UP Politics:: केदारेश्वर महादेव मंदिर.. राम मंदिर के बाद इटावा बना सियासत में नया सांस्कृतिक अखाड़ा…!भाजपा का हमला और सपा की सफाई

After Ram Mandir now Kedareshwar Mahadev Temple of Etawah is fast coming to the centre stage in Uttar Pradesh politics

UP Politics:: केदारेश्वर महादेव मंदिर: राम मंदिर के बाद इटावा बना सियासत में नया सांस्कृतिक अखाड़ा…भाजपा का हमला और सपा की सफाई

उत्तर प्रदेश की राजनीति में राम मंदिर के बाद अब इटावा का केदारेश्वर महादेव मंदिर तेजी से केंद्र में आ रहा है। समाजवादी पार्टी (सपा) इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के समानांतर नैरेटिव के तोरपर प्रस्तुत कर रही है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव के गृह जिले इटावा में तैयार हो रहा यह मंदिर न केवल श्रद्धा का बड़ा केंद्र बनता जा रहा है, बल्कि साल 2027 में होने वाले के विधानसभा चुनाव के पहले राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का प्रतीक भी अब बन चुका है।

राम बनाम शिव नैरेटिव?

राम मंदिर जहां भाजपा के सांस्कृतिक एजेंडे की रीढ़ रहा है, वहीं अब सपा शिव मंदिर के ज़रिए अपनी हिंदू आस्था की उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश कर रही है। केदारेश्वर मंदिर का शिलान्यास 2021 में अखिलेश यादव ने किया था और जनवरी 2024 में प्राण-प्रतिष्ठा उनकी पत्नी सांसद डिंपल यादव ने की थी – ठीक उसी समय जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन कर रहे थे।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह टाइमिंग महज संयोग नहीं, बल्कि सपा की रणनीतिक चाल है। लंबे समय से भाजपा सपा को मुस्लिम परस्त और हिंदू आस्था से दूर रहने वाली पार्टी के रूप में प्रचारित करती रही है। अब सपा इस धारणा को तोड़ने की कोशिश में जुटी है।

केदारेश्वर मंदिर की विशेषता
इटावा में 11 एकड़ ज़मीन पर बन रहा केदारेश्वर मंदिर, केदारनाथ मंदिर से एक इंच छोटा है — जिससे इसे सम्मानसूचक दूरी का प्रतीक कहा जा रहा है। इसका निर्माण उसी तकनीक से हो रहा है जिससे राम मंदिर का – बिना सीमेंट, बिना लोहे की रॉड के, त्रिबंधन तकनीक से। कन्याकुमारी से लाए गए कृष्णपुरुष ग्रेनाइट का उपयोग किया गया है। मंदिर के शिल्प में उत्तर-दक्षिण की सांस्कृतिक एकता को दर्शाया गया है। तंजावुर के वैथीश्वरन मंदिर से प्रेरित द्वार और दक्षिण भारत के कारीगरों की भूमिका इसमें शामिल है।

भाजपा का हमला और सपा की सफाई

भाजपा ने सपा के इस प्रयास को राजनीतिक नकल और वोटबैंक साधने की रणनीति बताया है। इटावा जिलाध्यक्ष अरुण गुप्ता ने कहा, “जो लोग राम मंदिर के भूमि पूजन में नहीं गए, अब शिव मंदिर बना रहे हैं – यह उनकी बौखलाहट है।”

वहीं सपा नेता गोपाल यादव ने पलटवार करते हुए कहा, “हमें हिंदू विरोधी कहना गलत है। हम दिखावा नहीं करते, लेकिन हमारी आस्था उतनी ही गहरी है। अखिलेश जी नौ दिन का व्रत रखते हैं, और इटावा में हनुमान मंदिर और कृष्ण प्रतिमा के निर्माण के कार्य भी हो रहे हैं।”

स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और श्रद्धा का केन्द्र

राजनीतिक बहस और बयानबाजी से हटकर स्थानीय लोग तो इसे रोज़गार और श्रद्धा का एक बड़ा केंद्र मान रहे हैं। चाय की दुकानदार चलाकर परिवार पालने वाले श्रीमन कहते हैं, “राम मंदिर नहीं जा सके, लेकिन शिव के दर्शन अब यहीं उन्हें मिलते हैं। इसके साथ ही उनकी दुकानदारी भी बढ़ी है।” श्रद्धालुओं का कहना है “केदारनाथ जाना मुश्किल था, अब इटावा में ही दर्शन हो रहे हैं।

केदारेश्वर मंदिर न सिर्फ इटावा का बल्कि सपा की सांस्कृतिक रणनीति का केंद्र भी माना जाता है। बल्कि यह राजनीतिक चर्चाओं में धार्मिक प्रतीकों की भूमिका को भी यह जिला उजागर करता है। साल 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह मंदिर सांस्कृतिक और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर अहम भूमिका निभा सकता है। ऐसे में अब देखना यह होगा कि शिव के इस मंदिर से सपा कितनी राजनीतिक ऊर्जा प्राप्त कर पाती है। …( प्रकाश कुमार पांडेय)

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