असम में मंगलवार को डोल जात्रा का पर्व पूरे श्रद्धा, रंग और संगीत के साथ मनाया गया। यह पर्व केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि असम की वैष्णव परंपरा, सामूहिक आनंद और सांस्कृतिक पहचान का जीवंत प्रतीक बनकर सामने आया। इस अवसर पर राज्य के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने लोगों को शुभकामनाएं दीं और डोल जात्रा के गहरे सांस्कृतिक व आध्यात्मिक महत्व को रेखांकित किया।
वसंत के आगमन के साथ राधा-कृष्ण के प्रेम का उत्सव
मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपने संदेश में कहा कि जैसे ही वसंत ऋतु दस्तक देती है, डोल जात्रा का पर्व राधा और भगवान कृष्ण के शाश्वत प्रेम का स्मरण कराता है। यह उत्सव जीवन में उल्लास, नवीनता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है, जो प्रकृति के बदलाव के साथ मानव भावनाओं को भी नई दिशा देता है।
सजे हुए डोलों पर विराजे राधा-कृष्ण, गांव-शहरों में निकली शोभायात्राएं
डोल जात्रा के दौरान भगवान कृष्ण और राधा की प्रतिमाओं को सुसज्जित झूलों, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘डोल’ कहा जाता है, पर विराजमान कर नगरों और गांवों में शोभायात्राएं निकाली गईं। इन यात्राओं में पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन, भक्ति गीतों का गायन और रंगों की मस्ती ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया। मुख्यमंत्री ने लोगों से इस अनोखे पर्व को स्वयं अनुभव करने का आह्वान भी किया।
शंकरदेव की वैष्णव परंपरा से जुड़ा आस्था का पर्व
डोल जात्रा, जिसे डोल उत्सव भी कहा जाता है, असम की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत में विशेष स्थान रखता है। यह पर्व महान संत और समाज सुधारक श्रीमंत शंकरदेव द्वारा स्थापित वैष्णव परंपराओं से गहराई से जुड़ा है। राज्य के सत्रों और नामघरों में इस दिन प्रार्थनाएं, नाम-कीर्तन और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जो भक्ति और अनुशासन का संदेश देते हैं।
सामाजिक एकता और सामूहिक आनंद का प्रतीक बनी डोल जात्रा
असम में डोल जात्रा केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह सामाजिक सौहार्द और समावेशिता को भी दर्शाती है। बच्चे, युवा और बुजुर्ग—सभी रंगों के साथ एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते नजर आते हैं। माजुली, बरपेटा, नगांव और गुवाहाटी जैसे क्षेत्रों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटे, जहां पारंपरिक प्रस्तुतियों ने उत्सव को और भव्य बना दिया। प्रशासन और सांस्कृतिक संस्थाओं ने आयोजन को सुव्यवस्थित बनाने के लिए विशेष इंतजाम किए।
असम की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करता पर्व
मुख्यमंत्री का यह संदेश असम की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को देश-दुनिया तक पहुंचाने की व्यापक कोशिश का हिस्सा माना जा रहा है। डोल जात्रा आज भी यह साबित करती है कि भक्ति, रंग और परंपरा का यह संगम असम की आत्मा में रचा-बसा है और हर साल वसंत के साथ नई ऊर्जा लेकर आता है।





