अयोध्या में झूलनोत्सव: भक्ति, परंपरा और पौराणिक महत्ता का संगम…जानें क्या है झूलनोत्सव मेले का महत्व
रामनगरी अयोध्या में पौराणिक और पारम्परिक सावन झूला मेला शुरु हो गया है। मणिपर्वत पर भक्तों का मेला लगने लगा है, भीड़ जुटने लगी है। यह मेला रक्षाबंधन सावन पूर्णिमा तक चलेगा।
अयोध्या में सावन के महीने में लगने वाला झूला उत्सव मेला, जिसे झूलनोत्सव भी कहा जाता है। एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन है। यह मेला भगवान राम और माता सीता के प्रेम और आनंद का प्रतीक है, और इस दौरान भक्त पारंपरिक रूप से झूले पर विराजमान भगवान राम और सीता की मूर्तियों को झूला झुलाते हैं। यह मेला 12 दिनों तक चलता है और इस दौरान अयोध्या के मंदिरों में विशेष सजावट की जाती है। भजन-कीर्तन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, और भक्त मणिपर्वत पर भगवान को झूला झुलाने जाते हैं।
- सावन शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि से शुरु होता है मेला
- झूलनोत्सव में भाग लेने के लिए आते हैं लाखों श्रद्धालु
- झूले में प्रभु श्रीराम और मां सीता के विग्रह स्वरूप को झुलाते हैं
- सीता—राम को झूला झुलाते समय जो भक्त प्रभु के श्रीचरणों में करते हैं मनोकामना समर्पित
- मनोकामना भक्तिभाव से करते हैं समर्पित,वह निश्चित रूप से होती है पूरी
जानें क्या है झूलाउत्सव मेले का महत्व
धार्मिक महत्व
यह मेला भगवान राम और माता सीता के प्रेम और आनंद का प्रतीक है।
सांस्कृतिक महत्व
यह मेला अयोध्या की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है।
भक्ति का उत्सव
भक्त भगवान को झूला झुलाकर अपनी भक्ति और प्रेम व्यक्त करते हैं।
सामाजिक महत्व
यह मेला लोगों को एक साथ लाता है और उत्सव की भावना का संचार करता है।
पर्यटन का महत्व
यह मेला अयोध्या में पर्यटन को बढ़ावा देता है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी लाभ पहुंचाता है।
मेले की मुख्य बातें
झूलनोत्सव— भगवान राम और माता सीता को झूले पर झुलाया जाता है।
मणिपर्वत— यह मेला मणिपर्वत पर आयोजित किया जाता है, जहां भगवान राम और सीता के झूला झूलने की मान्यता है।
सांस्कृतिक कार्यक्रम— भजन-कीर्तन, कजरी गीत, और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
मेला क्षेत्र— पूरे क्षेत्र में मेला लगता है, जहां भक्त झूले पर विराजमान भगवान के दर्शन करते हैं और विभिन्न प्रकार की दुकानें और स्टॉल भी लगाए जाते हैं।
सुरक्षा व्यवस्था— श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए व्यापक इंतजाम किए जाते हैं। यह मेला अयोध्या के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह मेला भक्तों के लिए भगवान राम और माता सीता के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने का एक शानदार अवसर भी होता है।
अयोध्या में झूलनोत्सव की शुरुआत
सावन मेले के शुभारंभ के साथ अयोध्या में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ने की संभावना। अनुमानित 20 लाख श्रद्धालु पहुंच सकते हैं। हर वर्ष सावन माह में अयोध्या में आयोजित होने वाला झूलनोत्सव भक्तिभाव, संगीत और पौराणिक कथाओं का अनुपम उत्सव है। 12 दिनों तक चलने वाले इस महोत्सव की भव्यता को देखने देशभर से श्रद्धालु उमड़ पड़ते हैं। रामनगरी के प्रमुख मंदिरों में कजरी गीत, भजन-कीर्तन और झूला दर्शन से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है। कई मंदिरों में सावन भर भगवान कनक बिहारी और मां जानकी को झूले में विराजमान किया जाता है। भक्त उन्हें झुलाकर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं।
रंगमहल पीठ के पीठाधीश्वर महंत राम शरण दास बताते हैं कि पूरा सावन रंगमहल में झूला महोत्सव के उल्लास से सराबोर रहता है। भक्त कजरी गीतों के साथ भगवान को झुलाते हैं, जिससे वातावरण में भक्ति की रसधारा बहती है। महंत जी एक पौराणिक कथा का भी उल्लेख करते हैं—जब मां जानकी की विदाई के समय उनके साथ एक दिव्य मणि जनकपुर चली गई थी। बाद में महाराज जनक ने सभी मणियों को अयोध्या भेज दिया। महाराज दशरथ ने इन मणियों को विद्याकुंड के पास सुरक्षित रखने का आदेश दिया, और इन्हीं मणियों से बना मणिपर्वत कालांतर में झूलनोत्सव का केंद्र बना। चूंकि ये मणियां सावन शुक्ल पक्ष तृतीया को अयोध्या पहुंची थीं, तभी से उस दिन को कजरी तीज के रूप में मनाया जाता है और मणिपर्वत पर झूला महोत्सव की परंपरा शुरू हुई, जो आज भी भक्तों को अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती है।…( प्रकाश कुमार पांडेय)