसंबर को खत्म होगा। रविवार को यह भी साफ हो जाएगा कि मतगणना से पहले जारी किये गये एग्जिट पोल कितने एक्जैक्ट साबित होते हैं।
चुनावों के नतीजे जो भी आएं लेकिन उनके आने तक मध्यप्रदेश ,राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के साथ ही देश की राजनीति को भारतीय मीडिया ने अटकलों की अरगनी पर टांग दिया है। विभिन्न मीडिया संस्थानों की ओर से जारी एक्जिट पोल के आधार पर इन चारों राज्यों में सरकारें बनती और बिगड़ती नजर आ रहीं हैं। जनादेश को भांपने की चे कवायद बड़ी रोचक है। इन एक्जिट पोल को एक्जैक्ट पोल समझने वालों और खारिज करने वालों की भी इस देश में कमी नहीं है। वैसे देश में एक्जिट पोल का इतिहास पुराना है। साल 1971 के आम चुनावों के समय जब मशीनें नहीं थीं। तकनीक नहीं थी। साथ ही आज जैसा मीडिया भी नहीं था। उस समय भी अटकले मौजूद थी लेकिन उस समय की अटकलें आज की तरह एकदम असल परिणामों के नजदीक भी नहीं पहुँच पातीं थीं।
मौजूदा दौर में मीडिया घरानों और राजनीतिक दलों में एग्जिट पोल करने की होड़ सी लगी हुई है। इस अटकलबाजी के जरिये देश में बाकायदा सट्टा कारोबार चलता है। इसलिए इस तरह के एग्जिट पोल ज्यादा भरोसेमंद न होते हुए भी सरस तो होते है। इनमें चाट पकौड़ी जैसा चटपटापन तो होता ही है और वे एग्जिट पोल मीडिया की टीआरपी बढ़ाने का काम भी करते ही हैं। एक संसथान का एक्जिट पोल यदि किसी राज्य में कांग्रेस की सरकार चना रहा है तो दूसरे संस्थान का एग्जिट पोल उसी राज्य में भाजपा की सरकार बनाने की भविष्यवाणी कर रहा है। लेकिन तमाम एग्जिट पोल मध्यप्रदेश में भाजपा की मौजूदा सरकार को सत्ता से एग्जिट करते हुए कांग्रेस को सत्ता में एंट्री दिलाते हुए दिख रहे हैं। यही हाल राजस्थान और छत्तीसगढ़ के एक्जिट पोल्स का है। इन दोनों राज्यों में कांग्रेस की सरकारें दोबारा से सत्ता में आती दिखाई गयीं है। तेलंगाना में सत्तारूढ़ बीआरएस की विदाई और कांग्रेस के सत्तारूढ़ होने की अटकलों का बाजार गर्म है। सबसे छोटे राज्य मिजोरम में भी कमोवेश इसी तरह की अटकलें हैं। एग्जिट ओपल असली चुनाव नतीजों के कितने करीब हैं या नहीं इसका पता तो 03 दिसंबर 2023 को ही पता चलेगा किन्तु इन नतीजों के आधार पर ही चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों ने आने वाले दिनों की तैयारियों का ली है। देश के सभी प्रमुख टीवी चैनल और वृझाव चैनल एग्जिट पोल दिखने के लिए जैसे उपवास किये बैठे थे।
चुनाव आयोग ने एग्जिट पोल दिखने के लिए 30 नवंबर को शाम को समय तय किया था। घड़ी की सुई जैसे ही पांच पर पहुंची टीवी चैनलों ने अपने एग्जिट पोल दिखाना शुरू कर दिए। सबके सब चैनल अचानक भविष्यवक्ता बन गए। ज्योतिषियों का धंधा इन सभी ने जैसे छीन लिया। हम जैसे गाल बजाने वाले विश्लेषक भी इन एग्जिट पोल्स पर अपना ज्ञान बघारने के लिए उपलब्ध हो गए। जनता भी चाहे-अनचाहे इन टीवी चैनलों से की गयी। किसी भी चुनाव में जनादेश आने से पहले उसके बारे में अटकलबाजियां यानि एग्जिट पोल दिखाना नैतिक है या नहीं अब इस पर कोई बहस नहीं होती। नैतिकता का लोप चूंकि राजनीति से बहुत पहले हो चुका है। इसलिए एग्जिट पोल दिखने वालों पर भी इसका कोई दबाब नहीं है। एग्जिट पोल में मतदाता ने कितना सच बोला और कितना झूठ इसका अनुमान लगना बेहद कठिन काम है। सच और झूठ का पता तो मतदाता को ‘लाइ-डिटेक्टर पर बैठकर ही लगाया जा सकता है फिर भी चैनल और सर्वेक्षण एजेंसियां मतदाता पर भरोसा करती हैं कभी लगता है तीर में तुक्का तो कभी औंधे मुंह गिरते हैं एग्जिट पोल कभी कभी तीर में तुक्का लग भी जाता है और कभी-कभी तमाम एक्जिट पोल औंधे मुंह भी गिरते हैं। चैनल वाले ये जोखिम उठाते हैं, उन्हें ये जोखिम उठाना पड़ता है। पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के भाजपा के स्टार प्रचारक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी पर इन एग्जिट पोल का कोई असर शायद नहीं होता इसलिए वे निश्चित भाव से विश्व पर्यावरण से में शामिल होने दुबई के लिए उड़ गए। वैसे रविवार 3 दिसंबर को 4 राज्यों में मोदी जी का कमल खिला तो उनका चेहरा भी कमल की तरह खिल जाएगा और नहीं खिला तो उनका चेहरा निर्विकार रहने वाला तो है ही। वे जनादेश को शिरोधार्य कर अगले साल 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुट जायेंगे।





