बीएमसी चुनाव से पहले ‘मुंबई पर साजिश’ का आरोप: 1950 के दशक की यादों में लौटे ठाकरे, गुजरात–महाराष्ट्र बंटवारे पर फिर सियासत गरम

BMC elections

बीएमसी चुनाव से पहले ‘मुंबई पर साजिश’ का आरोप: 1950 के दशक की यादों में लौटे ठाकरे, गुजरात–महाराष्ट्र बंटवारे पर फिर सियासत गरम

मुंबई: बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, मुंबई की राजनीति में उबाल तेज होता जा रहा है। करीब दो दशक बाद एकजुट हुए ठाकरे बंधु—उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे—ने भाजपा और केंद्र सरकार पर मुंबई की जमीन, अधिकार और आर्थिक ताकत को कमजोर करने की “गहरी साजिश” का आरोप लगाया है। ठाकरे बंधुओं का दावा है कि मुंबई की स्वायत्तता को लेकर आज का खतरा 1950 के दशक के संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन से भी बड़ा है।

इन राजनीतिक हमलों के साथ ही एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है 1960 में तत्कालीन बॉम्बे राज्य का भाषा के आधार पर हुआ विभाजन, जिसके बाद गुजरात और महाराष्ट्र दो अलग-अलग राज्य बने। यह मुद्दा न सिर्फ ऐतिहासिक है, बल्कि महाराष्ट्र की भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।

1. बीएमसी चुनाव और बढ़ता सियासी तापमान

मुंबई की सत्ता पर काबिज होने की जंग हमेशा से ही राजनीतिक दलों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल रही है। बीएमसी देश की सबसे अमीर नगर निगमों में से एक है और इसका बजट कई राज्यों के बराबर माना जाता है। ऐसे में चुनाव से पहले आरोप-प्रत्यारोप तेज होना स्वाभाविक है। उद्धव और राज ठाकरे ने आरोप लगाया है कि मुंबई की संपदा और महत्व को धीरे-धीरे महाराष्ट्र से अलग करने की कोशिशें हो रही हैं। उनका कहना है कि मुंबई सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि मराठी अस्मिता का प्रतीक है। इसी भावनात्मक मुद्दे को उठाकर ठाकरे बंधु चुनावी मैदान में भाजपा को घेरने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

2. क्या था संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन?

स्वतंत्रता के बाद 1950 के दशक में बना बॉम्बे राज्य आज के गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ हिस्सों को मिलाकर गठित किया गया था। 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के दौरान कर्नाटक के हिस्से मैसूर (अब कर्नाटक) राज्य में शामिल कर दिए गए।

इसी साल राज्य पुनर्गठन आयोग ने सुझाव दिया कि गुजरात और महाराष्ट्र को मिलाकर एक द्विभाषी राज्य बनाया जाए और बॉम्बे (अब मुंबई) को उसकी राजधानी रखा जाए। इस प्रस्ताव ने मराठी भाषी लोगों में भारी असंतोष पैदा कर दिया। मराठी समाज को लगा कि उनकी भाषा और पहचान को दबाया जा रहा है। इसी विरोध से जन्म हुआ संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन का, जिसने अलग मराठी राज्य की मांग को लेकर पूरे महाराष्ट्र में व्यापक आंदोलन छेड़ दिया।

3. गुजरात–महाराष्ट्र का गठन और ऐतिहासिक फैसला

संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन के समानांतर गुजरात में भी महागुजरात आंदोलन चल रहा था, जिसमें गुजराती भाषी लोग अलग राज्य की मांग कर रहे थे। दोनों आंदोलनों की तीव्रता को देखते हुए केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ता गया। आखिरकार अप्रैल 1960 में संसद ने एक कानून पारित किया, जिसके तहत बॉम्बे राज्य को दो हिस्सों में बांटने का फैसला लिया गया। 1 मई 1960 को बॉम्बे राज्य का औपचारिक रूप से विघटन हुआ और गुजरात तथा महाराष्ट्र दो नए राज्यों के रूप में अस्तित्व में आए। बॉम्बे का नाम बाद में मुंबई हुआ और इसे महाराष्ट्र की राजधानी बनाया गया। गुजरात के लिए पहले अहमदाबाद को अस्थायी राजधानी बनाया गया, बाद में गांधीनगर विकसित हुआ।

4. महाराष्ट्र में भावनात्मक मुद्दा क्यों है यह इतिहास?

संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन केवल एक राजनीतिक संघर्ष नहीं था, बल्कि यह भाषा और पहचान की लड़ाई थी। इस आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई में 107 लोगों की जान गई। इन शहीदों को महाराष्ट्र में “हुतात्मा” कहा जाता है और उनकी स्मृति में मुंबई में हुतात्मा स्मारक बनाया गया है। मराठी अस्मिता की बात करने वाले राजनीतिक दल और नेता आज भी इन शहीदों के बलिदान का उल्लेख करते हैं। यही वजह है कि जब भी मुंबई की स्थिति, उसकी संपदा या उसकी पहचान पर सवाल उठते हैं, तो यह मुद्दा बेहद संवेदनशील हो जाता है। राज और उद्धव ठाकरे इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का हवाला देकर दावा कर रहे हैं कि मुंबई को लेकर कोई भी साजिश मराठी समाज के जख्मों को फिर से हरा कर देती है।

5. आज की राजनीति में इतिहास की वापसी

ठाकरे बंधुओं का आरोप है कि मुंबई की आर्थिक ताकत और संसाधनों को गुजरात की ओर मोड़ने की कोशिशें हो रही हैं। उनका कहना है कि यह सिर्फ प्रशासनिक या विकास का मामला नहीं, बल्कि मराठी लोगों के अधिकारों से जुड़ा सवाल है। भाजपा और उसके नेता इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताते हैं और कहते हैं कि मुंबई को वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ाने की बात को गलत अर्थों में लिया जा रहा है। लेकिन बीएमसी चुनाव के माहौल में यह बहस अब सिर्फ विकास बनाम राजनीति की नहीं रही, बल्कि इतिहास, अस्मिता और भावनाओं से जुड़ चुकी है। 1950 के दशक का संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन आज फिर सियासी बहस के केंद्र में है। सवाल यही है कि क्या यह मुद्दा ठाकरे बंधुओं को चुनावी फायदा दिलाएगा या मतदाता इसे सिर्फ चुनावी रणनीति मानेंगे। इतना तय है कि मुंबई की राजनीति में इतिहास की परछाई एक बार फिर गहराती नजर आ रही है।

Exit mobile version