महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने इस बार अपनी राजनीतिक मौजूदगी को मजबूती से दर्ज कराया है। राज्य भर में पार्टी ने 114 सीटों पर जीत हासिल कर यह संकेत दे दिया है कि शहरी राजनीति में अब उसकी भूमिका को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
AIMIM के वरिष्ठ नेता शारिक नक्शबंदी ने चुनावी नतीजों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पिछली बार बेहद कम अंतर से मिली हार ने पार्टी कार्यकर्ताओं के भीतर आत्ममंथन और संघर्ष की भावना पैदा की। यही कारण है कि इस बार संगठन ने जमीनी स्तर पर अधिक आक्रामक और सुनियोजित रणनीति के साथ चुनाव लड़ा।
घर-घर पहुंचा अभियान, ओवैसी की सक्रियता बनी निर्णायक
नक्शबंदी के अनुसार, पार्टी अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने इस बार केवल मंचों तक सीमित न रहते हुए घर-घर जाकर प्रचार किया।
2015 के मुकाबले उन्होंने ज्यादा समय महाराष्ट्र में बिताया, स्थानीय मुद्दों को समझा और संगठन की कमजोर कड़ियों पर सीधा काम किया। इसका असर यह हुआ कि कार्यकर्ताओं में आत्मविश्वास बढ़ा और मतदाताओं से सीधा संवाद स्थापित हुआ।
किन शहरों में कैसी रही AIMIM की स्थिति
AIMIM ने इस बार महाराष्ट्र के कई प्रमुख शहरी क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया।
छत्रपति संभाजीनगर में पार्टी ने 33 सीटें, मालेगांव में 21, अमरावती में 15, नांदेड़ में 13, धुले में 10 और सोलापुर में 8 सीटों पर जीत दर्ज की।
इसके अलावा मुंबई में 6, ठाणे में 5, जलगांव में 2 और चंद्रपुर में 1 सीट जीतकर पार्टी ने यह संदेश दिया कि उसका प्रभाव केवल सीमित क्षेत्रों तक नहीं है।
अंदरूनी असंतोष से निपटने की रणनीति
शारिक नक्शबंदी ने स्वीकार किया कि चुनाव से पहले पार्टी को कुछ जगहों पर आंतरिक असंतोष का सामना करना पड़ा। खासकर छत्रपति संभाजीनगर में उम्मीदवारों को लेकर मतभेद सामने आए।
हालांकि, ओवैसी ने व्यक्तिगत रूप से असंतुष्ट नेताओं से बातचीत की और करीब 70 प्रतिशत मामलों में सहमति बनाकर संगठन को एकजुट रखने में सफलता हासिल की।
पिछली जीत से मिली सीख, इस बार बड़ा परिणाम
AIMIM ने पिछले नगर निकाय चुनावों में करीब 80 सीटें जीती थीं। नक्शबंदी के मुताबिक, उस अनुभव से पार्टी को शहरी मतदाताओं की प्राथमिकताओं और मुद्दों को समझने का मौका मिला।
इसी समझ के आधार पर इस बार रणनीति बदली गई, स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाया गया और संगठनात्मक ढांचे को मजबूत किया गया।