पश्चिम एशिया में जारी तनाव अब बेहद निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रही टकराव की स्थिति को लेकर आज की रात बेहद अहम मानी जा रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा दिए गए 48 घंटे के अल्टीमेटम की समय सीमा अब खत्म होने के करीब है। यह अल्टीमेटम ईरान को होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने के लिए दिया गया था। चेतावनी साफ है अगर ईरान ने यह कदम नहीं उठाया, तो अमेरिका बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई कर सकता है।
- आज की रात निर्णायक, बढ़ा वैश्विक तनाव
- होर्मुज पर अल्टीमेटम, अमेरिका सख्त
- ईरान के ऊर्जा ठिकाने निशाने पर
- पुल, एयरबेस और शहर खतरे में
- जंग तेज, दुनिया पर बड़ा असर
इस संभावित कार्रवाई के तहत ईरान के पावर प्लांट, तेल ढांचे, बड़े पुल, सैन्य ठिकाने, एयरपोर्ट और प्रमुख सड़क नेटवर्क निशाने पर आ सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हमला होता है, तो इसका असर सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। ईरान की ऊर्जा व्यवस्था को देखें तो यह काफी व्यापक और विविधतापूर्ण है। देश में गैस आधारित पावर प्लांट्स की संख्या सबसे अधिक है। आंकड़ों के अनुसार, ईरान में करीब 110 गैस पावर प्लांट्स हैं, जो उसकी ऊर्जा आपूर्ति की रीढ़ माने जाते हैं। इसके अलावा सोलर, हाइड्रो, कोयला और परमाणु ऊर्जा संयंत्र भी मौजूद हैं।
ईरान का बुशहर परमाणु पावर प्लांट सबसे महत्वपूर्ण परमाणु केंद्रों में से एक है, जिसकी क्षमता करीब 1000 मेगावाट है। इसके अलावा दमावंद कंबाइंड साइकिल पावर प्लांट (करीब 2868 मेगावाट), शाहिद सलीमी (2215 मेगावाट) और शाहिद रजाई (2043 मेगावाट) जैसे बड़े संयंत्र देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करते हैं। कुल मिलाकर ईरान की बिजली उत्पादन क्षमता लगभग 90 गीगावाट के आसपास है, जिसमें गैस आधारित संयंत्रों का दबदबा है।
अगर इन ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाया जाता है, तो ईरान की बिजली आपूर्ति पूरी तरह चरमरा सकती है। इसका असर उद्योगों, परिवहन और आम जनजीवन पर व्यापक रूप से पड़ेगा। सिर्फ ऊर्जा ढांचे ही नहीं, बल्कि ईरान के महत्वपूर्ण पुल और बुनियादी ढांचे भी खतरे में हैं। हाल ही में अल्बोर्ज़ प्रांत में करज के बी1 पुल पर हमले की खबर सामने आई थी, जिसमें पुल का बड़ा हिस्सा तबाह हो गया। यह पुल ईरान के आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर का अहम हिस्सा था। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि अन्य बड़े और ऐतिहासिक पुल भी संभावित हमलों के निशाने पर हो सकते हैं।
ईरान के सैन्य ठिकाने भी इस संभावित हमले का प्रमुख लक्ष्य हो सकते हैं। बंदर अब्बास नेवल बेस, जो फारस की खाड़ी में ईरानी नौसेना का मुख्य केंद्र है, रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। इसके अलावा हमदान और शाहरोखी एयरबेस जैसे वायुसेना ठिकाने भी अमेरिका के निशाने पर आ सकते हैं। ईरान की सबसे बड़ी सैन्य ताकत उसका भूमिगत ‘मिसाइल सिटी’ नेटवर्क है। यह नेटवर्क देश के कई हिस्सों में फैला हुआ है, जहां पहाड़ों के अंदर और जमीन के सैकड़ों मीटर नीचे मिसाइलें सुरक्षित रखी जाती हैं। इन ठिकानों से बैलिस्टिक मिसाइलों को लॉन्च किया जा सकता है, जिससे किसी भी हमले का जवाब दिया जा सके।
ट्रंप पहले भी ईरान को लेकर कड़े बयान दे चुके हैं और उन्होंने साफ कहा है कि अगर ईरान ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों को बाधित किया, तो उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। 4 अप्रैल को दिया गया 48 घंटे का अल्टीमेटम अब अपने अंतिम चरण में है और माना जा रहा है कि आने वाले कुछ घंटे बेहद महत्वपूर्ण होंगे।
दुनियाभर के विशेषज्ञ और रणनीतिक विश्लेषक इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। अगर अमेरिका की ओर से हमला होता है, तो यह एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है, जिसमें कई अन्य देश भी शामिल हो सकते हैं। इससे वैश्विक तेल आपूर्ति, व्यापार और सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है। कुल मिलाकर, पश्चिम एशिया में हालात बेहद संवेदनशील और विस्फोटक बने हुए हैं। आज की रात यह तय कर सकती है कि तनाव बातचीत से सुलझेगा या फिर एक बड़े सैन्य टकराव की ओर बढ़ेगा। दुनिया की निगाहें अब ईरान और अमेरिका के अगले कदम पर टिकी हुई हैं, क्योंकि इसका असर सिर्फ एक क्षेत्र नहीं, बल्कि पूरे विश्व पर पड़ने वाला है।