Assembly Elections 2026: क्या वापसी की राह पर कांग्रेस? असम, बंगाल, केरल और तमिलनाडु में कितनी जमीन?
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स्थिति: कांग्रेस मुख्य विपक्षी ताकतों में से एक है।
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विधानसभा (2021): कांग्रेस ने लगभग 29 सीटें जीतीं (महागठबंधन के साथ)।
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जमीन का आकलन: सीमित लेकिन ठोस उपस्थिति—कुछ क्षेत्रों (खासकर बराक वैली) में प्रभाव।
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चुनौती: भाजपा के मजबूत संगठन और क्षेत्रीय समीकरण।
2025 के विधानसभा चुनावों में दिल्ली, बिहार और महाराष्ट्र में मिली हार के बाद 2026 कांग्रेस के लिए अग्निपरीक्षा जैसा साल माना जा रहा है। लगातार चुनावी झटकों ने पार्टी की संगठनात्मक क्षमता और रणनीतिक कौशल पर सवाल खड़े किए हैं। अब निगाहें चार बड़े राज्यों—असम, पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु—पर टिकी हैं, जहां इसी वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं। सवाल यही है कि क्या कांग्रेस इन राज्यों में अपनी स्थिति मजबूत कर पाएगी या फिर संघर्ष जारी रहेगा?
हार के बाद उम्मीद की तलाश
पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस का राजनीतिक ग्राफ उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। एक दशक पहले भारतीय राजनीति में भाजपा के उभार के बाद कांग्रेस का जनाधार कई राज्यों में सिमटता गया। हालांकि कुछ राज्यों में उसे सफलता भी मिली, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी को स्थिर बढ़त नहीं मिल सकी। 2025 में दिल्ली, बिहार और महाराष्ट्र जैसे अहम राज्यों में हार ने संगठन के भीतर आत्ममंथन की प्रक्रिया तेज कर दी है।
असम: चुनौती बड़ी, राह कठिन
असम में कांग्रेस की स्थिति फिलहाल मजबूत नहीं मानी जा रही। राज्य में भाजपा की सरकार और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की सक्रियता कांग्रेस के लिए चुनौती है। पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असंतोष की खबरें भी सामने आती रही हैं। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर रणनीतिक फेरबदल और नए सिरे से संगठन को सक्रिय करने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर मजबूती हासिल करना आसान नहीं होगा।
पश्चिम बंगाल: दो ध्रुवों के बीच सिमटी जगह
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स्थिति: तृणमूल कांग्रेस का वर्चस्व।
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विधानसभा (2021): कांग्रेस 0 सीट।
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जमीन का आकलन: संगठनात्मक उपस्थिति है, पर चुनावी जमीन बेहद कमजोर।
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चुनौती: टीएमसी बनाम भाजपा ध्रुवीकरण में कांग्रेस हाशिए पर।
पश्चिम बंगाल की राजनीति फिलहाल दो प्रमुख ध्रुवों के इर्द-गिर्द घूमती दिखती है—सत्ता में काबिज ममता बनर्जी और मुख्य विपक्ष के रूप में उभरती भाजपा। इस परिदृश्य में कांग्रेस के लिए अपनी अलग पहचान बनाना चुनौतीपूर्ण है। संगठनात्मक ढांचा कमजोर पड़ता दिख रहा है और राज्य स्तर पर कोई सर्वमान्य चेहरा भी स्पष्ट रूप से उभर नहीं पाया है। ऐसे में यहां पार्टी को गठबंधन और रणनीतिक सहयोग के विकल्पों पर विचार करना पड़ सकता है।
तमिलनाडु: गठबंधन की ताकत
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स्थिति: डीएमके गठबंधन का हिस्सा।
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विधानसभा (2021): कांग्रेस ने 18 सीटें जीतीं (डीएमके गठबंधन में)।
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जमीन का आकलन: गठबंधन पर निर्भर प्रभाव; स्वतंत्र दम पर सीमित।
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मौका/चुनौती: द्रविड़ राजनीति में सहयोगी भूमिका।
तमिलनाडु में तस्वीर अपेक्षाकृत सकारात्मक मानी जा रही है। कांग्रेस, सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा है और एम.के. स्टालिन के नेतृत्व वाली सरकार में उसकी भूमिका है। यदि सीट बंटवारे में पार्टी बेहतर सौदेबाजी कर पाती है तो उसे विधानसभा में अपनी उपस्थिति बढ़ाने का अवसर मिल सकता है।
केरल: एंटी-इन्कंबेंसी का लाभ?
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स्थिति: कांग्रेस-नीत यूडीएफ प्रमुख गठबंधन।
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विधानसभा (2021): कांग्रेस ने लगभग 21 सीटें जीतीं (यूडीएफ मुख्य विपक्ष)।
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जमीन का आकलन: मजबूत और स्थायी आधार—एलडीएफ बनाम यूडीएफ की सीधी लड़ाई में प्रमुख खिलाड़ी।
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मौका: सत्ता-विपक्ष का चक्र, स्थानीय नेतृत्व।
केरल में कांग्रेस को उम्मीद की किरण नजर आती है। राज्य में वामपंथी सरकार के खिलाफ एंटी-इन्कंबेंसी की.. यहां कांग्रेस की रणनीति गठबंधन की मजबूती और साझा मुद्दों पर फोकस करने की होगी।
कांग्रेस? असम, बंगाल, केरल और तमिलनाडु में कितनी जमीन?—राजनीतिक ताकत के संदर्भ में है। यहां “जमीन” से मतलब आम तौर पर विधानसभा/लोकसभा में सीटें और वोट शेयर से होता है। संक्षेप में स्थिति इस प्रकार समझी जा सकती है: